Friday, September 25, 2015

योगेन्द्र दत्त शर्मा का नवगीत

इस नवगीत के मुखड़े से जैसी सकारात्मकता निस्सृत हो रही है वही नवगीतों का वैशिष्ट्य है. बचे-खुचे को समेटते-बटोरते हुए अपने आप को पुनः तैयार करना एक ज़ुनून की मांग करता है, जीने का ज़ुनून ! प्रस्तुत नवगीत मुखड़े से ही अपनी गति साध लेता है. भूल चुका हर कठिन समय को / खोज रहा हूँ खोई लय को.. 
आगे के बन्द विद्रूप हो गये / हो चले क्षण-पलों के परिदृश्य समक्ष लाते हुए हैं, जो संवेदनशील इस मनुष्य ने भोगे हैं. 
इन्हीं पलों में एक अदद संजय का ढूँढा जाना अवश हो चली परिस्थितियों और अवस्था का इंगित है. संजय सूचना-प्रदाता था. आज दायित्व निर्वहन करता ’संजय’ कहाँ है ? किनके प्रति आश्वस्त हों ? लगभग सभी तो बिके हुए हैं.
या फिर, रथ के पहियों ने कुचली हैं / बांसुरियों की दंत-कथाएँ.. 
इन पंक्तियों के माध्यम से रचनाकार ने अत्यंत गूढ़ तथ्य को कितनी सहजता से समक्ष किया है ! कृष्ण के बारे में प्रचलित हो चुकी समस्त कोमल-कथाओं के सापेक्ष भीष्म के विरुद्ध कृष्ण के नये किन्तु अतुकान्त रूप को प्रस्तुत करते हुए कितनी गहरी बात कही है ! अद्भुत ! 
आपाधापी, छीन-झपट में / तन-मन क्या, आत्मा तक झोंकी / किन्तु मिला क्या, यह असफलता / अनचाही शैया तीरों की / धीरे-धीरे पल-पल मरते / देख रहा हूँ मृत्युंजय को 
कवि ने भीष्म के कुल प्रयास और उसके गूढ़ चरित्र को स्वर दे कर अपने भीतर के उस मनुष्य की कही सुनाता हुआ दिख रहा है, जो अपनी किंकर्तव्यविंमूढ़ता और अपने विभ्रम को दायित्व का मुखौटा दे कर हर तरह के असहज कर्म को सार्थक बताने की कुटिल चाल चलता है. कहना न होगा, भीष्म महाभारत का एक क्लिष्ट पात्र है जो अपनी समस्त कमियों को सात्विकता का जामा पहनाता है. भीष्म की स्वामिभक्ति तक दोयम दर्ज़े की रही है. इसतरह के आचरण के अनुकरण के पश्चात स्वयं को ’धीरे-धीरे पल-पल मरते’ महसूस करना अतिशयोक्ति भी होगी क्या ? 
अंतिम बन्द तो मानो जीवन के सनातन स्वरूप को सापेक्ष करता हुआ अकर्म की दशा बताता हुआ है - जीने को है एक मरण बस / सहने को विकलांग नियति है ! 
मेरा आशय इतना ही है कि इतने से इस प्रस्तुति की गहनता समझी जा सकती है. 
इस नवगीत में जिस सार्थकता से पौराणिक पात्रों के माध्यम से आजके मनुष्य की मनोदशा को पूरी संवेदना के साथ सस्वर किय अगया है वह श्लाघनीय तो है ही, इस तरह् अके नवगीतों के प्रति अभ्यासरत रचनाकारों के लिए अनुकरणीय भी है. 
कथ्य और शिल्प की कसौटी पर एक सार्थक नवगीत केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय योगेन्द्र दत्त शर्माजी..

-सौरभ पाण्डेय

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