Friday, September 25, 2015

योगेन्द्र दत्त शर्मा का नवगीत

जब कोई रचनाकार अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए प्रासंगिक मिथकीय प्रतीकों का अपनी रचना में प्रयोग करता है तब उसके सामने सत्य को सशक्त रूप में प्रस्तुत करने की सदिच्छा होती है। मिथकीय पात्र ,कथानक तथा भूमिकाएं अपने अभिधात्मक अर्थ के बजाय लाक्षणिकता के साथ रचना में प्रयोग करते हुए रचनाकार कहाँ तक सफल होता है यह उसके व्यक्तिगत और रचनात्मक अभ्यास और कौशल पर निर्भर करता है। कोई भी व्यक्ति रचनाकार के सृजन की सार्थकता से सहमत या असहमत हो सकता है किन्तु रचनाकार की नीयत,आशय और उसके मंतव्य की पृष्ठभूमि में ही रचना का मूल्यांकन करना उचित है। योगेन्द्र शर्मा जी के प्रस्तुत गीत में प्रयुक्त महाभारत के प्रासंगिक बिन्दुओं का प्रयोग समकालीन यथार्थ को व्यक्त करने का प्रयास है। रचना के अंत में गीतकार अपने आप से प्रश्न करता हुआ उत्तर के लिए पाठक को सोचने के लिए बाध्य करता है। यहाँ विकल्पहीनता नहीं बल्कि समय का बहुआयामी विद्रूप यथार्थ है जिसका किसी एक विकल्प से मुकाबला नहीं किया जा सकता। पूरे गीत को समग्रता में समझने के लिए अंत से आरम्भ करते हुए उन स्थितियों तक आएं जिनमे आज का भूमंडलीकृत नागरिक जीवन की आपाधापी में फंस कर स्वयं से ही असंतुष्ट होकर स्वयं से ही प्रतिस्पर्धा कर रहा है और असफल होने पर आज के हताशा,अवसाद और असंतोष जैसे युगीन रोगों से जूझ रहा है। आज जब सत्य का वही रूप दिखाया जा रहा है जो दिखाने वाले प्रसार माध्यमों और उनके आकाओं के अनुकूल है तब रचनाकार किसी संजय के मिथक का प्रयोग कर रहा है तो यह प्रयोग उचित ही है। जब आज का यथार्थ अपनी तीव्रता में अतीत की स्मृतियों के भयावह यथार्थ से भी अधिक गहन और तीव्र है और उसकी अनुभूतियों की लय भी विगत की अनुभूतियों से अधिक सशक्त है तब पुरानी लय कैसे याद आएगी? आज जब नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन और सांस्कृतिक प्रदूषण का ख़तरा बढ़ता जा रहा है तब निरंतर जटिल होते समयगत यथार्थ को योगेन्द्र दत्त शर्मा द्वारा अपनी रचना में बहुत सफलता से अभिव्यक्त किया गया है। रचना में व्यक्त आशय को ग्रहण करके हर व्यक्ति अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्या करने को स्वतंत्र है। आवश्यक नहीं कि मेरे विचार से सबकी सहमति संभव हो किन्तु प्रस्तुत नवगीत कथ्य,शिल्प,भाषा , आशय और सम्प्रेषणीयता के बिन्दुओं पर एक उत्कृष्ट रचना है।
-जगदीश पंकज

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