Sunday, November 27, 2005

अगस्त २०१५ तक

== नवगीत पर अगस्त २०१५ तक हुआ विमर्श  ==



नवगीत विमर्श समूह पर नवगीत को केन्द्र में रखकर चर्चा कर सकते हैं.... नवगीत से जुड़ा कोई प्रश्न पूछ सकते हैं..... नवगीत पर अपने विचार रख सकते हैं......

डा० जगदीश व्योम

Bhartendu Mishra व्योम जी,सही समय पर सही निर्णय लिया आपने।

सुन्दर शृंगार गीत है बधाई।लेकिन यह नवगीत नही हैं। श्रंगार एक प्रकार से नैसर्गिक सनातन मूल्य है और इस विषय वस्तु पर अब से पहले करोडो की संख्या मे गीत लिखे जा चुके हैं।नवगीत विमर्श मे परंपरा मे भी नवता का अनिवार्य आग्र्ह होता है ।यदि वह नही दिखाई देता है तो उसे हम नवगीत कैसे कहेंगे।इस गीत की भाषा भी छायावादी काव्य भाषा से आगे बढी हुई नही दिखती है।आदरणीय शुक्ल जी का सम्मान करते हुए असहमत हूं।शुक्ल जी श्रेष्ठ नवगीतकार है लेकिन उनका यह गीत नवगीत नही लगता। इससे नई पीढी के नवगीतकारो मे भ्रम पैदा न हो केवल इस लिए यह टिप्पणी कर रहा हूं।
.एक गीत यह भी....
सागर की प्यास...
बेसुध हैं
रोम रंध्र
विकल मनाकाश
मैं ठहरा
तुम ठहरे
सागर की प्यास
चंदा की कनी कनी
चंदन में सनी सनी
हौले से उतर आई
आंगन में छनी छनी
मैं भीगा
तुम भीगे
सारा अवकाश
मेंहदी के पात पात
रंग लिए हाथ हाथ
चुपके से थाप गये
सेमर के गात गात
मैं डूबा
तुम डूबे
आज अनायास
सांसो की गंध गंध
मदिर मदिर मंद मंद
जाने कब खोल गए
तार तार बंध बंध
मैं भूला
तुम भूले
सारा इतिहास
निर्मल शुक्ल.......
२३ जून २०१५.

Nirmal Shukla आ०भारतेन्दु जी आप ठीक कह रहे हैं.इसे मैने सुधार दिया है यह गीत मेरे गीत संग्रह 'नील वनो के पार'मे संग्रहीत है .शीर्षक में ,भूलवश गीत के स्थान पर नवगीत पोस्ट हो गया था.जिसे अब सुधार दिया गया है.
June 23 at 6:30pm · Like · 2

Bhartendu Mishra जी आपने सही किया।किंतु इसी बहाने नवगीत और गीत का फर्क समझने वाले मित्रो /किसी मित्र को भी आप और हम सही दिशा दे सकते हैं।मेरा लक्ष्य आपके गीत की समीक्षा के साथ ही इस अंतर को भी दोस्तो के सामने रखना था।आप तो नवगीत पर लगातार काम करते आ रहे हैं। आपकी समझ ...See More
June 23 at 7:11pm · Unlike · 4

Rajendra Verma पिता और पुत्र के सम्बंध के संकेत से गीत और नवगीत को आपने बखूबी समझा दिया है.
July 4 at 7:33pm · Unlike · 3

Bhartendu Mishra जी राजेन्द्र जी दोनो एक कुल गोत्र के होते हुए भी एक कैसे हो सकते हैं।दोनो की धमनियो मे प्रवाहित रक्त ,नाक -नक्श,आवाज-,आचरण -व्यवहार आयु -विचार आदि एक ही नही हो सकते।..लेकिन कुछ मित्र गीत को ही नवगीत साबित करने मे हलाकान हुए जा रहे हैं और अपना कन्धा छिलवाए ले रहे हैं।..तो समझदारी से स्वीकार करना चाहिए किए दोनो आलग है।
July 4 at 7:42pm · Edited · Like · 1

Nirmal Shukla आदरणीय भारतेन्दु जी यह तो सर्वविदित है कोई भी दो व्यक्ति सोच, विचार, मनन,ज्ञान आचरण ,व्यवहार आदि की दृष्टि से एक जैसे नहीं होते. आपकी विद्वता का कौन कायल नहीं होगा ...जिस गीत पर आप यहाँ विमर्ष कर रहे हैं ....उस पोस्ट को आपने अपनी विद्वता के चलते आनन...See More
July 4 at 9:07pm · Like · 3

Jagdish Vyom जिस रचना पर यहाँ विमर्श हो रहा है.... उसे निर्मल शुक्ल जी ने गीत ही कहा है नवगीत नहीं.... इस विषयक कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए......
July 4 at 9:24pm · Like · 3

Manoj Jain Madhur कृपया वे कौन से मानक है जिनके आधार पर उक्त रचना को गीत संज्ञा से नवाज गया यह भी स्पस्ट करें कि प्रस्तुत रचना नवगीत क्यों नहीं है?
July 4 at 10:15pm · Unlike · 1

Rajendra Verma भारतेंदु जी! आप विधा के आधिकारिक विद्वान हैं, पर निर्मल जी वरिष्ठ रचनाकार हैं- वे गीत और नवगीत में अंतर समझते हैं. ग्रुप में रचना पोस्ट करने में उनसे त्रुटि हुई है जिसे उन्होंने सुधार भी लिया था- इसलिए उनकी रचना को केंद्र में रखकर नवगीत पर विमर्श अपेक्षित न था. बहरहाल, अब इसे यहीं समाप्त किया जाना उपयुक्त रहेगा.
July 4 at 10:53pm · Unlike · 4

Bhartendu Mishra राजेन्द्र भाई आप सही कह रहे हैं किंतु ये विमर्श शुक्ल जी पर केन्द्रित न हो कर नवगीत पर केन्द्रित है।इस मंच का नाम ही नवगीत विमर्श है।अब शुक्ल जी इसे यदि अपने गीत से अलग करके नही देख रहे तो इसमे क्या किया जाए ?मैने एक भी शब्द उनके लिए नही कहा है। इस गी...See More
July 5 at 6:29am · Edited · Unlike · 3

०००००

सुधीर कुमार
July 5
'निर्मल चन्द निर्मल'- का एक गीत है जो गीत गागर में प्रकाशित हुआ है.....
"लगे बहुत आघात
हृदय के ताले टूट गये
......
.....
अरमानों का धुआँ उठ रहा
राख बची बाकी
वृक्ष हरा न रहा
न कोई शाख बची बाकी
पत्ते विद्रोही हल्के से
झोंके में झरते
संस्कृतियों के बसन
हाथ से अपने छूट गये"
इस गीत में- अरमानों का धुआँ अभी उठ रहा है..... जब तक धुआँ उठ रहा है तब तक राख कैसे हो सकती है...... यानी धुआँ का उठना जब बन्द होगा राख तभी कही जायेगी जब तक धुआँ है तब तक वहाँ आग हो सकती है, चिनगारी हो सकती है राख तो हो ही नहीं सकती........ आगे देखें- वृक्ष हरा नहीं रह गया है.... न ही उसकी कोई शाख बची है अर्थात वृक्ष की शाखाये भी टूट चुकी हैं वह केवल ठूँठ रह गया है.... जब शाख ही नहीं बची तो अगली पंक्ति में पत्ते कहाँ से आ गये........

ilendra Sharma यह 21वीं सदी है .साहित्य में इस तरह की असन्गत बातों से बचना चाहिये
July 5 at 9:18am · Unlike · 1

Jagdish Vyom गीत लिखने के बाद उसका पहला आलोचक खुद बनकर उसे परख लेना चाहिए.....
July 5 at 5:49pm · Like · 1

Jairam Jay geet ki pahli shart hai sahaj saral yatharth hona

०००००

Manoj Jain Madhur
July 5
मित्रो नवगीत विमर्श की गतिविधियाँ प्रभावित करतीं हैं।मैं अपनी एक रचना आप के अवलोकनार्थ मंच पर रख रहा हूँ ।
यह गीत है या नवगीत मै इसके बारे में नहीं जानता इसका निर्णय आप जैसे समर्थ लोग ही कर सकते है।
*******
मनोज जैन
भोपाल
**********************
काश! हम होते नदी के
तीर बाले वट।
हम निरंतर भूमिका
मिलने मिलाने की रचाते।
पांखियों के दल उतर कर
नीड डालों पर सजाते।
चहचहाहट सुन ह्रदय का
छलक जाता घट।
***
नयन अपने सदा नीरा
से मिला हँस बोल लेते।
हम लहर का परस् पाकर
खिल खिलाते डोल लेते।
मंद मृदु मुस्कान
बिखराते नदी के तट।
****
साँझ घिरती सूर्य ढलता
थके पांखी लौट आते।
पात दल अपने हिलाकर
हम रूपहला गीत गाते।
झुरमुटों से झांकते हम
चाँदनी के पट।
****
देह माटी की पकड़कर
ठाट से हम खड़े होते।
जिंदगी होती तनिक सी
किन्तु कद में बड़े होते।
सन्तुलन हम साधते ज्यों
साधता है नट।

मनोज जैन मधुर

iram Jay Sunder navgeet badhai
July 7 at 6:17am · Like · 1

Saurabh Pandey इस गीत के लिए हार्दिक बधाई भाईजी.. ऐसी ही चाह हम सभी के मन में है
July 7 at 7:42pm · Like · 2

Jagdish Vyom यह गीत है या नवगीत है .... अपने विचार रखें ताकि अन्य रचनाकारों को भी नवगीत को समझने में सुविधा रहे.....
July 8 at 1:01pm · Like · 1

Ramshanker Verma नवगीत के विश्लेषण और परख पर मेरा अधिक अधिकार नहीं है। पर एक सुंदर प्रवाहमान सांगीतिक लय के साथ मुझे नवगीत का साक्षात्कार हो रहा है। गीत की उदात्तता और नवगीत के विम्ब लिए एक खूबसूरत नवगीत। कम से कम मैं तो अभी इतना सुंदर नवगीत नहीं लिख पाया हूँ।
July 8 at 5:57pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra बधाई मनोज जी,अच्छे नवगीत के लिए आपतो मेरे प्रिय नवगीतकार हैं।।
July 9 at 8:34am · Unlike · 2

Jagdish Vyom टिप्पणी के लिए आभार डा० भारतेन्दु जी ...... इसमें ऐसा क्या है कि इसे एक अच्छा नवगीत कहा जा सकता है.....
July 9 at 9:43am · Like · 2

Jagdish Prasad Jend मेरे विचार से इस गीत को नवगीत नहीं कहा जाना चाहिए। इसमें न तो कथ्य की नवता है न ही शिल्प की और न ही युगबोध का कोई संकेत। यह एक काल्पनिक और वायवीय चाहत का प्रकटीकरण है जिसका मानवीय संवेदनात्मक बिन्दुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर भी अपने शैल्पिक कसाव और भाषा के स्तर पर एक उत्तम गीत है जिसके लिए मनोज जैन 'मधुर' सराहना और बधाई के पात्र हैं । -जगदीश पंकज
July 9 at 3:13pm · Like · 3

Manoj Jain Madhur सबसे पहले तो आभार आप जैसे महापुरुषों का जिन्होंने मुझ जैसे तुकबंदिये की रचना को आदरणीय मंच पर चर्चा के लिए अनुमोदित कर दिया।
उनका भी आभार जिन्हें यह तुकबंदी पसंद आई उनका तो विशेष आभार जिन्होंने रचना को गीत नही माना उनका कोटि कोटि आभार जो इसे नवगीत नहीं...See More
July 9 at 6:23pm · Edited · Unlike · 2

Manoj Jain Madhur मै आभारी हूँ सर्व श्री भाई जयराम जय जी सौरभ पाण्डेय जी जगदीश व्योम जी रामशंकर वर्मा जी आदरणीय भारतेंदु मिश्र भाईसाहब का जगदीश पंकज जी साथ ही मेरी तुकबंदी पसंद करने बाले सभी मित्रों का।
July 9 at 6:28pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra व्योम जी,आपका प्रश्न स्वाभाविक है किंतु गीत और नवगीत के पक्ष और विपक्ष मे तर्क करने के लिए यह मंच बहुत उपयुक्त नही जान पडता क्योकि यहां हर गीतकार अपना प्रवाचक भी है तर्क पूर्ण है या नही इस का विवेक किए बिना ही।इसके मै पहले भी मनोज जैन की पुस्तक पढ चु...See More
July 9 at 7:52pm · Like · 1

Jagdish Vyom जी हाँ डा० भारतेन्दु जी... आप सही कह रहे हैं..... गीत और नवगीत के अन्तर को समझना ही होगा
July 9 at 8:00pm · Like · 2

Jagdish Vyom लेकिन ये चर्चा, विमर्श और बहस इतनी शास्त्रीय न हो कि सामान्य रूप से यह ऊपर ऊपर से ही निकल जाये.... सहजता के साथ सरल भाषा में इस अन्तर को नये रचनाकारों को बताना जरूरी है....
July 9 at 8:13pm · Like · 3

Jagdish Vyom मनोज जी की इस रचना में नदी के किनारे पर वट वृक्ष बनने की आकांक्षा कवि की है वह किसी वैयक्तिक सुख के लिए नहीं बल्कि पक्षियों को आश्रय देने की चाह के लिए है ... कवि जन सामान्य की चिन्ता करता है और उनके सामान्य कष्ट दूर करने की आकांक्षा रखता है....रचना का यह कथ्य उसे नवगीत के पाले में लाकर खड़ा कर देता है.....
July 9 at 8:22pm · Like · 5

Bhartendu Mishra देखिए समीक्षा रचनाकारो को बहुत अच्छी नही लगती हैं।जो अच्छी लगती है वो समीक्षा नही होती है उसे प्रापर्टी डीलिंग जैसा कुछ समझ लें। विमर्श के लिए रचना को समझना जितना आवश्यक है उतना ही रचनाकार के लिए आवश्यक है कि वो रचना विधान की बारीकियो को समझे।सारे गीतक...See More
July 9 at 8:23pm · Unlike · 4

Manoj Jain Madhur आदरणीय भारतेंदु मिश्र भाईसाहब सचमानिये मैं आलोचना मे पूरी आस्था रखता हूँ बेशर्ते वह पूरी निष्पक्षता के साथ भर हो मेरे इस नवगीत पर आने बाली आलोचना का में स्वागत करता हूँ।
July 9 at 9:55pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra जी व्योम जी आपने सही चिन्हित किया।कथ्य नया नही है, न हो किंतु पारंपरिक विषय का नवाचार /भंगिमा की नवता भी गीत को नये पाठ्य के साथ नवगीत बनाती है।
July 9 at 10:16pm · Unlike · 3

