Saturday, August 29, 2015

निर्मल शुक्ल

 आदरणीय भारतेन्दु जी यह तो सर्वविदित है कोई भी दो व्यक्ति सोच, विचार, मनन,ज्ञान आचरण, व्यवहार आदि की दृष्टि से एक जैसे नहीं होते. आपकी विद्वता का कौन कायल नहीं होगा ...जिस गीत पर आप यहाँ विमर्ष कर रहे हैं ....उस पोस्ट को आपने अपनी विद्वता के चलते आनन फानन में "नवगीत की पाठशाला" से टिप्पणियों सहित कापी कर के "नवगीत विमर्श"में पोस्ट कर दिया .....आपने सोचा होगा कि कन्धे छिलवाये हुये मित्रों में से चलो एक को उजागर कर दें ...आप इतनी हडबडी में थे कि आपने यहाँ यह भी नहीं देखा कि वह पहले ही सुधार सहित वहीं एडिट किया जा चुका है जहाँ से आपने इसे उठाया था..अभी तक बात आई गई हो चुकी होती किन्तु आज आपने राजेन्द्र वर्मा की पोस्ट पर अपनी विद्वता की छाप छोड़ने का एक बार पुन: प्रयास किया है....मैं, आपकी दष्टि में एक अदना सा तुकबन्दी करने वाला ही सही किन्तु आज मैं आहत हूँ कि मुझे अब इस आयु में पिता पुत्र कुल गोत्र के संबंध में जानकारी प्राप्त करनी पड़ेगी.........

-निर्मल शुक्ल
July 4 at 9:07pm

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