Saturday, August 29, 2015

भारतेन्दु मिश्र

देखिए समीक्षा रचनाकारो को बहुत अच्छी नहीं लगती हैं। जो अच्छी लगती है वो समीक्षा नहीं होती है उसे प्रापर्टी डीलिंग जैसा कुछ समझ लें। विमर्श के लिए रचना को समझना जितना आवश्यक है उतना ही रचनाकार के लिए आवश्यक है कि वो रचना विधान की बारीकियों को समझे। सारे गीतकार/नवगीतकार एक ही जैसा क्यों सोचें..यदि सब एक जैसा लिखने लगें तो फिर मौलिकता कैसे निश्चित की जाएगी ?.विविधता ..ये नवगीत माने पाठ्यचर्या वाला गीत केवल गाये जाने वाला गीत नहीं।

-भारतेन्दु मिश्र
July 9 at 8:23pm 

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