DrVinay Bhadauria मित्रों मनोज जैन मधुर जी का गीत आज अचानक पढ़ा ,सभी विद्वानों के विमर्श को भी।मेरे विचार से इसमें नवगीत के समस्त लछण है।और अब समय आ गया है कि गीत नवगीत के पचडे में न पड़ कर श्रेष्ठ सृजन की ओर ध्यान दिया जाय। ज्यादानवता के चक्कर मे कहीं गीत की बधिया न बै...See More
July 10 at 7:18am · Unlike · 2

Jagdish Vyom गीत और नवगीत के अन्तर की खाई को इतना चौड़ा भी न कर दें कि दोनों के मध्य संवाद भी संभव न रह सके..... साठ सत्तर साल पहले के एक युवा में और आज के युवा में जो अन्तर है वहीं अन्तर गीत और नवगीत में भी है.....
July 10 at 12:14pm · Like · 1

Ramshanker Verma मुझे नहीं लगता कि मनोज जैन मधुर जी को अपने नवगीत के नवगीत होने में कोई संशय है। वे इसके बहाने नवगीत पर विमर्श चाहते थे। जहां तक मेरी समझ है सार्थक मुखड़ा, अंतरे सहित रचना नवगीत के शिल्प में है। पर नवता और युगबोध के नाम पर हम नवगीत की सीमारेखा क्यों खीं...See More
July 10 at 5:06pm · Unlike · 4

०००००

Sanjiv Verma 'salil'
June 4
हिंदी गीत-नवगीत : एक चर्चा
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ जो गीत का आदि रूप हैं गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा।
संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा. सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
विदेशी आक्रमणों के समय में स्थानीय गीत और दोहा तथा विदेशी ग़ज़ल और शेर तथा अन्य काव्य रूपों (सोंनेट, हाइकु आदि) के गले मिलने से आरोह-अवरोह और तुकांत-पदांत में नव प्रयोग तथा परिवर्तन स्वाभाविक रूप से हुए किन्तु 'लय' को तब भी यथाशक्ति साधने के प्रयास हुए। विस्मय यह की हिंदी गीति काव्य धारा कुरल, अभंग जैसे अहिन्दी भारतीय छंदों को गल्र नहीं लगा सकी। भाषिक सम्मिलन ने साहित्य सृजन की गंगो-जमुनी धारा से समन्वय सलिला को पुष्ट किया।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर, आदि गीत रूपों में तुकांत-पदांत के समान्तर लय भी सध्या रही. यह अवश्य हुआ की सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।
खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद की शुद्धता या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने संस्कृत - बांगला साहित्य लोक संगीत तथा रवीन्द्र संगीत पर अपने असाधारण अधिकार और अद्वितीय प्रतिभा के बल पर गीत को पारम्परिक छंद विधान के पाश से मुक्त कर मुक्त छंद की दिशा दिखाई। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गए। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकर सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। किताबी विद्वानों की अमरता की चाह ने अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण के बाद नई कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी, गीत के मरने की घोषणा करनेवाले स्वयं काल के गाल में समां गए पर गीत लोक मानस में जीवित रहा।
गीत और नवगीत :
गीत और नवगीत दोनों ही हिंदी गीतिकाव्य के अंग हैं। अन्य अनेक उपविधाओं की तरह यह दोनों भी कुछ समानता और कुछ असमानता रखते हैं। नवगीत नामकरण के पहले भी नवगीत रचे गए किन्तु तब गीतों में समाहित कहे गये। आज भी गीत रचे जा रहे हैं। अनेक रचनाएँ ऐसी भी हैं जिनमें गीत और नवगीत दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं।
गीत काव्य रचना की एक विधा है जिसमें एक स्थाई (मुखड़ा, टेक) और कुछ अंतरे होते हैं। हर अंतरे के बाद स्थाई दुहराया जाता है। सामान्यतः स्थाई और अँतरे का छंद विधान, पदभार और गति-यति समान होती है। गीत के कथ्य के अनुसार रस, प्रतीक और बिम्ब चुने जाते हैं।
नवगीत ऐसी पद्य रचना है जिसमें पारिस्थितिक शब्द चित्रण (विशेषकर वैषम्य और विडम्बना) मय कथ्य को प्रस्तुत किया जाता है। नवगीत में भी स्थाई तथा अन्तरा होता है किन्तु प्रायः उनका छंद विधान या गति-यति भिन्नता लिये होते हैं। नवगीत का कथ्य काल्पनिक रूमानियत और लिजलिजेपन से प्रायः परहेज करता है। वह यथार्थ की धरती पर 'है' और 'होना चाहिए' के ताने-बाने इस तरह बुनता है की विषमता के बेल-बूटे स्पष्ट रूप से सामने आ सकें। गीत के प्रासाद में छंद विधान और अंतरे का आकार व संख्या उसका विस्तार करते हैं। नवगीत के भवन में स्थाई और अंतरों की सीमित संख्या और अपेक्षाकृत लघ्वाकार व्यवस्थित कक्षों का सा आभास कराते हैं। गीत में शिल्प को वरीयता प्राप्त होती है जबकि नवगीत में कथ्य प्रधान होता है।गीत के अंतरे राज प्रसाद के विशाल सभागारों और कक्षों की तरज सुसज्जित होते हैं, इसलिए अलंकार का महत्त्व नवगीत की तुलना में अधिक होता है.
गीत में कथ्य वर्णन के लिए प्रचुर मात्र में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के उपयोग का अवकाश होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करना कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है।
भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता है तो नवगीत में गेयता को महत्व मिलता है।
गीत में अंतरों की संख्या विषय और कथ्य के अनुरूप हो सकती है। अँतरे में पंक्ति संख्या तथा पंक्ति में शब्द संख्या भी आवश्यकतानुसार घटाई - बढ़ाई जा सकती है। नवगीत में सामान्यतः २-३ अँतरे तथा अंतरों में ४-६ पंक्ति होती हैं। गीत तथा नवगीत दोनों में एक समानता मुखड़े की पंक्ति और अँतरे की अंतिम पंक्ति में पदांत और / या तुकांत का समभारीय होना है ताकि अँतरे के पश्चात मुखड़े को दुहराया जा सके। गीत में पारम्परिक छंद चयन के कारण छंद विधान पूर्वनिर्धारित गति-यति को नियंत्रित करता है। नवगीत में छान्दस स्वतंत्रता होती है अर्थात मात्रा सन्तुलनजनित गेयता और लयबद्धता पर्याप्त है।
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Sanjiv Verma 'salil' व्योम जी धन्यवाद. आशा है व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, स्वरुचि को श्रेष्ठ और सर्वोच्च प्रतिपादित करने, मत-भिन्नता को ख़ारिज करने के स्थान पर समझने का प्रयास यहाँ होगा.
June 4 at 8:17am · Unlike · 2

Jagdish Vyom जी हाँ संजीव जी, सभी से यही उम्मीद है...... हमें एक दूसरे के विचारों से न सहमत होते हुए भी उनका सम्मान करना चाहिए.....
June 4 at 8:25am · Like

Ramakant Yadav गीत और नवगीत की अच्छी व्याख्या।समझने लायक विमर्श।बधाई सलिल जी को।
June 5 at 10:43am · Like · 1

Bhartendu Mishra सलिल जी का विवेचन अच्छा है किंतु इसमे यह भी जोडा जा सकता है कि गीत का मतलब फिल्मीगीत/लोक गीत/उत्सव आदि के अवसर पर लिखे जाने वाले गीत/आदि से भी जोडा जा सकता है किंतु नवगीत को इन सबसे नही जोडा जा सकता।माने नवगीत समग्र मानवीय चेतना या सरोकारो का अधुनातन ग...See More
June 6 at 6:33am · Unlike · 2

Ranjana Gupta बहुत ज्ञान वर्धक पोस्ट !
June 6 at 7:31am · Like

अवनीश सिंह चौहान achchha laga
June 6 at 7:43am · Like

Rajendra Verma सम्यक जानकारी है. एक वाक्य में कहें, तो गीत वैयक्तिक अनुभूति में डूबी भाव-दशा की रचना है और नवगीत वैयक्तिक अनुभूति समेटे प्रातिनिधिक सरोकारों की. गीत की आत्मा उसकी लय है, जबकि नवगीत की आत्मा उसके कथ्य में बसती है.
July 4 at 8:24pm · Unlike · 2

Ramesh Gautam एक सार्थक विवेचना ,गीत ,नवगीत के कथ्य और शिल्प पर समान्तर चर्चा स्वरूप गत अंतर को समझने में सहायक
July 5 at 1:07pm · Unlike · 2

Jairam Jay Geet aur navgeet ki paribhasha ko spast karta mahatvpurn aalekh
July 7 at 6:27am · Unlike · 1

Ramshanker Verma एक सार्थक और उपयोगी आलेख।
July 8 at 5:58pm · Like

Saurabh Pandey इस आलेख के लिए न म न, आदरणीय
July 8 at 8:08pm · Like

Ashwini Kumar Vishnu गीत नवगीत की प्रकृति को सुंदरता से विश्लेषित करता महत्वपूर्ण आलेख
०००००

Jagdish Vyom
June 4
सभी सदस्यों से अनुरोध है कि यहाँ नवगीत विषयक अपनी राय, नवगीत विषयक प्रश्न, नवगीत विषयक टिप्पणी, चर्चा आदि में सहभागिता करें..... यह आवश्यक नहीं कि आप किसी की बात से पूरी तरह सहमत हों.... परन्तु इसे वैयक्तिक न बनायें.... सभ्य भाषा का प्रयोग करें...... नवगीत को अनेकानेक लोग समझना चाहते हैं...... यहाँ हम सब मिलकर अपनी अपनी सामर्थ्य से नवगीत के इर्द गिर्द घिरे कोहरे को सहज विमर्श के द्वारा हटाने में सफल हो सकेंगे..... इसी अनुरोध के साथ सभी सदस्यों का स्वागत है

Unita Sachidanand धन्यवाद व्योमजी
June 4 at 8:26am · Unlike · 1

Yogendra Vyom सार्थक, महत्वपूर्ण व दस्तावेज़ी अभिनव पहल के लिए बधाई। आशा है मंथन से कुछ अमृत निकलेगा।
June 4 at 9:22am · Unlike · 1

कल्पना रामानी मैं यहाँ सभी विद्वानों की चर्चा को एक जिज्ञासु रचनाकार बनकर पढ़ना और लेखन में यथाशक्ति उतारना चाहती हूँ। मेरे मन में उठाते हुए अनेक प्रश्नों का उत्तर यहीं मिल रहा है। इस महत्वपूर्ण समूह से जोड़ने हेतु व्योम जी का हार्दिक आभार

००००००

Jagdish Vyom
July 19 · Edited
इस नवगीत पर कुछ विमर्श करें--
== [ विमर्श के लिए समय 25 जुलाई 2015 तक ] ==
भूल चुका हर कठिन समय को
खोज रहा हूँ खोई लय को
चाह रहा कुछ और देखना
पर कुछ और देखना पड़ता
नैतिकता की अग्नि-परीक्षा
निष्ठा-धर्म शूल-सा गड़ता
चलते हुए महाभारत में
याद कर रहा हूँ संजय को
अंधभक्ति की अंध प्रतिज्ञा
अंधा युग, अंधी मर्यादा
कपट-कवच का महिमा-गायन
सच का उतरा हुआ लबादा
देख रहा हूँ मुँदे नयन से
मूल्यों के इस क्रय-विक्रय को
ढहते बरगद, उखड़े गुंबद
ध्वस्त शिखर, विपरीत हवाएँ
रथ के पहियों ने कुचली हैं
बांसुरियों की दंत-कथाएँ
हारे हुए विजेताओं में
ढूँढ़ रहा हूँ शत्रुंजय को
आपाधापी, छीन-झपट में
तन-मन क्या, आत्मा तक झोंकी
किन्तु मिला क्या, यह असफलता
अनचाही शैया तीरों की
धीरे-धीरे पल-पल मरते
देख रहा हूँ मृत्युंजय को
घनी धुंध में पता न चलता
कैसी, कहाँ काल की गति है
जीने को है एक मरण बस
सहने को विकलांग नियति है
सोच रहा हूँ, कैसे चीरूँ
भीतर-बाहर छाये भय को
-योगेन्द्र दत्त शर्मा

Ranjana Gupta सुंदर और सामयिक पर,आत्मा शब्द की जगह कुछ और होता तो खटकती नही लय ! शेष क्षमा यदि कुछ गलत कहा !
July 19 at 10:47am · Edited · Unlike · 1

RV Acharya महाभारत के मिथक का प्रयोग करते हुए समकालीन व्वस्था पर प्रभावी कटाक्ष है । सुंदर एवं सार्थक. नवगीत ।
July 19 at 10:56am · Unlike · 3

Ramakant Yadav हर कठिन समय को भूल चुका और खोई लय को खोजने वाला चरित्र पूरे गीत में कहीं नहीं दिखा।अतिशय निराशा में अतीत के महाभारत को वर्तमान तक खींचा गया है।तब के महाभारत ने सत्य को कहीं कुछ अंशों तक बचाया भी था पर इस गीतकार को सब कुछ ध्वस्त हुआ ही नजर आता है।फिर मुखड़ा क्या कहता है पता नहीं।लगता है गीतकार कहना चाहता था कुछ और पर कह गया कुछ और।जीने को जब मरण ही बचा है तो फिर क्या सोचना कैसे सोचना?
July 19 at 11:20am · Unlike · 2

Kavimukund Kaushal बेहतर और कसा हुआ छन्द, पौराणिक प्रतीक और वर्तमान स्थितियों का सुन्दर चित्रण ।
बधाई।
July 19 at 6:50pm · Like · 1

Kavimukund Kaushal रंजना गुप्ता जी की बात से सहमत।
July 19 at 6:52pm · Like · 1

Ved Sharma आदरणीय यादव जी कविता गद्य तोनहीं होती कवि जिस लय को पाना चाहताहै वह है कहाँ पात्र बदलते हैं पर मूल्य ?...स्थितियां इतने समय बाद भी .....शिल्प शब्द चयन कहन अपनी टिप्पणी पर फिर से विचार करें इस तरह के गीत आजकल गिने चुने लोग ही लिख रहे हैं/ लिख सकते हैं ........
July 19 at 8:01pm · Unlike · 2

