Sunday, September 27, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

आदरणीय जगदीश व्योम जी, ये कैसी गतिविधियाँ हैं ? ये क्या चल रहा है ? प्रतिक्रिया स्वरूप वन-लाइनर उलटबासियों से किसका भला हो रहा है ? साहित्य का तो कदापि नहीं. मैं किसी वाद या मठ का न हिस्सा था, न हूँ. ऐसे में थाहने की कोई कोशिश अन्यथा कर्म ही होगा.

जगदीश व्योम --
"सभी सदस्यों से अनुरोध है कि यहाँ नवगीत विषयक अपनी राय, नवगीत विषयक प्रश्न, नवगीत विषयक टिप्पणी, चर्चा आदि में सहभागिता करें.. यह आवश्यक नहीं कि आप किसी की बात से पूरी तरह सहमत हों.. परन्तु इसे वैयक्तिक न बनायें.... सभ्य भाषा का प्रयोग करें... नवगीत को अनेकानेक लोग समझना चाहते हैं...... यहाँ हम सब मिलकर अपनी अपनी सामर्थ्य से नवगीत के इर्द गिर्द घिरे कोहरे को सहज विमर्श के द्वारा हटाने में सफल हो सकेंगे..... इसी अनुरोध के साथ सभी सदस्यों का स्वागत है.."

सही है.. लेकिन जिन्हें राजनीति करनी है वे करें न. खुल कर करें. किसने रोका है ? लेकिन साहित्यांगन में उनका क्या काम है ? रसोईघर को गुसलखाना समझ लिया है क्या ? व्यवस्था विरोध के नाम पर किसी ’मंतव्य विशेष’ का पृष्ठपोषण न उचित था, न है. न कभी मेरे लिए उचित होगा. लाचारों से लम्बी दौड़ संभव नहीं होती.

-सौरभ पाण्डेय
July 21 at 2:04pm

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