Saturday, August 29, 2015

भारतेन्दु मिश्र

राजेन्द्र भाई आप सही कह रहे हैं किंतु ये विमर्श शुक्ल जी पर केन्द्रित न हो कर नवगीत पर केन्द्रित है।इस मंच का नाम ही नवगीत विमर्श है।अब शुक्ल जी इसे यदि अपने गीत से अलग करके नही देख रहे तो इसमे क्या किया जाए ?मैने एक भी शब्द उनके लिए नही कहा है। इस गीत रचना के बारे में जो सही लगा बस वही कहा है।किंतु यदि शुक्ल जी को कहीं मेरे किसी शब्द से कष्ट पहुंचा है तो उसके लिए खेद है(हालांकि समीक्षा मे खेद व्यक्त करना भी उचित नही है) वे मेरे लिए आदरणीय हैं। किंतु यह भी सच है कि तमाम मंचीय आत्ममुग्ध लोग(जिन्हे मैने छिले हुए कन्धे वाले कह्ने की ओर संकेत किया है ) लगातार अपने गीतो को नवगीत साबित करने की योजना मे लगे रहे हैं। मैने भी कई गीत और नवगीत लिखे हैं।अनुभव की सीढी मे भी कई गीत और नवगीत एकत्र संकलित भी हैं।..मेरी समझ से किसी भी प्रकाशित हो चुकी रचना पर बात करना व्यक्ति पर बात करना नही होता है।..आप सब नही चाहते हैं तो इस गीत पर मेरी ओर से बात समाप्त।

-भारतेन्दु मिश्र
July 5 at 6:29am

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