Jagdish Prasad Jend जब कोई रचनाकार अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए प्रासंगिक मिथकीय प्रतीकों का अपनी रचना में प्रयोग करता है तब उसके सामने सत्य को सशक्त रूप में प्रस्तुत करने की सदिच्छा होती है। मिथकीय पात्र ,कथानक तथा भूमिकाएं अपने अभिधात्मक अर्थ के बजाय लाक्षणिकता के साथ रचना में प्रयोग करते हुए रचनाकार कहाँ तक सफल होता है यह उसके व्यक्तिगत और रचनात्मक अभ्यास और कौशल पर निर्भर करता है। कोई भी व्यक्ति रचनाकार के सृजन की सार्थकता से सहमत या असहमत हो सकता है किन्तु रचनाकार की नीयत,आशय और उसके मंतव्य की पृष्ठभूमि में ही रचना का मूल्यांकन करना उचित है। योगेन्द्र शर्मा जी के प्रस्तुत गीत में प्रयुक्त महाभारत के प्रासंगिक बिन्दुओं का प्रयोग समकालीन यथार्थ को व्यक्त करने का प्रयास है। रचना के अंत में गीतकार अपने आप से प्रश्न करता हुआ उत्तर के लिए पाठक को सोचने के लिए बाध्य करता है। यहाँ विकल्पहीनता नहीं बल्कि समय का बहुआयामी विद्रूप यथार्थ है जिसका किसी एक विकल्प से मुकाबला नहीं किया जा सकता। पूरे गीत को समग्रता में समझने के लिए अंत से आरम्भ करते हुए उन स्थितियों तक आएं जिनमे आज का भूमंडलीकृत नागरिक जीवन की आपाधापी में फंस कर स्वयं से ही असंतुष्ट होकर स्वयं से ही प्रतिस्पर्धा कर रहा है और असफल होने पर आज के हताशा,अवसाद और असंतोष जैसे युगीन रोगों से जूझ रहा है। आज जब सत्य का वही रूप दिखाया जा रहा है जो दिखाने वाले प्रसार माध्यमों और उनके आकाओं के अनुकूल है तब रचनाकार किसी संजय के मिथक का प्रयोग कर रहा है तो यह प्रयोग उचित ही है। जब आज का यथार्थ अपनी तीव्रता में अतीत की स्मृतियों के भयावह यथार्थ से भी अधिक गहन और तीव्र है और उसकी अनुभूतियों की लय भी विगत की अनुभूतियों से अधिक सशक्त है तब पुरानी लय कैसे याद आएगी? आज जब नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन और सांस्कृतिक प्रदूषण का ख़तरा बढ़ता जा रहा है तब निरंतर जटिल होते समयगत यथार्थ को योगेन्द्र दत्त शर्मा द्वारा अपनी रचना में बहुत सफलता से अभिव्यक्त किया गया है। रचना में व्यक्त आशय को ग्रहण करके हर व्यक्ति अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्या करने को स्वतंत्र है। आवश्यक नहीं कि मेरे विचार से सबकी सहमति संभव हो किन्तु प्रस्तुत नवगीत कथ्य,शिल्प,भाषा , आशय और सम्प्रेषणीयता के बिन्दुओं पर एक उत्कृष्ट रचना है। --जगदीश पंकज
July 19 at 8:28pm · Like · 4

Jai Chakrawarti भाषा, कथ्य और शिल्प के स्तर पर समृद्ध नवगीत। गीतकार को हार्दिक बधाई!
July 19 at 8:56pm · Like · 1

Brij Nath Srivastava भाषा, कथ्य और शिल्प के स्तर पर समृद्ध नवगीत। गीतकार को हार्दिक बधाई!
July 20 at 3:39pm · Like

Indra Sengar shri krushna tivari ki tulna mein bahut halka hai.tathapi achchha hai.
July 20 at 5:31pm · Like

Bhartendu Mishra संवेदनशील मनुष्य की विवशता को मुखर करता कढिन समय का नवगीत है।
July 22 at 8:26am · Like

Jagdish Vyom कठिन समय से सघर्ष करते एक संवेदनशील मनुष्य की पीड़ा को अभिव्यंजित करता नवगीत है...." चाह रहा कुछ और देखना
पर कुछ और देखना पड़ता" एक नौकरशाह इन पंक्तियों को अपने मन की पंक्तियाँ भी कह सकता है।
July 22 at 9:20am · Like · 1

Saurabh Pandey इस नवगीत के मुखड़े से जैसी सकारात्मकता निस्सृत हो रही है वही नवगीतों का वैशिष्ट्य है. बचे-खुचे को समेटते-बटोरते हुए अपने आप को पुनः तैयार करना एक ज़ुनून की मांग करता है, जीने का ज़ुनून ! प्रस्तुत नवगीत मुखड़े से ही अपनी गति साध लेता है. भूल चुका हर कठिन समय को / खोज रहा हूँ खोई लय को..
आगे के बन्द विद्रूप हो गये / हो चले क्षण-पलों के परिदृश्य समक्ष लाते हुए हैं, जो संवेदनशील इस मनुष्य ने भोगे हैं.

इन्हीं पलों में एक अदद संजय का ढूँढा जाना अवश हो चली परिस्थितियों और अवस्था का इंगित है. संजय सूचना-प्रदाता था. आज दायित्व निर्वहन करता ’संजय’ कहाँ है ? किनके प्रति आश्वस्त हों ? लगभग सभी तो बिके हुए हैं.

या फिर, रथ के पहियों ने कुचली हैं / बांसुरियों की दंत-कथाएँ..
इन पंक्तियों के माध्यम से रचनाकार ने अत्यंत गूढ़ तथ्य को कितनी सहजता से समक्ष किया है ! कृष्ण के बारे में प्रचलित हो चुकी समस्त कोमल-कथाओं के सापेक्ष भीष्म के विरुद्ध कृष्ण के नये किन्तु अतुकान्त रूप को प्रस्तुत करते हुए कितनी गहरी बात कही है ! अद्भुत !

आपाधापी, छीन-झपट में / तन-मन क्या, आत्मा तक झोंकी / किन्तु मिला क्या, यह असफलता / अनचाही शैया तीरों की / धीरे-धीरे पल-पल मरते / देख रहा हूँ मृत्युंजय को
कवि ने भीष्म के कुल प्रयास और उसके गूढ़ चरित्र को स्वर दे कर अपने भीतर के उस मनुष्य की कही सुनाता हुआ दिख रहा है, जो अपनी किंकर्तव्यविंमूढ़ता और अपने विभ्रम को दायित्व का मुखौटा दे कर हर तरह के असहज कर्म को सार्थक बताने की कुटिल चाल चलता है. कहना न होगा, भीष्म महाभारत का एक क्लिष्ट पात्र है जो अपनी समस्त कमियों को सात्विकता का जामा पहनाता है. भीष्म की स्वामिभक्ति तक दोयम दर्ज़े की रही है. इसतरह के आचरण के अनुकरण के पश्चात स्वयं को ’धीरे-धीरे पल-पल मरते’ महसूस करना अतिशयोक्ति भी होगी क्या ?

अंतिम बन्द तो मानो जीवन के सनातन स्वरूप को सापेक्ष करता हुआ ’अकर्म’ की दशा बताता हुआ है - जीने को है एक मरण बस / सहने को विकलांग नियति है !
मेरा आशय इतना ही है कि इतने से इस प्रस्तुति की गहनता समझी जा सकती है.

इस नवगीत में जिस सार्थकता से पौराणिक पात्रों के माध्यम से आजके मनुष्य की मनोदशा को पूरी संवेदना के साथ सस्वर किय अगया है वह श्लाघनीय तो है ही, इस तरह् अके नवगीतों के प्रति अभ्यासरत रचनाकारों के लिए अनुकरणीय भी है.
कथ्य और शिल्प की कसौटी पर एक सार्थक नवगीत केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय योगेन्द्र दत्त शर्माजी..
July 23 at 10:04am · Edited · Un

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Jagdish Vyom
July 11 · Edited
नवगीत की जब चर्चा होती है तो कुछ नवगीतों के मुखड़े तुरन्त याद आ जाते हैं, इनमें से एक नवगीत है- " भीलों ने बाँट लिये वन, राजा को खबर तक नहीं.." इस नवगीत की आलोचना भी खूब की गई फिर भी इसमें कुछ ऐसा है कि सिर चढ़कर बोलता है..... कुछ विमर्श इस पर भी हो... बिना किसी पूर्वाग्रह के तथा इसकी परवाह न करते हुए कि इस नवगीत की आलोचना में पहले क्या-क्या कहा गया है? और किसने-किसने कहा है?.....
भीलों नें बाँट लिये वन
राजा को खबर तक नहीं
पाप चढ़ा राजा के सिर
दूध की नदी हुई जहर
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गयी यह नयी खबर
रानी हो गयी बदचलन
राजा को खबर तक नहीं
कच्चा मन राजकुँवर का
बे-लगाम इस कदर हुआ
आवारा छोरों का संग
रोज खेलने लगा जुआ
हार गया दाँव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं
उल्टे मुँह हवा हो गयी
मरा हुआ साँप जी गया
सूख गये ताल-पोखरे
बादल को सूर्य पी गया
पानी बिन मर गये हिरन
राजा को खबर तक नहीं
एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गये
राजमहल खण्डहर हुआ
छत्र-मुकुट चोर ले गये
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं
-श्रीकृष्ण तिवारी

Bhartendu Mishra ये मंचीय गीत है-लोक कथा को गीत का रूप देने की जतन की गई है। ,चमत्कारिक भाषायी प्रयोग के लिए लोग इसका खूब उदाहरण देते हैं।पूरा गीत एक तरह से -अन्धेर नगरी चौपट राजा वाली -(बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय की)चेतना का प्रतीक है।अर्थ की दृष्टि से इसमे कुछ ज्यादा नही निकलने वाला है।हां -राजा को खबर तक नही-बस ये एक पंक्ति है जो इसे नवगीत के समक्ष खडा करती है।कुछ उलटबांसियां भी इस गीत को चमत्कारी बनाती है-उल्टे मुँह हवा हो गयी
मरा हुआ साँप जी गया
सूख गये ताल-पोखरे
बादल को सूर्य पी गया..इत्यादि।
July 11 at 6:27pm · Unlike · 5

Ramakant Yadav बिखरे बिखरे अर्थोंवाला गीत।अपनी रव में बहता हुआ गीतकार बहक बहक जाता है।सरोकारों के प्रति भी दृष्टि स्पष्ट नहीं।भीलों का वन बाट लेने में और रानी के बदचलन होने को एक ही तराजू से तोल दिया गया है।आखिर राजा का कैसा चरित्र चाहता है गीतकार?दिमाग बाहर रखकर गुनगुनाने में कई बार मजा आता है।हमने आदत जो बना रखी है इस तरह की।कथित ज्ञानियों ने हमें सोचने ही कब दिया?उनके सम्मोहन के अपने तरी के हैं।क्योंकि हम तो सुनने वाले ही रहे!मूकदृष्टा ही रहे!
July 11 at 8:19pm · Unlike · 4

Kamlesh Kumar Diwan arthpoorn hai sanketik bhi hai
July 11 at 8:45pm · Unlike · 1

Ramshanker Verma मैंने इस गीत/नवगीत का मुखड़ा शायद किसी नवगीत संकलन की भूमिका में पढ़ा था, पर इसके बारे में पूर्व में क्या कहा गया है, से परिचित नहीं हूँ। मुखड़े में भी रचनाकार समय का कौन सा प्रसंग व्यक्त कर रहा है, कम से कम मैं समझने में असमर्थ हूँ। "'भीलों ने बाँट लिए वन"' अब सरसरी तौर पर तो यही लगता है, भील तो वनों में रहते हैं, तो वन के वे सहज उत्तराधिकारी हैं, अगर उन्होने बाँट भी लिए तो क्या। आगे अंतरों में राजतंत्र के बदचलन होने का जिक्र है, फलस्वरूप सत्ता हाथ से जाने का जिक्र है, पर "'छत्र-मुकुट चोर ले गये"' अगर राज्य क्रांति भी हुई तो क्रांतिधर्मा तो नायक हुए, चोर कैसे हो गए। पर इस गीत में किस्सागोई है और लय प्रभावित करती है। यह भी की इतना सब कुछ हो गया और राजा को खबर तक न हुई।
July 13 at 4:01pm · Unlike · 1

Jairam Jay Etna sab hona raja ko khabar na hona yani ki andher nagari chaupat raja
July 20 at 11:03pm · Like

DrVinay Bhadauria गीत का मुखड़ा आकर्षित करता है ,लेकिन भीलों का प्रयोग किसके लिए किया गया है यह स्पष्ट नहीं हो पाता,यदि भ्रष्टाचार के संबंध में प्रयुक्त करे तो दूसरे बन्ध से भाव असम्पृक्त हो जाता है।गीत में भावान्वित का अभाव प्रतीत होता है।क्योंकि यदि नई पीढ़ी के लिए राज कुअँर का प्रयोग करें तो वह भी युक्त संगति नहीं है पूरी पीढ़ी तो गुमराह नही है ,कुल मिलाकर अस्पष्ट है ।अर्थभावन की दृष्टि से गीत ?????????
July 23 at 9:14am · Unlike · 1

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Ramakant Yadav shared Shailendra Sharma's post.
July 10
कृपया इस गीत पर विचार करें।क्या इस गीत को लिखते हुए गीतकार ने सम्यक् दृष्टि अपनायी है?निचले तबके को सम्बोधित करते हुए गीतकार किस मानसिकता से ग्रसित है?क्या माना जाए कि गीत नवगीत में सवर्णवादी मानसिकता हावी है?

