Friday, September 25, 2015

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत

[ कृपया इस गीत पर विचार करें।क्या इस गीत को लिखते हुए गीतकार ने सम्यक् दृष्टि अपनायी है?निचले तबके को सम्बोधित करते हुए गीतकार किस मानसिकता से ग्रसित है?क्या माना जाए कि गीत नवगीत में सवर्णवादी मानसिकता हावी है?
-रमाकान्त यादव ]

शैलेन्द्र शर्मा का नवगीत-
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रमधनिया की जोरू धनिया
जीत गई परधानी में
रमधनिया की पौ-बारा है
आया ' ट्विस्ट ' कहानी में

पलक झपकते कहलाया वो
रमधनिया से रामधनी
घूरे के भी दिन फिरते हैं
सच्ची-मुच्ची बात सुनी

लम्बरदार- चौधरी रहते
अब उसकी अगवानी में

जो बेगार लिया करते थे
आदर से बैठाते हैं
उसकी बाँछें खिली देखकर
अंदर से जल जाते हैं

तिरस्कार की जगह शहद है
उनकी बोली-बानी में

पाँच साल के भीतर-भीतर
झुग्गी से बन गया महल
उसकी ओर न रुख करते थे
वे करते हैं आज टहल

अब वह मौज़ लिया करता है
उनकी गलत- बयानी में

पहले जो डपटा करते थे
उसे देख मुस्काते हैं
वही दरोगा वही बी.डी.ओ.
आकर हाथ मिलाते हैं

आने लगा मज़ा अब उसको
' ऐय्याशी- दीवानी ' में

-शैलेन्द्र शर्मा
( " राम जियावन बाँच रहे हैं " से उद्धरित )

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