Sunday, September 27, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

अवनीश सिंह चौहान प्रिय सौरभ जी, विमर्श के नाम पर लट्ठ भांजने का कार्य कौन कर रहा है और वह भी गुट बनाकर? यह पाठक बखूबी समझ रहे हैं और आदरणीय जगदीश पंकज जी भी संकेत कर चुके हैं। तिस पर भी आप आदरणीय जगदीश पंकज जी को नसीहत दे रहे हैं। आपने तो रमाकांत जी को भी नसीहत दे डाली कि उन्हें अपनी समझ बढ़ानी होगी। आपने आदरणीय डॉ जगदीश व्योम जी को भी कह दिया कि विमर्श के नाम पर यह क्या चल रहा है। आपने यह भी लिखा कि 'संपर्क और सान्निध्य से परिचित हुआ जा सकता है, रचनाकर्मी और साहित्यकार नहीं हुआ जा सकता' - यह भी एक नसीहत है। आपकी टिप्पणियों को अगर ठीक से पढ़ा जाय तो ऐसे कई बिन्दु प्रकट हो जायेंगे जो एकपक्षीय हैं और अखाड़ेबाजी की ओर संकेत करते हैं। आपसे तो यह उम्मीद नहीं थी। आपसे तो बेहतर यहाँ वे आलोचक हैं जिन्होंने शुरू मैं रमाकांत जी द्वारा कही गयी बात - सवर्णवादी मानसिकता - को बाद में अपने ढंग से स्वीकार किया और कहीं भी रमाकांत जी को समझ बढ़ाने की नसीहत नहीं दी, उम्र और अनुभव में बड़े होने के बावजूद भी; और जिन्होंने भिन्न मत भी दिया उन्होंने अपनी भाषा को संयमित बनाये रखा। इसे कहते हैं बड़ी सोच।

-अवनीश सिंह चौहान
July 22 at 8:33am

No comments: