Sunday, September 27, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

विमर्श के नाम पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप उचित नहीं है। नवगीत में सहज सम्प्रेषण और कथ्य पारदर्शी है। विमर्श भी उसी पर आधारित है। कौन किसके गुट में है, यह मेरी समझ से परे है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि पुराने मुहावरों का प्रयोग करने में सावधानी बरतने की जरूरत है। घूरे के दिन बहुरने में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को आपत्ति क्यों होगी। हाँ एतराज की बात तब अवश्य होती जब उसे घूर बने रहने की वकालत की जाए। दूसरा "'घायल की गति घायल जाने की जिन घायल होय"' यह भी सत्य है। पीड़ा, लांछन, तिरस्कार का भुक्तभोगी अपनी अन्तर्व्यथा जिन शब्दों में व्यक्त कर सकता, उसी तरह कोई दूसरा व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकता। पर वह कवि भी हो जरूरी नहीं। उसकी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए समाज के किसी भी वर्ग का संवेदनशील व्यक्ति आगे आ सकता है। सवाल यह है कि निचले तबके के प्रतीक शब्द "'रम धनिया'"' का प्रयोग क्या नवगीत में असंसदीय है। दूसरा आक्षेप इसके कथ्य को लेकर है कि ऐसे चित्रण में सावधानी की आवश्यकता है। तो यह सावधानी और चुनौती तो रचनाकार को हर स्तर पर है।

-रामशंकर वर्मा
July 20 at 1:06pm

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