Saturday, August 29, 2015

गीत गागर में नचिकेता का लेख

गीत गागर पत्रिका के अप्रैल-जून २०१५ अंक में नचिकेता द्वारा लिखे गए "केदारनाथ अग्रवाल के गीतों की बनावट और बुनावट" शीर्षक लम्बे लेख की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है.... नचिकेता जी ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों के बहाने गीत पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं.. यह लेख नवगीतकारों को पढ़ना चाहिए.... इस लेख में आपको अपने मन में उठने वाले तमाम प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं..... लेख का एक अंश देखें-
" आज की आधुनिक काव्य-दृष्टि के अनुसार आज की बौद्धिक कविताओं की संरचना जितनी जटिल और उसके अर्थ निर्माण की प्रक्रिया जितनी अबूझ, अमूर्त और अर्थहीन होगी वह उतनी ही श्रेष्ठ कविता होगी। जो कविता पाठकों की समझ में नहीं आयेगी वह प्रभावशाली, कलात्मक और सोद्देश्य क्या खाक होगी ? .... जिस कवि से जनता सीधे संवाद करती हो उसे आज की अबूझ और निरी गद्यात्मक कविता जो व्यापक जन-जीवन से पूरी तरह विस्थापित हो चुकी है, से प्यार कैसे हो सकता है। इसलिए आज की नितान्त जटिल और पहेलीनुमा अबूझ गद्य कविता की वर्तमान स्थित को देखते हुए केदारनाथ अग्रवाल ने क्षुब्ध स्वर में कहा है कि आज-
" कविता को नंगा कर दिया गया है, उसकी रीढ़ तोड़ दी गई है, उसे हर तरह से अपंग कर दिया गया है, उसकी स्वर और ध्वनियाँ छीन ली गईं हैं, उसे भाषायी संकेतबद्धता से वंचित कर दिया गया है, उसे कवि के अचेतन मस्तिष्क में ले जाकर ऊलजलूल में भरपूर भुला-भटका दिया गया है ... अब आज जब सब दफ्तर के बाबू हो गए हैं.. छोटे-बड़े नगरों में खोये हुए और खाये गए हैं.. जनता से कट-कटा चुके हैं.. बोलने में बुदबुदाते हैं... लिखने को कविता लिखते हैं, मगर कविता नहीं लिवर लिखते हैं, नये-नये वाद-विवाद के चक्कर में डालडा के खाली डिब्बे पीटते हैं... करते कुछ नहीं, काफी हाउस में बकवास करते हैं.. पराये ( विदेशी कविता) की नकल में अकल खर्च करते हैं... और कविता को अपनी तरह बेजान बनाते हैं.. भाषा को चीर-फाड़ कर चिथड़े-चिथड़े कर देते हैं।" (गीत गागर, पृष्ठ 44)
[केदारनाथ अग्रवाल के गद्यात्मक कविता पर उनके इन विचारों से आप कहाँ तक सहमत हैं ]

-डा० जगदीश व्योम

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