Shailendra Sharma
मित्रों! आज के सामाजिक/राजनैतिक परिद्रिश्य पर एक रचना प्रस्तुत है -

रमधनिया की जोरू धनिया
जीत गई परधानी में
रमधनिया की पौ-बारा है
आया ' ट्विस्ट ' कहानी में

पलक झपकते कहलाया वो
रमधनिया से रामधनी
घूरे के भी दिन फिरते हैं
सच्ची-मुच्ची बात सुनी

लम्बरदार- चौधरी रहते
अब उसकी अगवानी में

जो बेगार लिया करते थे
आदर से बैठाते हैं
उसकी बाँछें खिली देखकर
अंदर से जल जाते हैं

तिरस्कार की जगह शहद है
उनकी बोली-बानी में

पाँच साल के भीतर-भीतर
झुग्गी से बन गया महल
उसकी ओर न रुख करते थे
वे करते हैं आज टहल

अब वह मौज़ लिया करता है
उनकी गलत- बयानी में

पहले जो डपटा करते थे
उसे देख मुस्काते हैं
वही दरोगा वही बी.डी.ओ.
आकर हाथ मिलाते हैं

आने लगा मज़ा अब उसको
' ऐय्याशी- दीवानी ' में

@ शैलेन्द्र शर्मा
( " राम जियावन बाँच रहे हैं " से उद्धरित )


Ramshanker Verma गीत पर विचार करने से पहले इस बात पर विचार करना उचित होगा कि क्या नवगीत विधा में भी अगडा, पिछडा, दलित, स्त्री, सर्वहारा के नाम पर गोलबन्दी किया जाना उचित होगा।
July 10 at 8:12pm · Unlike · 7

Jagdish Vyom समूचा समाज जातीय मानसिकता के घेरों में कैद है और राजनीति दलों के दलदल में फँसी हुई है.... साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है..... यह नवगीत समाज का एक चित्र उपस्थित कर रहा है
July 11 at 5:30pm · Like · 4

Bhartendu Mishra बेहेतरीन नवगीत है।जो अपने सामाजिक सरोकार को जस का तस प्रस्तुत करने मे सक्षम है।रमधनिया के चरित्र का विस्तार(जिसमे उसकी प्रगति/दुर्गति भी शामिल है)हुआ है।शैलेन्द्र शर्मा जी को बधाई इस सुन्दर नवगीत के लिए।
July 11 at 5:56pm · Unlike · 5

Ramakant Yadav भारतेन्दु मिश्र जी कह रहे हैं कि यह बेहतरीन नवगीत हैऔर मुझे इस पर आश्चर्य हो रहा है।किस लिहाज से यह बेहतरीन नवगीत हो सकता है?रमधनिया की जोरू धनिया यह तुक ताल भिड़ाने वाली मानसिकता कौन सी है?क्या किसी उच्च जाति के पात्र को भी इसी अन्दाज में गीतकार ने सम्बोधित किया है?आप कहते हो कि रमधनिया के चरित्र का विस्तार किया गया है जब कि वह सम्बोधन से लेकर प्रस्तुतीकरण तक गीतकार के व्यंग्य वाणों की चुभन के बीच है।रमधनिया की पौ बारा है -इसका क्या मतलब?मतलब गीतकार को यह सहन नहीं हो रहा है?कुछ पाने पर खुशी किसको नही होती?रमधनिया को भी है तो किसी को इतना क्यों खले कि पौ बारा जैसा वाहियात मुहावरे का वह इस्तेमाल करे।जमीनी सच्चाई तो यह हा कि अधिकतम दलित प्रधान स्वतंत्र होकर काम नही कर पाते।वे सदैव किन्हीं पंडित जी या ठाकुर साहब के दबाव में ही काम करने को लाचार हैं।कोई स्वतंत्र होकर काम करना चाहे तो उसके खिलाफ हजार साजिशें हैं हथकंडे हैं।यह झूठ है अतिरंजना है कि लम्बरदार चौधरी उसकी अगवानी में रहते हैं।अभी स्थितियां इतनी नही बदली हैं।आपको परेशानी यह भी है कि उस दलित ने पांच साल में महल खड़ा कर लिया।महल कहां किसने खड़ा कर लिया?आप खड़ा करने दोगे तब ना?झुग्गी की जगह घर बना लिया कहते तो भी ठीक था।जो सदियों से महल खड़ा करते रहे और अब भी कर ही रहे है उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।और रमधनिया कोअंत में ऐसा पटका गीतकार ने कि आने लगा मजा अब उसकोऐय्याशी दीवानी में।नही ;गीतकार ने जानबूझकर रमधनिया को यहां तक गिराया है।गीतकार इस पात्र के प्रतिपक्ष में शुरू से खड़ा हुआजान पड़ता है।उसकी अपनी मर्जी कि वह जिसको जहां चाहे गिरा दे?मैं फिर कह रहा हूं कि पीढ़ियो से जो ऐय्याशी कर रहे हैं उनकी तरफ हमारी दृष्टि क्यों नहीं जाती?और यह भी कहां तक उचित है कि हम या कि हम जिनकी पैरवी में हैं वे मौज मस्ती ऐय्याशी का जीवन जियें और दूसरों से हम अपेक्षा करें कि वे त्याग तपस्या में आदर्श उपस्थित करें।अफसोस है कि गीत नवगीत ने दलित साहित्य केपुरजोर हस्तक्षेप के बावजूद अभी सामंती रुख ही अपनाये रखा है।अगर कही कुछ है भी तो कृत्रिम बनावटी असंतुलित।क्या कोई दलित या दलित साहित्यकार इस गीत को पसन्द करेगा?मगर आप उनकी चिन्ता क्यों करेंगे?
July 12 at 11:14am · Unlike · 1

Shailendra Sharma आ.राम शंकर जी बृजनाथ जी जगदीश व्योम जी भारतेन्दु मिश्र जी आप सब की सारगर्भित टिप्पणी के लिये बहुत - बहुत हार्दिक आभार
July 12 at 1:44pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra रमाकांत जी जरा किसी दलित बहुल गांव मे /आदर्श गांव मे जाकर देखें/जहां के प्रधान दलित हैं या उनकी पत्नियां प्रधान हैं।वे सब मनुवादी /सामंतवादी आचरण वाले हो गए हैं कि नही..यह भी देखने की बात है।तमाम ब्रहमण नेताओ को बहन जी के पांव छूते आपने न देखा हो मैने देखा है।..तो मेरा पैतृक गांव दलित बहुल है।मैने सीतापुर,ललितपुर,उन्नाव,हरदोई,लखनऊ आदि के गांव देखे हैं वहां रहा हूं नौकरी की मजबूरी से।अब सब जगह बदलाव आ चुका है कहीं कम कहीं ज्यादा।मेरा अवधी उपन्यास भी इसी तरह के चरित्रो प आया है -नईरोसनी-..खैर हर रचनाकार का अपना अनुभव क्षेत्र होता है ।केवल रायबरेली या एक जगह रहकर जाति समस्या पर या उसके आकलन पर टिप्पणी करना उचित नही है।सत्ता मिलते ही मनुष्य सामंतवादी/मनुवादी आदि हो ही जाता है।
July 12 at 8:22pm · Edited · Unlike · 2

Ramshanker Verma पूर्वाग्रह रहित होकर ही किसी रचना पर सार्थक टिप्पणी की जा सकती है। नवगीतकार ने नवगीत के मुखड़े में ही "आया ट्विस्ट कहानी में"' कहकर तथाकथित सामाजिक परिवर्तन की ओर संकेत किया है। राजनीति और समाजसेवा अब सिर्फ जेब भरने और ऐय्यासी के लिए है। यह सर्वविदित है। बड़ी कुर्सियों से होते हुए सत्ता का नशा अब गाँव पंचायत की चौपाल तक चढ़ गया है। कुर्सी और नशा दोनों जातिनिरपेक्ष हैं। रमधनिया तो एक प्रतीक मात्र है उस परिवर्तन का, जिसमें वही लिप्साएँ और भोकाल की प्रव्रत्ति घर कर गयी है, जिसके लिए पूर्ववर्ती को पानी पी कर कोसा था। निचले तबके का जनप्रतिनिधि अगर अपने पद का दुरुपयोग कर सरकारी धन की बंदरबांट करता है, तो उसका यह कहकर बचाव नहीं किया जा सकता कि पीढ़ियों से अन्य लोग भी यही कर रहे थे और यह उसका नैसर्गिक और मौलिक अधिकार है। रबड़ी देवी को राबड़ी देवी कह देने से मात्र से किसी की प्रतिष्ठा में चार चाँद नहीं लगते। अगर उसमें नैतिक गुण हैं तो वह रबड़ी देवी होकर भी प्रतिष्ठित है। नवगीत में कटु यथार्थ है, और यह समय को व्यक्त करने में सक्षम है।
July 13 at 1:55pm · Like · 1

Jagdish Vyom यह विमर्श व्यक्तिगत आक्षेप की ओर जा रहा है..... इसे कृपया यहीं बन्द करें...... सभी से अनुरोध है कि विमर्श नवगीत पर केन्द्रित रखें..... व्यक्तिगत टीकाटिप्णी से बचें.....
July 13 at 3:39pm · Like · 3

Sanjiv Verma 'salil' नवगीत में नवता - गेयता दो अपरअधिकार िहार्य तत्व होने चाहिए। वे दोनों इस नवगीत में हैं. नवगीत का कथ्य चौंकाता है चूंकि अब तक यह प्रवृत्ति कम रचनाओं में सामने आई है. अपने सेवाकाल में कितने ही विधायक पतियों, सरपंच पतियों और पार्षद पतियों से सामना हुआ है. अपनी ही पत्नी से उसके पद के अधिकार संविधानेतर तरीकों से छीन लेना, पत्नी के पद की सरकारी मुहर अपनी जेब में रखना, उसके हस्ताक्षरों के जगह खुद हस्ताक्षर करना और उसकी जगह खुद बैठक में पहुँच जाना इस युग का सत्य है. इस प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रधान मंत्री भी बोल चुके हैं. तुलसी के अनुसार प्रभुता मद काहि मद नाहीं …। अपने अधिकारों की रक्षा हेतु गुहार लगानेवाला अन्यों के अधिकार छीनने लगे यह कैसे स्वीकार्य हो? नवगीत में कहीं किसी पर कोई आक्षेप नहीं है. तथाकथित शोषितों द्वारा सत्ता मिलते ही अपने ही वर्ग के कमजोर लोगों का शोषण न्ययोचित कैसे माना जाए? नवगीत को दुर्बलतम के हित में खड़ा होना ही चाहिए.
July 14 at 10:23am · Like · 3

Brij Nath Srivastava भाई सलिल जी सत्य वचन ।माना भारत का अतीत सामाजिक संगठन की दृष्टि से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता किन्तु उन्हीं अपमूल्यों की पुनरावृत्ति को भी उचित नहीं कहा जा सकता ।अतीत में "अ"ने "ब"का शोषण किया । समय बदला अब "ब" के द्वारा "अ"का शोषण किया जाने लगा। उचित तो तब होता जब "ब"इतना दबाव बनाता कि "अ"शोषण से बाज आता और "ब"स्वयं शोषण न करता ।किन्तु न पहले और न आज ही समाज और समसयाओं से किसी को लेना देना है ।सभी क्षेत्रों में अवमूल्यन का एकमात्र कारण येनकेन प्रकारेण सत्ता छीनना भोगना और निपोटिज्म के एजेंडे पर काम करना भाड़ में जाय देश जनकल्याण और मानवता ।सब खेल जर जोरू जमीन की लूट का है ।अपराध जितने अधिक होगें जनता को प्राणरक्षा की उतनी ही समस्या होगी और जितनी अधिक समस्या होगी अपनी समसयाओं में उलझी रहेगी तथा दबाव में रहेगी और सत्ता भोग निष्कंटक चलता रहेगा।भाई अधिकार सुख बड़ा ही मादक होता है। सत्ता सुख चाहने वालों का एक उद्देश्य और एक ढंग होता है ।जाति धर्म के भेद के बिना।Power corrupts absplute & absolute power corrupts absolutely
July 14 at 5:46pm · Edited · Like · 3

Rameshwar Prasad Saraswat होते हुए सामाजिक परिवर्तन को हूबहू परिलक्षित करता सार्थक नवगीत !बधाई भाई शैलेन्द्र जी !
July 14 at 8:01pm · Like · 1

अवनीश सिंह चौहान उपर्युक्त टिप्पणियों को पढ़कर मुझे लगता है कि साहित्य की आलोचना करना इतना आसान नहीं। यहाँ ज्यादातर साहित्यकार अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं। काश इनमें से दो-तीन भी ठीक से आलोचनाएँ होती तो यह बहस सार्थक होती।
July 15 at 10:37am · Edited · Unlike · 1

Trilok Singh Thakurela समसामयिक परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण. सटीक अभिव्यक्ति...सुंदर नवगीत...
July 15 at 5:09pm · Unlike · 1

Basant Sharma वर्तमान राजनैतिक जीवन का यथार्थ चित्रण है, इसे किसी जाति या वर्ग से न जोड़ा जाय तोअच्छा है
July 17 at 9:35pm · Like

Brij Nath Srivastava आदरणीय भाई श्री अवनीश सिंह चौहान जी निवेदन है कि सार्थक आलोचना करके मार्गदर्शन प्रदान करने की कृपा करें। ताकि कुछ मानक और सीमाएं निर्धारित हो सके और आलोचना की दिशा तय की जा सके। धन्यवाद
July 18 at 8:13am · Edited · Like · 3

Ved Sharma यादव जी यह तो व्यंग है और सत्ता का चरित्र उघरता है......मुझे नहीं लगता कोई भी सच्चा रचनाकार सवर्ण या कुछ और होता वह केवल मूल्यों के साथ खड़ा होताह ै
July 19 at 7:45pm · Like · 2

Ramakant Yadav पर सच्चे रचनाकार हैं कितने?जाति धर्म से परे होना इतना आसान है क्या?गीत में एक दलित पात्र को जिस तरह सम्बोधित किया गया है क्या किसी सवर्ण को भी ऐसे ही सम्बोधित किया है?मैं कहता हूं सारे रचनाकार जातिवादी हैं।जो होते हुए भी नहीं मानते हैं वे पाखंडी हैं।पाखंडी होना ही सबसे बुरा है।
July 19 at 7:56pm · Like

Ved Sharma आप या मैं कुछ भी कहें पर उसके पीछे वस्तुनिष्ठताहोनी चाहिए ...कवि शायद कहनाचाह रहा है कि माया आते ही नाम सम्बोधन बदल जाते हैं सत्ता मिलतेह ी आदमी वही करने लगता है जिसके लिये वह दूसरों को कोसता है .....
July 19 at 8:54pm · Like · 1

Brij Nath Srivastava गीत में कोई दलित पात्र है ऐसी तो कहीं कोई बात नहीं कही गई है ।हाँ यह जरूर बताया गया है कि सत्ता का नशा और अधिकार सुख बड़ा ही मादक होता है येन केन प्रकारेण उसे पाकर यह दो टाँग का आदमी नामक जानवर मानवता के प्रति कितना हिंसक और अवमूल्यित हो जाता है यह पढ़े लिखे और अनपढ़ किसी से छिपा नहीं यह मद ही समाज में फैली अधिकां अव्यवस्थाओं की जड़ है और इस मद का समर्थक है निपोटिज्म।यह मद अगड़े पिछड़े दलित के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ होता है ।हाँ यह मद शंकर गौतम बुद्ध महावीर स्वामी कबीर महात्मा गाँधी लालबहादुर शास्त्री पर नहीं सवार हुआ ।सबसे अधिक मदमस्त था देवराज इंद्र ।और आज हर गली कूंचे में इंद्र की औलादें घूम रही हैं ।
July 20 at 8:09am · Like

