Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

भारतेन्दु मिश्र जी कह रहे हैं कि यह बेहतरीन नवगीत हैऔर मुझे इस पर आश्चर्य हो रहा है।किस लिहाज से यह बेहतरीन नवगीत हो सकता है?रमधनिया की जोरू धनिया यह तुक ताल भिड़ाने वाली मानसिकता कौन सी है?क्या किसी उच्च जाति के पात्र को भी इसी अन्दाज में गीतकार ने सम्बोधित किया है?आप कहते हो कि रमधनिया के चरित्र का विस्तार किया गया है जब कि वह सम्बोधन से लेकर प्रस्तुतीकरण तक गीतकार के व्यंग्य वाणों की चुभन के बीच है।रमधनिया की पौ बारा है -इसका क्या मतलब?मतलब गीतकार को यह सहन नहीं हो रहा है?कुछ पाने पर खुशी किसको नही होती?रमधनिया को भी है तो किसी को इतना क्यों खले कि पौ बारा जैसा वाहियात मुहावरे का वह इस्तेमाल करे।जमीनी सच्चाई तो यह हा कि अधिकतम दलित प्रधान स्वतंत्र होकर काम नही कर पाते।वे सदैव किन्हीं पंडित जी या ठाकुर साहब के दबाव में ही काम करने को लाचार हैं।कोई स्वतंत्र होकर काम करना चाहे तो उसके खिलाफ हजार साजिशें हैं हथकंडे हैं।यह झूठ है अतिरंजना है कि लम्बरदार चौधरी उसकी अगवानी में रहते हैं।अभी स्थितियां इतनी नही बदली हैं।आपको परेशानी यह भी है कि उस दलित ने पांच साल में महल खड़ा कर लिया।महल कहां किसने खड़ा कर लिया?आप खड़ा करने दोगे तब ना?झुग्गी की जगह घर बना लिया कहते तो भी ठीक था।जो सदियों से महल खड़ा करते रहे और अब भी कर ही रहे है उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।और रमधनिया कोअंत में ऐसा पटका गीतकार ने कि आने लगा मजा अब उसकोऐय्याशी दीवानी में।नही ;गीतकार ने जानबूझकर रमधनिया को यहां तक गिराया है।गीतकार इस पात्र के प्रतिपक्ष में शुरू से खड़ा हुआजान पड़ता है।उसकी अपनी मर्जी कि वह जिसको जहां चाहे गिरा दे?मैं फिर कह रहा हूं कि पीढ़ियो से जो ऐय्याशी कर रहे हैं उनकी तरफ हमारी दृष्टि क्यों नहीं जाती?और यह भी कहां तक उचित है कि हम या कि हम जिनकी पैरवी में हैं वे मौज मस्ती ऐय्याशी का जीवन जियें और दूसरों से हम अपेक्षा करें कि वे त्याग तपस्या में आदर्श उपस्थित करें।अफसोस है कि गीत नवगीत ने दलित साहित्य केपुरजोर हस्तक्षेप के बावजूद अभी सामंती रुख ही अपनाये रखा है।अगर कही कुछ है भी तो कृत्रिम बनावटी असंतुलित।क्या कोई दलित या दलित साहित्यकार इस गीत को पसन्द करेगा?मगर आप उनकी चिन्ता क्यों करेंगे?

-रमाकान्त यादव
July 12 at 11:14am

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