Saturday, August 29, 2015

मनोज जैन मधुर

मित्रो, नवगीत विमर्श की गतिविधियाँ प्रभावित करतीं हैं। मैं अपनी एक रचना आप के अवलोकनार्थ मंच पर रख रहा हूँ। यह गीत है या नवगीत मै इसके बारे में नहीं जानता इसका निर्णय आप जैसे समर्थ लोग ही कर सकते हैं।

-मनोज जैन
भोपाल

काश! हम होते नदी के
तीर बाले वट।
हम निरंतर भूमिका
मिलने मिलाने की रचाते।
पांखियों के दल उतर कर
नीड डालों पर सजाते।
चहचहाहट सुन ह्रदय का
छलक जाता घट।

नयन अपने सदा नीरा
से मिला हँस बोल लेते।
हम लहर का परस् पाकर
खिल खिलाते डोल लेते।
मंद मृदु मुस्कान
बिखराते नदी के तट।

साँझ घिरती सूर्य ढलता
थके पांखी लौट आते।
पात दल अपने हिलाकर
हम रूपहला गीत गाते।
झुरमुटों से झांकते हम
चाँदनी के पट।

देह माटी की पकड़कर
ठाट से हम खड़े होते।
जिंदगी होती तनिक सी
किन्तु कद में बड़े होते।
सन्तुलन हम साधते ज्यों
साधता है नट।

-मनोज जैन मधुर

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