Ramakant Yadav बृजनाथ जी क्या आप अपने अलावा सब को मूर्ख समझते हो?रमधनिया की जोरू धनिया क्या ठाकुर है ब्राह्मण है श्रीवास्तव है ?आप लोग सदा ही औरों को मूर्ख बनाते आये हो और यही अब भी कर रहे हो।उपदेश देने में बड़ी बड़ी बातें करने में आप सब बहुत निपुण हो।मैं देख रहा हूं कि एक भी व्यक्ति ने मैने जो सवाल उठाये हैं उन पर विचार नहीं किया।तो यह किस तरह की मानसिकता है?कोई अन्य विधा होती तो ऐसी प्रस्तुति को शायद बहुमत न मिलता।पर गीत नवगीत अभी भीपिछली शताब्दियों में जी रहा है।शोषितों को अभी मुश्किल से मौका मिलना शुरू हुआ है कि हम उन्हें गरियाने लग गये।हम यह नही देखते कि व्यवस्था अभी भी हमारी बनायी हुई चल रही हैऔर हर अव्यवस्था में हमारा भी कहीं न कहीं हाथ है।हम यह नहीं कहते कि कोई दलित बुरा नहीं हो सकता पर उसका चित्रण करते हुए हमें सावधानी बरतने की आवश्यकता है।हमें समय और समाज को समग्रता से देखना परखना होगा।वंचितों को एकदम से दोष देना ठीक नहीं।हम उनको गरियाने का भी तरीका सीखें।पहले स्वयं पूर्वाग्रह से मुक्त हों तब दूसरों को कहें।जब गीतकार अपनी प्रस्तुति में पूर्वाग्रह से युक्त दिखता है तो वह अपनी प्रस्तुति और दूसरों के साथ कैसे न्याय कर पायेगा।
July 20 at 9:16am · Unlike · 2

अवनीश सिंह चौहान आदरणीय भाईसाहब बृजनाथ श्रीवास्तव जी, मुझे यह कहते हुए बहुत कष्ट हो रहा है कि आप आदरणीय रमाकांत जी द्वारा की गयी सार्थक आलोचना को ही स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों का उत्तर भी आपके पास नहीं है। दुखद यह भी कि आपके गुट के तमाम लोग आँखों पर पट्टी बांधकर यहाँ टिप्पणी कर रहे हैं। मुझे तो लगता है कि इस गीत को लेकर आपकी दृष्टि ठीक नहीं है, या आप अपनी दृष्टि को 'सार्वभौमिक सत्य' मानकर चल रहे हैं। ऐसे में यदि मैंने कुछ लिख दिया तो आप कैसे मेरी बात समझ पाएंगे।
July 20 at 10:05am · Unlike · 2

Ramshanker Verma विमर्श के नाम पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप उचित नहीं है। नवगीत में सहज सम्प्रेषण और कथ्य पारदर्शी है। विमर्श भी उसी पर आधारित है। कौन किसके गुट में है, यह मेरी समझ से परे है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि पुराने मुहावरों का प्रयोग करने में सावधानी बरतने की जरूरत है। घूरे के दिन बहुरने में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को आपत्ति क्यों होगी। हाँ एतराज की बात तब अवश्य होती जब उसे घूर बने रहने की वकालत की जाए। दूसरा "'घायल की गति घायल जाने की जिन घायल होय"' यह भी सत्य है। पीड़ा, लांछन, तिरस्कार का भुक्तभोगी अपनी अन्तर्व्यथा जिन शब्दों में व्यक्त कर सकता, उसी तरह कोई दूसरा व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकता। पर वह कवि भी हो जरूरी नहीं। उसकी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए समाज के किसी भी वर्ग का संवेदनशील व्यक्ति आगे आ सकता है। सवाल यह है कि निचले तबके के प्रतीक शब्द "'रम धनिया'"' का प्रयोग क्या नवगीत में असंसदीय है। दूसरा आक्षेप इसके कथ्य को लेकर है कि ऐसे चित्रण में सावधानी की आवश्यकता है। तो यह सावधानी और चुनौती तो रचनाकार को हर स्तर पर है।
July 20 at 1:06pm · Like · 3

अवनीश सिंह चौहान मैंने जिस गुटबंदी की ओर संकेत किया था उसकी एक परत खुलकर आई। अभी कई और परतें हैं जो सामने आएंगी।
July 20 at 1:45pm · Edited · Like · 1

Ramshanker Verma छींटाकशी से इस विमर्श में कोई सार्थक मंतव्य नहीं निकलेगा।
July 20 at 2:22pm · Like

Jagdish Prasad Jend शैलेन्द्र शर्मा जी के गीत 'रमधनिया की जोरू धनिया 'पर बहस में रमाकांत यादव जी द्वारा जो प्रश्न उठाये गए हैं उन पर बहस में भाग लेने वाले टिप्पणीकारों ने एक का भी समुचित उत्तर नहीं दिया है बल्कि गीत में प्रयुक्त 'आया ट्विस्ट कहानी में' को चरितार्थ करते हुए गीत की अनुकूल व्याख्या की जा रही है। कोई भी रचनाकार अपने समय से निरपेक्ष नहीं रह सकता एवं परिस्थितियों के संघात से चेतना में हुए परिवर्तन के अनुसार उसकी मानसिकता ,मंतव्य और प्रतिबद्धता निर्मित होती है। रचनाकार के लेखन में उसी चेतन -अवचेतन मानसिकता की अभिव्यक्ति होती है। भारतीय समाज व्यवस्था पतनोन्मुख सामन्ती और विकासशील पूंजीवादी मूल्यों के दौर से गुजर रही है। जिसमें वर्ग और वर्ण के मूल्य समाज के हर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति के अनुसार चेतना पर हावी रहते हैं। प्रगतिगामी सोच वाला मनुष्य अपने अध्ययन ,सामाजिक संपर्क और स्वविवेक से अपने मंतव्यों और मानसिकता को बदलने में सफल हो जाता है जिसे वर्गहीनता की श्रेणी के रूप में ग्रहण किया जाता है। एक साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने लेखन में निष्पक्ष भाव से समय और समाज का विश्लेषण करते हुए अपनी समकालीनता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता हुआ न्याय ,समता ,बंधुता के सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की रक्षा करे।
July 20 at 10:17pm · Like · 1

Jagdish Prasad Jend प्रस्तुत गीत में शैलेन्द्र शर्मा जी ग्राम के प्रभुत्वशाली वर्ग की पीड़ा का उल्लेख ही कर रहे हैं। उन्होंने अपने वर्ग की जिस त्रासदायक कसमसाहट ,मिस्मिसाहट और असहाय स्थिति का चित्रण किया है वह उसमें सफल रहे हैं। शैलेन्द्र जी जिस वर्ग या वर्ण से सम्बन्ध रखते हैं उसके वर्गहित पर पहुंची चोट और बेबसी को ही तो गीतके माध्यम से व्यक्त किया गया हैं। जिस व्यक्ति रमधनिया के माध्यम से स्थानीय सत्ता के सबसे निम्न पद पर पत्नी का चुनाव होने से मनोविज्ञान में हुए परिवर्तन और पांच साल में झुग्गी से महल तक की यात्रा का वर्णन किया है वह उसी सामंती संस्कारों में जीने वाले प्रभावशाली और प्रभुत्व वाले लोगों की दया-कृपा से तो चुना ही नहीं गया होगा बल्कि वह अपनी और अपने जैसे लोगों की संयुक्त शक्ति से ही देश-प्रदेश की दलितों /पिछड़ों /महिलाओं के प्रतिनिधत्व की नीति के कारण ही यह चुनाव जीत पाया है। उस दबंग वर्ग की त्रासदी यह है कि उन्हें उस दलित वर्ग से अपना चाटुकार और जी हुजूरी करने वाला कोई नहीं मिला या मिला भी तो वह चुनाव जीत नहीं पाया। तभी तो कसमसाहट है कि जिससे दबंग अब तक बेगार कराते थे अब उसकी अगवानी करने को विवश हैं। इसी के साथ शासन-प्रशासन के अधिकारियों का उसे तरजीह देना भी देखा नहीं जा रहा है। इस गीत से यह भी प्रकट होता है कि पहले जो नैतिक-अनैतिक ,वैध-अवैध लाभ जिस प्रभुत्वशाली वर्ग को मिलता था और जिसके द्वारा वे भी पांच साल में महल खड़े करते थे वे उससे वंचित हो गए हैं तथा वह व्यक्ति भी इतना सशक्त है कि उसका कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे और उस दलित की दबंगई के आगे बेबस हैं। शैलेन्द्र जी अपनी और अपने वर्ग की पीड़ा को व्यक्त करने में सफल रहे हैं।पूरे गीत में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह सब देश की सामाजिक -राजनैतिक व्यवस्था की देन है। यदि गीत में ऐसा कुछ संकेत होता तब भी गीतकार की मानसिकता पर इतने प्रश्न नहीं उठते किन्तु जाने या अनजाने में शैलेन्द्र शर्मा उत्पीड़क/शोषक दबंग वर्ग के पक्षधर की भूमिका निभा रहे हैं। समूह में यह गीत रमाकान्त यादव जी के प्रश्नों के कारण बहस में आ गया है। गीत की भाषा -शैली कथ्य के अनुरूप है।पूरे गीत में जाति का उल्लेख नहीं है लेकिन भारतीय ग्राम्य व्यवस्था में जो लोग बेगार करने को विवश हैं वे दलित ही हैं चाहे जाति कोई भी हो। मेरा निवेदन है कि सुविज्ञ जन प्रस्तुत गीत और उसके निहितार्थ को दृष्टिगत रखते हुए अपना अभिमत रखेंगे तो सार्थक विमर्श हो सकेगा। -जगदीश पंकज
July 20 at 10:17pm · Like · 1

Saurabh Pandey .
यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकता
एकैकं अनर्थाय किम् तत्र चतुष्टयम् !!
यौवन धन सम्पत्ति प्रभुत्व और अविवेक.. इनमें से एक-एक अनर्थकारी है.. जिसके पास ये चारों हों वहाँ या उसका क्या ? अर्थात उसका कैसा आचरण होगा ?
महती यह नहीं कि किसने क्या किया, महत्त्वपूर्ण है कि प्रवृति क्या थी. क्या हम इस आलोक में कभी सोचना शुरु कर पायेंगे. या भँड़ास निकालने के तहत व्यवस्था का विरोध नहीं, अपितु स्वीकार्य अनुमन्य व्यक्तियों को पोषित करते हुए प्रवृति विशेष को ही प्रश्रय देते रहेंगे. यदि ऐसी सोच के अंतर्गत हम वैचारिक हो रहे हैं, तो अफ़सोस हमारे जैसा वाचाल, दुराग्रही और ढोंगी विचारक और कोई नहीं होगा. ऐसी स्थिति में हम विचारक नहीं, अपनी बारी की प्रतीक्षा करते घोर अवसरवादी ही होंगे. अगर ऐसी संज्ञा और मान से परहेज नहीं है तो फिर वर्ण-वर्ग भेद पर सारा विमर्श, सारी परिचर्चा अनावश्यक ही नहीं, थोथी बकवाद है. जिसकी ओट में आजतक मुट्ठियाँ भींची जाती रही हैं.
मुझे न उच्च, न दलित, किसी से कुछ नहीं लेना देना. बस ये बस ये देखना है कि क्या आमजन सहज है ? या, रुपहले पर्दे पर चलचित्र के किसी नायक के नकली गुस्से पर तालियाँ पीटता हुआ अपने को लगातार अप्रासंगिक करता हुआ मूर्ख है ? करोड़ों में खेलने वाला तथाकथित वह नायक सफल हो कर जिस प्रवृति को जीता है, उसकी प्रतिच्छाया में मुग्ध एवं तुष्ट रहना यदि किसी वर्ग या व्यक्ति-समूह को रोमांचित करता है, तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना. अन्यथा, यह सालता है, बहुत-बहुत सालता है, कि हम दलित मनोविज्ञान की ’समझ’ के नाम पर अपनी दमित इच्छाओं का पोषण चाहते हैं. ऐसी इच्छा किसी दलित या पीड़ित आंदोलन का हेतु कभी नहीं रही है. तभी ऐसे आंदोलन प्राणवान भी रहे हैं.
वैसे यह सही है, कि सदियों-सदियों से पीड़ित-शोषित वर्ग एक बार में अपनी दमित इच्छाओं से निस्संग, निस्पृह नहीं हो सकता. किन्तु, यह भी सही है, इस ’घर’ को सबसे अधिक खतरा ’घर’ के चिरागों से ही है, जो वैचारिक रूप से दिशाहीन हैं या शातिर-दबंगों तथा ’शास्त्रीय’ शोषकों के हाथों की कठपुलली हैं. ऐसी ही एक कठपुतली का ज़िक्र यह नवगीत गा रहा है.

एक बात:
किसी नाम के साथ शर्मा, श्रीवास्तव, मिश्र, पाण्डेय, सिंह या वर्मा या ऐसे ही ’आदि-अनादि’ ’प्रत्यय’ देख कर, अपने मत और मंतव्य बनाने हैं, चीख-चिल्लाहट मचानी है, तो यह परिचर्चा के क्रम में महाभारी उथलापन और गलीज छिछलापन का द्योतक होगा. यह कत्तई साहित्य नहीं. ऐसे साहित्य को, क्षमा कीजियेगा, साहित्य नहीं घटिया राजनीति से प्रभावित परिवाद कहते हैं. फिर तो पीड़ितों व शोषितों के नाम पर आज ’एक वर्ग’ विशेष सबसे अधिक --जायज-नाजायज रूप से-- लाभान्वित होने का दोषी है. उक्त वर्ग से ताल्लुक रखने वाला आज हर तरह से रंगा सियार है. उसके किसी दिखावटी और थोथे गुस्से से कोई क्यों प्रभावित होने लगे ? ऐसी सोच क्या घटिया सोच नहीं होगी ? अवश्य होगी. अतः साहित्य को साहित्य ही रहने दिया जाय. सारी सड़कें राजधानी से गुजरती हैं का आलाप कितना कुछ बरबाद कर चुका है इसे क्या अब भी समझना बाकी है ?

क्रमशः ..
July 21 at 1:27am · Edited · Like · 2

Saurabh Pandey अब इस नवगीत पर -
यह एक व्यंग्य है जो आजके समाज की नंगई को उघाड़ कर सामने लाने में सक्षम है. रमधनिया स्वयं रामधनी बने या किसी शातिर का मुहरा बना प्रधानपति श्री रामधनी कहलाता फिरे , वह दोनों स्थितियों में अपने वर्ग और समाज केलिए एक निपट गद्दार है. वह सिर्फ़ अपना भला देख रहा है. इस व्यक्तिवाची सोच का यदि कोई वर्ग समर्थन करता है तो यह स्वार्थी सोच का पोषण ही कहलायेगा.
ऐसे ही ’गद्दारों’ के दुष्कृत्य से ही विसंगतियाँ पैदा होती हैं. यही समाज में आज तक व्याप रही विद्रूपता का मूल कारण है. विद्रूपता को तारी करने का ठेका किसी वर्ग विशेष के माथे डाल कर कोई दोषी इकाई या वर्ग मुक्त नहीं हो सकता.
आगे, यह भी स्पष्ट करता चलूँ, कि इस नवगीत के इंगितों में जिस तरह से शातिरों के प्रभाव को रेखांकित किया गया है जिसकी प्रभावी पकड़ में रमधनिया और उसकी प्रधान बीवी है, उसकी ओर यदि समीक्षा के समय दृष्टि नहीं जा रही है, तो यह समीक्षकों की समझ का दोष है.
नवगीतकार इस प्रस्तुति के माध्यम से उच्च स्तर के व्यंग्य केलिए बधाई का पात्र है. नवगीत आज के पद्य-साहित्य की यदि धुरी है तो इस धुरी की कड़ियों को टुच्ची राजनीतिक् सोच से कमजोर न किया जाय.
शुभ-शुभ
July 21 at 1:16am · Edited · Like · 3

Jagdish Prasad Jend
July 21 at 8:15am · Like · 2

अवनीश सिंह चौहान अब कुछ परतें खुल चुकी हैं। अभी भी कुछ परतें बाकी हैं, जो इससे भी बड़ी हो सकती हैं।
July 21 at 11:03am · Edited · Like · 1

Saurabh Pandey आदरणीय जगदीश व्योम जी, ये कैसी गतिविधियाँ हैं ? ये क्या चल रहा है ? प्रतिक्रिया स्वरूप वन-लाइनर उलटबासियों से किसका भला हो रहा है ? साहित्य का तो कदापि नहीं. मैं किसी वाद या मठ का न हिस्सा था, न हूँ. ऐसे में थाहने की कोई कोशिश अन्यथा कर्म ही होगा.

