Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

अवनीश सिंह चौहान उपर्युक्त टिप्पणियों को पढ़कर मुझे लगता है कि साहित्य की आलोचना करना इतना आसान नहीं। यहाँ ज्यादातर साहित्यकार अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं। काश इनमें से दो-तीन भी ठीक से आलोचनाएँ होती तो यह बहस सार्थक होती।
-अवनीश सिंह चौहान
July 15 at 10:37am 

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