Wednesday, September 02, 2015

एक हाथ में हल की मुठिया

आदरणीय व्योम जी यह विडम्बना है गीत प्रकाशित होना एक बात है और प्रकाश में आना अलग बात है इसी तरह से कितने और रचनाकार होंगे और न जाने कितने और गीत होंगे जो ऐसे ही प्रकाशित होते हुए भी अप्रकाशित रह गये होंगे .....जब तक कहीं चर्चा न हो तब तक तो वे समय के गर्त में ही माने जायेंगे....जब तक कहीं किसी संज्ञान में नहीं आयेंगे तब तक इस संबंध में किसी का भी अनुमान शून्य ही होगा.....आप के द्वारा नवगीत काल के आरंभिक दिनो के इस नवगीत को पाठकों एवं मेरे जैसे विद्यार्थियों तक पहुचाने हेतु आभार.......

-निर्मल शुक्ल
July 3 at 11:01pm

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