जगदीश व्योम --
सभी सदस्यों से अनुरोध है कि यहाँ नवगीत विषयक अपनी राय, नवगीत विषयक प्रश्न, नवगीत विषयक टिप्पणी, चर्चा आदि में सहभागिता करें.. यह आवश्यक नहीं कि आप किसी की बात से पूरी तरह सहमत हों.. परन्तु इसे वैयक्तिक न बनायें.... सभ्य भाषा का प्रयोग करें... नवगीत को अनेकानेक लोग समझना चाहते हैं...... यहाँ हम सब मिलकर अपनी अपनी सामर्थ्य से नवगीत के इर्द गिर्द घिरे कोहरे को सहज विमर्श के द्वारा हटाने में सफल हो सकेंगे..... इसी अनुरोध के साथ सभी सदस्यों का स्वागत है.
July 21 at 2:07pm · Edited · Like · 2

Saurabh Pandey सही है.. लेकिन जिन्हें राजनीति करनी है वे करें न. खुल कर करें. किसने रोका है ? लेकिन साहित्यांगन में उनका क्या काम है ? रसोईघर को गुसलखाना समझ लिया है क्या ? व्यवस्था विरोध के नाम पर किसी ’मंतव्य विशेष’ का पृष्ठपोषण न उचित था, न है. न कभी मेरे लिए उचित होगा. लाचारों से लम्बी दौड़ संभव नहीं होती.
July 21 at 2:04pm · Like · 2

Ramshanker Verma वाह क्या निष्कर्ष निकला पूरे विमर्श का। चूँ-चूँ का मुरब्बा। जब केवल इस नवगीत के कथ्य पर विमर्श हुआ तो वही बात आदरणीय भारतेन्दु मिश्र, आचार्य संजीव सलिल, व्योम जी, बृजनाथ जी, जगदीश पंकज जी, सौरभ जी, वेद शर्मा जी सहित सभी मर्मज्ञों ने कही। क्या निकला, यही कि सत्ता पाते ही उस वर्ग में भी वही नैतिक पतन के कीटाणु प्रवेश कर गए, जो सत्ताच्युत वर्ग में थे। यही कि नवगीत में यथार्थ की सांचबयानी है। शेष तो अपनी-अपनी विचारधारा को नवगीत पर आरोपित कर दिया गया।
July 21 at 2:20pm · Like · 2

Saurabh Pandey Ramshanker Verma : भइया, मैं तो दंग हूँ !
क्या नवगीत या किसी विधा पर ऐसे चर्चा करेंगे ? अब भी कुछ बचा है जानने को ? कैसा प्याज हाथ लग गया है, भइया ? या, ये कैसी लहरें गिनी जा रही हैं, कि - ’येल्लो. ये भी पिलुक गयी !’
July 21 at 2:31pm · Like · 2

Ramshanker Verma मैं भी पहले आपकी तरह हतप्रभ हुआ था, पर अब नहीं। कुछ हट कर कर गुजरने की चाह में ऐसा होना लाज़मी है।
July 21 at 2:35pm · Like · 1

Saurabh Pandey //कुछ हट कर कर गुजरने की चाह में ऐसा होना लाज़मी है //

कुछ हट कर करने की चाह में विन्दुवत सार्थक प्रवहमान परिसंवाद का मजाक बनाया जाता है भला ? हमने दो भागों में अपनी बातें कहीं. क्या दोनों भागों को कायदे से पढ़ा गया ?
राम भइया, हम नवगीत की विधासम्मत चर्चा करें. विधासम्मत चर्चा के कुछ विन्दु होते हैं. उसमे यदि कुछ नया जोड़ना है तो सामने आयें. मैं पिछले तीन वर्षों के सान्निध्य में ऐसा होते नहीं देखा है. संपर्क से परिचित हुआ जाता है, रचनाकार नहीं.
शुभ-शुभ
July 21 at 2:42pm · Edited · Like · 2

Ramshanker Verma अगर ऐसी चाह न होती तो नवगीतकार की जाति तक विश्लेषक न पहुँचते।
July 21 at 2:45pm · Like · 2

Saurabh Pandey ऐसी किसी सोच और व्यवहार पर खासा ऐतराज ज ताया है मैंने.. आज मन बहुत दुखी हुआ है. जिन्हें विधा-विधान से कोई मतलब नहीं, उनके विमर्श और परिचर्चा का औचित्य समझ मे आता है. बाकी..
खैर.. मुझे जो कहना है कह दिया है, अब निकल रहा हूँ इस बहस से.
July 21 at 2:52pm · Edited · Like · 1

अवनीश सिंह चौहान आदरणीय जगदीश प्रसाद जेंद जी, आपकी टिप्पणी (शैलेन्द्र शर्मा जी के गीत 'रमधनिया की जोरू धनिया 'पर बहस में .....तो सार्थक विमर्श हो सकेगा) अच्छी लगी। हार्दिक बधाई और आभार भी।
July 21 at 3:10pm · Like · 1

Jagdish Prasad Jend किसी साहित्यिक रचना में कथ्य उसका प्राण होता है। प्रस्तुत गीत में रमाकांत यादव जी द्वारा कथ्य पर ही प्रश्न उठाये हैं जो अभी भी उत्तर मांग रहे हैं। प्रश्नों में जिस कटु सत्य का उल्लेख किया गया है वह कुछ मित्रों द्वारा पचाया नहीं जा रहा तथा अपने पूरे पांडित्य प्रदर्शन के बावजूद वैचारिक अजीर्ण की स्थिति से ग्रस्त होकर अनर्गल टिप्पणी करके रोदन कर रहे हैं। मान्यवर, विचार का विचार से और तर्क का तर्क से उत्तर दें तो विमर्श को सार्थक दिशा मिलेगी। अपने आप्त वचनों से समूह को समृद्ध करके और अपनी खीज और तिलमिलाहट को विमर्श के नाम पर उगल कर आपने क्या कमी छोड़ी है अपनी मानसिक दुर्गन्ध को समूह में फेंकने की? आप कहते हैं कि आपका किसी वाद या विचारधारा से कोई लेना देना नहीं क्या यह भी किसी यथास्थिति का वाद या विचार नहीं? वाह-वाह सुनने वाले कान सार्थक असहमति के स्वर सुनने से क्यों कतरा रहे हैं ?बहरहाल ,मेरा पुनः निवेदन है कि पलायन करने के बजाय रमाकांत यादव द्वारा प्रस्तुत नवगीत पर उठाये गए साहित्यिक प्रश्नों का साहित्यिक उत्तर दें तो समूह के विमर्श और संवाद-परिसंवाद के लिए हितकर रहेगा तथा अनेक मित्र जो इस विमर्श पर टिप्पणी न करते हुए भी ध्यान से पढ़ रहे हैं उन्हें भी अच्छा लगेगा। -जगदीश पंकज
July 21 at 3:18pm · Like · 2

Bhartendu Mishra भाइयों! पहले ये तय कीजिए कि आप नवगीत पर बहस कर रहे हैं या जाति की सवर्णवादी मानसिकता पर।दोनो का विमर्श अलग अलग रूप/तर्को/उदाहरणो से होना चाहिए।मेरे विचार से खुरपी से दाढी नही बनाई जा सकती और ब्लेड से घास नही छीली जा सकती।तो मेरा मानना है कि पहले तो हम ये तय करें फिर तार्किक ढंग से बात करें।व्यक्तिगत आक्षेप करना उचित नही है।..जहां तक रमाकांत यादव जी का प्रश्न है कि ये गीत सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है..ये सही बात है ..लेकिन ये मानसिकता कवि के साथ नही बल्कि रमधनिया से रामधनी बनने के बीच जो उसके चरित्र मे परिवर्तन हुआ है उस सत्ता सुख के साथ जुडी है तात्पर्य ये कि जब कोई सत्ता तक पहुंच जाता है तो वह सवर्णता वादी /मनुवादी आचरणो व्यवहारो को सहज मे ही अपना लेता है।जीवंत उदाहरण मायावती जी है -उनके तमाम सवर्ण पैर छूते हैं। उनपर लाखो के नोटो के हार चढाये जाते हैं/ उनकी मूर्तियो का निर्माण भी हो चुका है।जब ये सब हो रहा था तब सतीश मिश्रा जी उनके सलाहकार थे।उनकी हर बात उन्हे स्वीकार करनी होती थी।..मै इसे गलत नही मानता हूं।ये सामाजिक प्रक्रिया है।कभी नाव पानी पर कभी पानी नाव पर भी होता है।विकासवादी समाजशास्त्री विचारको से पता करें।..तो मित्रो हमे व्यक्तिगत आक्षेपो से अपने को और नवगीत को बचाना है।ये अगडे पिछ्डे दलित आदि विमर्शो से ऊपर उठकर रचना को समझने के लिए आवश्यक है।..जाति और समाजशास्त्र पर बहस अलग से करें-विनम्र आग्रह है।
July 21 at 6:32pm · Unlike · 4

Saurabh Pandey आप क्या कह रहे और किस तरह की बात कर गये आदरणीय जगदीश जी ? ऐसा भी क्या आग्रह कि सारी बातें पाण्डित्य प्रदर्शन लगीं ? क्या आजतक ऐसा लगता रहा है आपको ? आपके ही नवगीत पर मैं आजतक क्या पाण्डित्य प्रदर्शन करता रहा हूँ ? और पलायन ? या मैंने अन्यथा चर्चा से स्वयं को विलग किया है ? आप मेरा सीधा मेरा नाम ले सकते हैं, साधिकार ले सकते हैं, आदरणीय. आपको इंगितों में कह ने की क्या विवशता हो गयी, आदरणीय ? यह कैसी साहित्य चर्चा है? जो व्यक्तिगत प्रहार को अपनी उपलब्धि समझती है ?

//रमाकांत यादव द्वारा प्रस्तुत नवगीत पर उठाये गए साहित्यिक प्रश्नों का साहित्यिक उत्तर दें तो समूह के विमर्श और संवाद-परिसंवाद के लिए हितकर रहेगा तथा अनेक मित्र जो इस विमर्श पर टिप्पणी न करते हुए भी ध्यान से पढ़ रहे हैं उन्हें भी अच्छा लगेगा //

निवेदन है, आप धैर्य से एक बार अपने लिखे को पढ जायँ. क्या ऐसा भी सोचा गया है कि रमाकान्तजी के कहे को पढा भी नहीं मैंने ? ये कैसी खौंझ है जो अपने को इतना अहंमन्य बना देती है ?
July 21 at 6:32pm · Like · 1

Saurabh Pandey भारतेन्दुजी, मेरा स्पष्ट मानना है कि ब्रह्मणवादी कोई व्यक्ति नहीं एक प्रवृति होती है. यदि इस महीन अंतर तक को नहीं जानता या किसी मंतव्य और वाद के तहत उसे जानने नहीं दिया जाता, तो समाज का हित नहीं. फिर सारी बातें चर्चा विमर्श आदि व्यक्तिगत क्रोध का पर्याय हैं. हम फिर लाख आमजन की बात करते रहें.. उसकी परिणति ’मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू’ से अधिक नहीं होने वाली. और हम आमजन की बात करते हुए किसी पर अहसान नहीं कर रहे हैं. फिर भी यह सोच है जो गलत को गलत और सही को सही ठहराने की चेतना देती है. यदि इस सोच पर ही प्रहार होने लगे. तो फिर सबकुछ भले होता दिखे, साहित्य चर्चा नहीं. और तुर्रा ये कि अनर्गल रोदन का पर्याय कहा जाता है. आखिर यह मतभेद है. लेकिन मनभेद के बीज रोपने को श्रेष्ठता कहा जा रहा है ? किसने किनको कितना चढ़ा दिया है भाईजी ?

