Sunday, September 27, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

प्रिय सौरभ जी ,आपको मेरी टिप्पणी से आघात पहुंचा कि मुझे स्पष्ट कह देना चाहिए था और हमारे बीच के व्यक्तिगत संबंधों का उल्लेख किया है। मेरा कहना है कि आपकी पोस्ट से पहले भी कई लोगों ने अपने विचार प्रकट किये हैं तथा मेरी टिप्पणी के ठीक बाद आपका मत पोस्ट हुआ है जिसमें बहुत कुछ कहा गया है ,प्रासंगिक भी और अप्रासंगिक भी ,जिसे कई किस्तों में आगे बढ़ाया गया है। जिनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि मेरी टिप्पणी पढ़कर आप विचलित हो गए जबकि मैंने एक बहस को आगे बढ़ाते हुए अपना विचार रखा था और चाहा था कि रमाकांत यादव के प्रश्नों को दृष्टिगत रखते हुए विमर्श हो। आपके लगातार कई कमेंट्स से यही प्रकट हो रहा था कि आप प्रस्तुत नवगीत और नवगीतकार के बचाव में मुझ पर परोक्ष प्रहार कर रहे हैं। आपकी बेचैनी का कारण कुछ भी रहा हो।मैंने अपने मंतव्य में एक सामान्य चर्चा की है जिसे आपकी टिप्पणियों में अन्यथा लिया गया और परोक्ष रूप से कहा गया कि राजनीति चल रही है। जहां तक शैलेन्द्र जी का प्रश्न है मैं स्वयं उनके गीतों का प्रसंशक रहा हूँ तथा यथास्थान टिप्पणियाँ भी की हैं। और आपसे तो मेरे अनुजवत सम्बन्ध हैं। मेरा आशय नवगीत तक ही सीमित है, हम असहमत हो सकते हैं, विचार भिन्नता हो सकती है किन्तु कटुता से बचना उचित है। जहां तक रमाकांत यादव का प्रश्न है मेरा उनसे कोई व्यक्तिगत परिचय भी नहीं है तथा इसी समूह की एक अन्य पोस्ट पर मेरे उनसे भिन्न विचार हैं। मैंने अपने विचार बिना किसी दबाव और दुराग्रह के रखे हैं। इस पोस्ट की शुरुआत रमाकांत यादव द्वारा कुछ प्रश्नों के साथ की गयी है और उनका उत्तर चाहा है। मैं भारतेंदु मिश्र जी के साहस की सराहना करता हूँ कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है,… //..जहां तक रमाकांत यादव जी का प्रश्न है कि ये गीत सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है..ये सही बात है ..लेकिन ये मानसिकता कवि के साथ नही बल्कि रमधनिया से रामधनी बनने के बीच जो उसके चरित्र मे परिवर्तन हुआ है उस सत्ता सुख के साथ जुडी है तात्पर्य ये कि जब कोई सत्ता तक पहुंच जाता है तो वह सवर्णता वादी /मनुवादी आचरणो व्यवहारो को सहज मे ही अपना लेता है।// .... और पूरी तार्किकता से अपनी बात के समर्थन में जीवंत सामाजिक उदाहरण दिए हैं। वे उदाहरण साहित्येतर हो सकते हैं किन्तु काल्पनिक नहीं हैं । विमर्श में मतभिन्नता तो होनी ही है अतः अपने विपरीत मत और उसके आशय को समझने का स्थान बनाये रखना चाहिए। मैं समझता हूँ कि इस नवगीत पर काफी विमर्श हो चुका है और आगे बढ़ने पर तल्खियाँ ही बढ़ने का भय है अतः अब विराम देकर समापन की ओर बढ़ा जाये।
सादर,

-जगदीश पंकज
July 21 at 11:31pm

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