एक बात और, जहाँ-जहाँ दोयम दर्ज़े का निरंकुश विचार हावी होता है, वहीं ब्राह्मणवाद हावी होता है, जो स्वयं को प्रभावी बताने के लिए हर तरह की धुर्तई और वाचालता अपनाता है.
July 21 at 6:44pm · Like · 3

Jagdish Prasad Jend प्रिय सौरभ जी ,आपको मेरी टिप्पणी से आघात पहुंचा कि मुझे स्पष्ट कह देना चाहिए था और हमारे बीच के व्यक्तिगत संबंधों का उल्लेख किया है। मेरा कहना है कि आपकी पोस्ट से पहले भी कई लोगों ने अपने विचार प्रकट किये हैं तथा मेरी टिप्पणी के ठीक बाद आपका मत पोस्ट हुआ है जिसमें बहुत कुछ कहा गया है ,प्रासंगिक भी और अप्रासंगिक भी ,जिसे कई किस्तों में आगे बढ़ाया गया है। जिनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि मेरी टिप्पणी पढ़कर आप विचलित हो गए जबकि मैंने एक बहस को आगे बढ़ाते हुए अपना विचार रखा था और चाहा था कि रमाकांत यादव के प्रश्नों को दृष्टिगत रखते हुए विमर्श हो। आपके लगातार कई कमेंट्स से यही प्रकट हो रहा था कि आप प्रस्तुत नवगीत और नवगीतकार के बचाव में मुझ पर परोक्ष प्रहार कर रहे हैं। आपकी बेचैनी का कारण कुछ भी रहा हो।मैंने अपने मंतव्य में एक सामान्य चर्चा की है जिसे आपकी टिप्पणियों में अन्यथा लिया गया और परोक्ष रूप से कहा गया कि राजनीति चल रही है। जहां तक शैलेन्द्र जी का प्रश्न है मैं स्वयं उनके गीतों का प्रसंशक रहा हूँ तथा यथास्थान टिप्पणियाँ भी की हैं। और आपसे तो मेरे अनुजवत सम्बन्ध हैं। मेरा आशय नवगीत तक ही सीमित है, हम असहमत हो सकते हैं, विचार भिन्नता हो सकती है किन्तु कटुता से बचना उचित है। जहां तक रमाकांत यादव का प्रश्न है मेरा उनसे कोई व्यक्तिगत परिचय भी नहीं है तथा इसी समूह की एक अन्य पोस्ट पर मेरे उनसे भिन्न विचार हैं। मैंने अपने विचार बिना किसी दबाव और दुराग्रह के रखे हैं। इस पोस्ट की शुरुआत रमाकांत यादव द्वारा कुछ प्रश्नों के साथ की गयी है और उनका उत्तर चाहा है। मैं भारतेंदु मिश्र जी के साहस की सराहना करता हूँ कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है,… //..जहां तक रमाकांत यादव जी का प्रश्न है कि ये गीत सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है..ये सही बात है ..लेकिन ये मानसिकता कवि के साथ नही बल्कि रमधनिया से रामधनी बनने के बीच जो उसके चरित्र मे परिवर्तन हुआ है उस सत्ता सुख के साथ जुडी है तात्पर्य ये कि जब कोई सत्ता तक पहुंच जाता है तो वह सवर्णता वादी /मनुवादी आचरणो व्यवहारो को सहज मे ही अपना लेता है।// .... और पूरी तार्किकता से अपनी बात के समर्थन में जीवंत सामाजिक उदाहरण दिए हैं। वे उदाहरण साहित्येतर हो सकते हैं किन्तु काल्पनिक नहीं हैं । विमर्श में मतभिन्नता तो होनी ही है अतः अपने विपरीत मत और उसके आशय को समझने का स्थान बनाये रखना चाहिए। मैं समझता हूँ कि इस नवगीत पर काफी विमर्श हो चुका है और आगे बढ़ने पर तल्खियाँ ही बढ़ने का भय है अतः अब विराम देकर समापन की ओर बढ़ा जाये।
सादर,
--जगदीश पंकज
July 21 at 11:31pm · Like · 1

Saurabh Pandey इस तरह से कुछ भी समझ लिये जाने को, भाईसाहब, योग सूत्र में ’विपर्यय’ कहते हैं. जो मात्र अपनी आग्रही मान्यताओं तथा सूचनाओं पर निर्भर करता है, नकि तार्किक सोच पर.
आपसे निवेदन है कि आप पुनः मेरी दोनों टिप्पणियों को पढें. विशेषकर नवगीत की समीक्षा वाले भाग को. आप समझेंगे, उस पोस्ट का समापन कैसे हुआ है. आपको स्प्ष्ट होगा कि मैंने भी ढोंगी प्रवृति और तथाकथित सवर्ण-व्यवहार को हर तरह की विद्रूपता का कारण माना है.
सर्वोपरि, मेरी टिप्पणियों का आधार आपकी टिप्पणी थी ही नहीं. वस्तुतः, अपनी टिप्पणियों को पोस्ट करने के बाद मैंने आपकी टिप्पणी देखी थी. मैं भाई रामशंकर वर्माजी से टिप्पणियों के माध्यम से जिस तरह से बातचीत करता चला गया हूँ, उसे भी देख जाइये. खैर..

दो बातें अवश्य कहूँगा -
एक, नवगीत समीक्षा में मैंने यदि कदम बढाये हैं तो यह मेरे अपने मंतव्यो को थोपने का माध्यम नहीं बनेगा. इसके प्रति सभी आश्वस्त रहें.
दो, हर रचनाकार में एक सचेत पाठक अवश्य हो, अन्यथा रचनाकार की आत्ममुग्धता उसे कुछ भी करा सकती है. उसके क्रोध को दिशाहीन कर सकती है. जबकि रचनाकार के हृदय की ज्वाला साहित्य संवर्द्धन के लिए अत्यंत आवश्यक है. समाज वही समरस होता है जिसके सदस्य अपने सार्थक क्रोध को सदिश रख पाते हैं. तभी वे तार्किक ढंग से वैचारिक होते हैं.

जगदीश जी, आपके माध्यम से कुछ सदस्यों को पुनः कहूँगा - संपर्क और सान्निध्य से परिचित हुआ जा सकता है, रचनाकर्मी और साहित्यकार नहीं हुआ जा सकता. वर्ना प्याज लिए बैठे रहेंगे और प्याजी कोई और खायेगा.

मैं कुछ भी हृदय में नहीं रखता. लेकिन यह अवश्य है कि, रचनाओं पर समाज के सापेक्ष परिसंवाद तथा राजनीतिक एवं समाजशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में दिये जाने वाले तर्क दो भिन्न स्थितियाँ पैदा करते हैं. हमारी चैतन्य-सोच इसे समझे और इसे अवश्य गुने. आदरणीय रमाकान्तजी का रचनाकर्म साग्रह हो लेकिन उन्हें गीत-नवगीत की समझ बढ़ानी होगी. वर्ना माहौल बार-बार अग्निमय होगा. क्योंकि गाँठें जब खुल जाती हैं तो बार-बार खुलती हैं

आदरणीय जगदीशजी, हर समय विमर्श के नाम पर लट्ठ भांजना अखाड़ो का आचरण है. हम अखाड़ेबाजी न करें.
सादर
July 22 at 12:13am · Edited · Like

अवनीश सिंह चौहान प्रिय सौरभ जी, विमर्श के नाम पर लट्ठ भांजने का कार्य कौन कर रहा है और वह भी गुट बनाकर? यह पाठक बखूबी समझ रहे हैं और आदरणीय जगदीश पंकज जी भी संकेत कर चुके हैं। तिस पर भी आप आदरणीय जगदीश पंकज जी को नसीहत दे रहे हैं। आपने तो रमाकांत जी को भी नसीहत दे डाली कि उन्हें अपनी समझ बढ़ानी होगी। आपने आदरणीय डॉ जगदीश व्योम जी को भी कह दिया कि विमर्श के नाम पर यह क्या चल रहा है। आपने यह भी लिखा कि 'संपर्क और सान्निध्य से परिचित हुआ जा सकता है, रचनाकर्मी और साहित्यकार नहीं हुआ जा सकता' - यह भी एक नसीहत है। आपकी टिप्पणियों को अगर ठीक से पढ़ा जाय तो ऐसे कई बिन्दु प्रकट हो जायेंगे जो एकपक्षीय हैं और अखाड़ेबाजी की ओर संकेत करते हैं। आपसे तो यह उम्मीद नहीं थी। आपसे तो बेहतर यहाँ वे आलोचक हैं जिन्होंने शुरू मैं रमाकांत जी द्वारा कही गयी बात - सवर्णवादी मानसिकता - को बाद में अपने ढंग से स्वीकार किया और कहीं भी रमाकांत जी को समझ बढ़ाने की नसीहत नहीं दी, उम्र और अनुभव में बड़े होने के बावजूद भी; और जिन्होंने भिन्न मत भी दिया उन्होंने अपनी भाषा को संयमित बनाये रखा। इसे कहते हैं बड़ी सोच।
July 22 at 8:33am · Edited · Like · 1

Jagdish Vyom किसी रचनाकार के अन्दर की गाँठे ज्यों ज्यों खुलती जाती हैं त्यों त्यों रचनाकार के रूप में उसका कद बढ़ता जाता है, इसलिए मन की गाँठों का खुलना एक रचनाकार के लिए बहुत जरूरी है.... गीत और नवगीत में एक अन्तर यह भी है.... यदि गाँठें लगी हैं तो कम से कम नवगीत को नहीं समझा सकता... नवगीत विमर्श समूह है ही इसलिए कि मन की गाँठे खुल सकें...... और हाँ रमाकान्त ने जो प्रश्न उठाया है उसकी गम्भीरता को धैर्य के साथ समझने की आवश्यकता है यह नवगीत को समझने के लिए भी जरूरी है..... यह केवल एक रमाकान्त का प्रश्न नहीं है सैकड़ों रमाकान्तों का प्रश्न हो सकता है.....
सभी से यह अनुरोध है कि विमर्श को व्यक्तिगत न बनायें...... यहाँ लिखी जाने वाली टिप्पणियाँ न जाने कितने लोग पढ़ रहे हैं ..... इसका ध्यान रखें
July 22 at 7:49am · Like · 3

Saurabh Pandey अबनीश भाई, जिन कुछ पंक्तियों को आप नसीहत कह रहे हैं, वे अनुरोध हैं. आपकी बातों से इत्तफ़ाक रखता हूँ कि सभी समझ रहे हैं कि कौन क्या कर रहा है. यह सही है भाईजी, कि सभी को भान हो रहा है कि कौन क्या कर रहा है.

जिस तरह से विमर्श के तौर पर जो कुछ पोस्ट होने लगा, जिसे ऊपर के पोस्ट में हमने पढ़े, तब ही मैंने आदरणीय जगदीश व्योम जी से निवेदन किया था कि वे देखें कि विमर्श के नाम पर क्या चल रहा है. उससे पहले आदरणीय रमाकान्त जी के पोस्ट के आधार पर ही टिप्पणी की थी हमने.

साहित्य और रचना की समझ के अनुसार चर्चा हो यही उपलब्धियों के मार्ग प्रशस्त करेगा. भाईजी, आपने मुझे अधिक नहीं सुना है. आदरणीय जगदीश पंकज जी जानते हैं मुझे. इसी कारण उनके कुछ कहे पर मैं इतना चौंक गया था, और फिर, बाद मे उनकी भी समीक्षकीय टिप्पणी पढी. स्पष्ट है कि उनको भ्रम हुआ था कि मैंने उनको कुछ कहा है. इस पर बात हो गयी है. विश्वास है, उनका भी भ्रम निवारण हो गया है.

मंचीय मठाधीशी पर संभवतः आजतक कभी किसी ने नहीं देखा है मुझे. अतः भाईजी, सादर निवेदन है कि ऐसे भ्रम न पालें, न साझा करें. उम्र का लिहाज हम खूब करते हैं, इज़्ज़त करते हैं. लेकिन यह भी सही है कि समीक्षकीय टिप्पणियों और रचनाओं से कोई रचनाकार बड़ा बनता है. रचनाएँ और त दनुरू प समझ बड़ी हों तभी साहित्य का सही रूप से भला होगा. और मेरा ऐसा कुछ कहना मेरी कोई नसीहत नहीं, आजतक आप सबों के सान्निध्य में आयी हुई समझ ही समझी जाय. अन्यथा मठ और मठाधीशी कैसी और कहाँ हो रही है, हमसभी खूब समझते हैं. व्यक्तिगत ह म कभी नहीं होते. किन्तु, वास्तविकता को मानते हैं.
सादर
July 22 at 12:37pm · Edited · Like · 1

Saurabh Pandey //मन की गाँठों का खुलना एक रचनाकार के लिए बहुत जरूरी है.... गीत और नवगीत में एक अन्तर यह भी है.... यदि गाँठें लगी हैं तो कम से कम नवगीत को नहीं समझा सकता. //

सटीक है, आदरणीय जगदीश व्योमजी. हम समझ से आगे बढ़ें. यही श्रेयस्कर है.
शुभ-शुभ
July 22 at 12:33pm · Unlike · 1

Ramshanker Verma तो क्या नवगीत के श्रेष्ठ समीक्षक बताने की कृपा करेंगे कि गीतकार और गीत सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है? क्योंकि अब तो तथाकथित गुटों ने काफी समुद्रमन्थन कर लिया है उत्स प्राप्त हो जाना चाहिए।
July 22 at 1:45pm · Like · 1

सीमा अग्रवाल कोई भी रचना रचनाकार की बस तभी तक रहती है जब तक वो उसकी डायरी में महफूज़ है । सार्वजनिक होते ही रचना पर पाठकों का अधिकार हो जाता है। रचनाकार को उसी क्षण उस पर से अपना दावा छोड़ देना चाहिए । इसके बाद यह मायने नहीं रखता की रचनाकार उसमे क्या कहना चाहता था (विशेष विवादित परिस्थितियों को छोड़ कर)
हर पाठक की मानसिक स्थिति का अपना रंग होता है
जिसके पृष्ठभूमि पर रख कर वो रचना को देखता है इसलिए हर दीवार पर उस एक रचना की रंगत भी भिन्न होगी ही होगी । अब अगर किसी को यह रचना जातिवादी मानसिकता की लगी तो यह उसका अपना मत है जबरन सबको उसी मत का हिस्सा नही बनाया जा सकता उन पाठकों का अभिमत भी उतना ही महत्व स्खता है जिनको इस रचना में ऐसा कुछ नहीं दिखा । इस पर विवाद क्यों ?
मुझे यह रचना सिर्फ एक सामान्य मनोविज्ञान की खूबसूरत बानगी लगी । जिसे शैलेन्द्र जी ने बहुत बारीकी से समझा है और मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया है । एक गंभीर विषय को बेहद सहजता और सादगी से पेश किया है ।
विमर्श का विषय रचना में प्रस्तुत कथ्य का सम्प्रेषण तथा वो कितना सत्य व् सार्वभौमिक है यह होना चाहिए ।
गीत के कथ्य के पक्ष में एक छोटा सा उदाहरण .......
कक्षा में हर महीने मॉनीटर बदले जाते थे ।एक छोटे से परिवेश में ही मुझ जैसी कोने की सीट पकड़ कर बैठने वाली और कम नंबर पाने वाली छात्रा का ओहदा बदलतते ही चाल मिजाज़ आवाज़ सब बदल जाता था
वही तो गीत कह रहा है बस कैनवास बड़ा है
एक सामाजिक या आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग जब बड़ा ओहदा पाता है तो न केवल वो दुनिया के लिए बदलता है बल्कि दुनिया भी अपना आचारण बदल लेती है । सटीक मानसिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है शैलेन्द्र जी ने दोनों पक्षों का ।
बहुत बहुत बधाई ।
July 29 at 11:23am · Edited · Like · 3

०००००

Bhartendu Mishra
August 3 at 7:05pm
एक हाथ मे पेप्सी कोला
दूजे मे कंडोम
तीजे मे रमपुरिया चाकू
चौथे मे हरि ओम
कितना ललित ललाम यार है
भारत घोडे पर सवार है॥...ये सास्कृतिक नवगीत का अंश है।आप भी चाहें तो नवगीत के बारे मे और इसके कवि के बारे में अपने विचार रख सकते हैं।अभी इतना ही कि ये एक बडे विद्वान कवि का गीत है।

सुधीर कुमार निश्चय ही बड़े विद्वान कवि की ही रचना होगी क्योंकि सामान्य कवि तो दो हाथों की ही बात करते ..... यहाँ तो चार हाथ है और चारों भरे हुए.......
August 4 at 8:09pm · Unlike · 1

Ramakant Yadav भारत की सांस्कृतिक विद्रूपता का सटीक और सजीव चित्रण।दिशाहीन भारत पाखंडी मानसिकता को महान मानकर विश्वगुरू बनने का सपना देख रहा है।आखिर गीतकार का नाम छिपाकर आप लोग पहेली जैसा खेल क्यों खेल रहे हैं?
August 4 at 8:19pm · Unlike · 3

Bhartendu Mishra ये गीत मैने आलोचना (सं. नामवर सिह ) पत्रिका मे पढा था।
August 4 at 9:01pm · Like · 1

Jagdish Vyom नाम देखकर फिर लोग नाम के अनुरूप टिप्पणी करने लगते हैं.... झूठी तारीफों के पुल बाँधने लगते हैं... रचना पीछे रह जाती है और रचनाकार का गुणगान होने लगता है......
August 4 at 9:05pm · Like · 6

Ganga Pd Sharma बिल्कुल सही बात है व्योम जी! "नाम के अनुरूप टिप्पणी करने लगते हैं.."बड़े नाम के नीचे दबकर छोटे-मोटे आलोचक तो पिर्र-पिर्र यानी कुछ का कुछ बकने लग जाते हैं।
August 4 at 9:13pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra ध्यान से पढें इसमे बाजार भी है और संस्कृति भी।
August 4 at 9:16pm · Unlike · 1

Ganga Pd Sharma इसमें भारत को चतुर्भुजी मुद्रा मे दिखाया गया है। मदर लैंड के बजाय फादर लैंड का संप्रत्यय (concept)उसे पौरुष से संपन्न बना रहा है। शंख,चक्र और गदा आदि अब अप्रासंगिक हो चुके हैं ।इसलिए विष्णु ने कलियुगानुकूल वस्तुएँ हाथ मे धारण कर राखी हैं। कुल मिलाकर यह वैष्णव गीत है।
August 4 at 9:19pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra जी शर्मा जी आप सही दिशा मे हैं।
August 4 at 9:21pm · Unlike · 1

Jagdish Vyom आगे की पंक्तियाँ भी जोड़ लें इसमें----
" एड्स और समलैंगिकता की
रहे सलामत जोड़ी
विश्वग्राम की समता में
हमने सीमाएं तोड़ी
दुनिया पर एकाधिकार है
भारत घोड़े पर सवार है "
August 4 at 9:41pm · Like

Ramakant Yadav बाजार आज की संस्कृति का सबसे बड़ा हिस्सा है।आज हमारी समूची संस्कृति बाजार की गुलाम है।और हां नाम पता होने पर झूठी तारीफों के पुल बांधने वाले या अपना गुट साधने वाले भी समझ में आ ही जाते हैं।ऐसे झूठे लोगों को भी समझना भी जरूरी है।
August 4 at 9:47pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra यह गीत नईसहस्राब्दी के आगमन के आसपास लिखा गया होगा।क्योकि आलोचना के वर्ष 2001 के किसी अंक मे छपा था।तब चर्चा हो रही थी कि हिन्दी कविता अपने लिए कोई नया रूपक नही गढ पा रही है और ये भी कि कविता चुक रही है।कुछ लोग उत्तर आधुनिकता के कांसेप्ट की बात कर रहे थे।इस गीत मे कल्की अवतार का रूपक लिया गया है।जो घोडे पर सवार होकर भाग रहा है। लेकिन उसके हाथ मे जो कुछ है वह आप देख ही रहे हैं।आप सही कह भी रहे हैं।बाजार और संस्कृति जब जुड जाते हैं तो हमारे नैतिक मूल्यो का क्षरण होने लगता है।कई हरि ओम कहने वाले बाबा जेल मे हैं।ऊपर से ये नकली सांस्कृतिक दुनिया बहुत ललित चकाचौन्ध करने वाली लगती है।हमारा भारत विकास के ऐसे ही घोडे पर सवार है। धर्मान्ध लोग संस्कृति को बाजार मे ही खोजने लगे हैं।यह भी एक सन्देश मिलता है।
August 5 at 5:50am · Unlike · 4

सुधीर कुमार आदरणीय भारतेन्दु जी, क्या यह पूरा गीत यहाँ नहीं दिया जा सकता है ? यदि संभव हो तो अच्छा रहेगा ..... एक टुकड़े से कुछ समझना मुश्किल हो जाता है..... कृपया विचार करें.....
August 5 at 9:14am · Unlike · 2

Bhartendu Mishra आपका कहना सही है लेकिन मुझे इतना ही याद है और मैने अपनी पुस्तक-समकालीन छन्दप्रसंग -मे इतना ही उद्धृत भी किया था।आलोचना का पुनर्नवा अंक मिले तो पूरा गीत मिल सकेगा।ये प्रसिद्ध कवि अष्टभुजा शुक्ल जी के गीत का अंश है।
August 5 at 5:48pm · Unlike · 1

Om Prakash Tiwari वाकई पूरा गीत पढ़ने की इच्छा हो रही है। सटीक चित्रण है आज के भारत का।
August 6 at 11:27pm · Unlike · 2

Jagdish Vyom पूरा गीत यह है--

==== भारत घोड़े पर सवार है ===

एक हाथ में पेप्सी कोला
दूजे में कंडोम
तीजे में रमपुरिया चाकू
चौथे में हरिओम
कितना ललित ललाम यार है
भारत घोड़े पर सवार है

एड्स और समलैंगिकता की
रहे सलामत जोड़ी
विश्वग्राम की समता में
हमने सीमाएं तोड़ी
दुनिया पर एकाधिकार है
भारत घोड़े पर सवार है

आठ हजार जेन की मारूती
बिकी मुक्त बाजार
एक हजार पुस्तकें छप कर
पड़ रहीं बेकार
वैभव द्विज, रचना चमार है
जगद्गुरु उत्तम विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

कहीं बलात्कार हो जाये
तो चुप रहना नारी जी
बूढ़ी होने पर मुआवजा
देंगे अटल बिहारी जी
तीस फीसदी पर विचार है
भारत घोड़े पर सवार है

तुम भी खालो हम भी खा लें
थोड़ा-थोड़ा देश बचा लें
जब तक जीयें झोंपड़ी-झुग्गी
तब तक अपनी सौंध उठा लें
लालू जी कैसा बिहार है
भारत घोड़े पर सवार है

चंद्रशेखर जी दा़ढी में
कुछ फंसे हुए हैं तिनके
बाल ठाकरे हार चुके
रुद्राक्षी दाने गिन के
कितना पक्का जनाधार है
भारत घोड़े पर सवार है

शासन और प्रशासन से ही
सड़क नहीं है खाली
बची-खुची जगहों पर बाबू
पुलिस पहुंचनेवाली
जनता की सरकार यार है
भारत घोड़े पर सवार है

दुनियावालों आकर देखो
यहां अहिंसा रोती
जाती हुई सदी में भारत
खोल चुका है धोती
आर्यपुत्र को रथ विकार है
हलो! फोन का कटा तार है
भारत कितना मजेदार है
भारत घोड़े पर सवार है.

-अष्टभुजा शुक्ल
August 7 at 10:31am · Edited · Like · 4

Ramakant Yadav कुल मिलाकर अच्छा गीत है लम्बा खिंचने के बावजूद।आज के गीतकार नवगीतकार इस गीत से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
August 7 at 10:28am · Unlike · 1

Ranjana Gupta अच्छा कटाक्ष है !वैसे भी पोर्न कल्चर ,भ्र्ष्ट सामाजिक राजनैतिकपरिवेश,और ऊटपटाँग जनतन्त्र की कसरत से भारत की जनता त्रस्त हो चुकी है ! जनता खुद भी यहाँ आलसी,अशिक्षित, और भेड़चाल को ही समर्पित है,फिर ऐसे नवगीत ही पूरे भारतीय साँचे के बदले हुए परिवेश पर बेहतर तंज कस सकते है!
August 7 at 4:22pm · Edited · Like

Shiv Murti Tiwari *भारत घोड़े पर सवार है* अद्भुत व्यंजना वाह!!!
August 7 at 1:44pm · Like · 1

Bhartendu Mishra बहुत बढिया व्योम जी,आपने मेरा ही काम कर दिया।..जरा ये सोचिए कि ये नवगीत 15 वर्ष पहले लिखा गया था।..अब भी हम यथार्थ की बात करते हुए शरमाते हैं। इसी लिए मेरा आग्रह है कि लोगो को अपने समकालीनो के नवगीत /गीत पढने के बाद नवगीत की प्रवृत्तियो पर बोलना चाहिए।यह गीत हमारे सांस्कृतिक परिवेश पर आज भी उसी तरह फिट बैठता है जैसा पन्द्रह वर्ष पहले रहा होगा।
August 7 at 6:00pm · Unlike · 4

०००००



Ramakant Yadav
July 27
आज के जागरण में कमलेश भट्ट कमल ने किशन सरोज का साक्षात्कार लिया है। किशन सरोज कहते हैं-
नई कविता ने उतना नुकसान गीतों का नहीं किया है जितना नवगीतों ने किया है।यदि मां को घर से बाहर निकालकर उसी पर झूठी संवेदना के नवगीत रचे जायेंगे तो वे मन को कैसे छू पायेंगे।
और यह भी कि राग तत्व से बड़ा कविता के लिए कोई जरूरी तत्व नहीं।
नवगीतों की सबसे बड़ी मुश्किल एकरसता की है।
इस धरती पर जब तक रंग बिरंगे आंचल और गंध लुटाते फूल हैं इन गीतों(भ्रमर)का सृजन बंद नहीं हो सकता।
गीत नवगीत के संदर्भ में किशन सरोज से आप कहां तक सहमत हैं?एक सम्पूर्ण विचार दृष्टि दे पाये हैं वो?या कहीं कुछ असंतुलित है बाकी है?


You, Ramshanker Verma, Brijesh Neeraj, Jairam Jay and 4 others like this.

Fanindra Kumar //यह भी कि राग तत्व से बड़ा कविता के लिए कोई जरूरी तत्व नहीं//.........अर्थात भाव और बिम्ब का कोई अर्थ नहीं ?
July 27 at 9:56pm · Like · 1

Bhartendu Mishra वे स्वयं मंचीय गीत के समर्थक है उनसे नवगीत के बारे में और आप क्या उम्मीद करते हैं मंच जहां कवि नही शुद्ध गवैये और भांड जुटते हैं। ऐसे लोगो के मत का साहित्यिक विमर्श की द्रष्टि से क़ोई अर्थ नहीं।
July 27 at 10:12pm · Edited · Like · 4

Jagdish Vyom गीतों का नुकसान नवगीतों ने किया..... यह क्या कह रहे हैं किशन सरोज जी .....
July 27 at 10:21pm · Like · 4

Jai Chakrawarti किशन सरोज जी बुजुर्ग गीतकार हैं , जिनहोने कवि सम्मेलन के मंचों पर अपना लगभग पूरा जीवन व्यतीत किया है । और सब जानते हैं कि मंचों पर राग तत्व अर्थात गेयता ही प्रमुख होती है । नवगीत इसके बिलकुल उलट, सम-संदर्भों को समेटकर रचा जाने वाला गीत है , जिसमे जीवन , समाज और देश की विडंबनाएं और विरूपताओं को प्रधानता दी गई है । किशन सरोज जी ने नवगीत के वारे मे जो कुछ कहा है , उसे कहने का उन्हें पूरा हक़ है , किन्तु उनके ऐसा कह देने भर से नवगीत और नवगीतकारों पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।
July 27 at 10:23pm · Unlike · 7

Bhartendu Mishra साक्षात्कार का शीर्षक तो सही है लेकिन मुझे यकीन है कि किशन सरोज जी कविता मे राग तत्व को समझ पाने मे सक्षम नही हो पाए हैं..राग का अर्थ उन्होने केवल मंचीय गलेबाजी से लगाया है।अन्यथा वे यह कतई न कहते किनई कविता की अपेक्षा नवगीत ने गीत का ज्यादा नुकसान किया है। कविता मे रागतत्व सचमुच आवश्यक है लेकिन वो नही जिसका समर्थन किशन सरोज जी कर रहे हैं।..उन्हे मालूम होना चाहिए-काव्य्ं गीतेन हन्यते।-भी कहा गया है।
July 27 at 10:35pm · Unlike · 4

Brij Nath Srivastava गाने बजाने वाले से आम आदमी के सुख दुख से क्या मतलब ।उसे अगली पीढ़ियों के लिए साहित्य के दायित्व से क्या लेना। आज वाल्मीकि ने रामायण न लिखी होती तो लोग नहीं जान पाते कि राम भी थे इसी प्रकार व्यास जी ने महाभारत न लिखी होती तो दुनिया कृष्ण के विषय में अनजानी रह जाती ।किशन सरोज मेहदी रचे हाथो से इश्क मिजाजी के प्रेम पत्र जल में प्रवाहित करते रहे और मंचों पर गाते बजाते रहे बस साहित्य और समाज के दायित्व से मुक्ति
July 27 at 10:46pm · Like · 2

Ved Sharma भारतेंदु जी थोड़े कठोर हो गये हैं क्योंकि सरोज जी ने भी बिना सोचे समझे बातें कही हैं राग प्रेम को कमलेश व सरोज जी खुलेपन से जैसे जोड़ रहे हैं उससे पता चल जाता है की राग और प्रेमउनके लिएकितना गहरा और व्यापक है दुनिया कहाँ पहुंच गई तो क्यागीत या कविता को मेंहदी महावर व वैयक्तिक रुदन में ही डोलते रहनाचाहिए सचतो यह हैकी इसीतरह के रचना कर्म रचनाधर्म ने गीतकी छीछा लेदर कराई जो लोग सतही तोर पर फतवा शैली में बात करते हों उन्हें गंभीरतासे लेना समय बर्बाद करना है जहाँतक एकरसता की बात है उनसे पूछिए कितने और किस किसके संग्रह सरोज जीने और कमलेश जीने पढ़े हैं कमलेश जी नवगीत तो छोडिए गीत से कितना वार्तालाप करते हैं यदि कमलेश जीको सार्थक बात करनी थी तो किसी प्रतिष्ठित नवगीतकार से भी बात करते तो अच्छा होता बाकी यदि केवल अखबार में खबर बनना हीसाध्य है तो दोनों को बधाई ........सरोजजी कमलेश जी जिन गीतों की बात कर रहे हैं उसे कौरवी भाषा/बोली में रांडरोवना कहतेहैं उसकेदिन कभी के लद चुके हैं वाह वाह के अलावा भी कविता की एक दुनिया है और कडवा सच यह है कि यही कविता की सहीदुनिया है नही तो वाल्मीकि वेदव्यास तुलसी आज भीप्रासंगिक न होते ..........परमात्मा हम सबको स्द्बुधि दे
July 27 at 11:09pm · Like · 3

Bhartendu Mishra वेद जी समीक्षा या आलोचना की भाषा तलवार की धार जैसी होती है।गीत की तरह तालीपिटाऊ माधुर्य और श्र्व्यता से परिपूर्ण कैसे हो सकती है ? आलोचना मे लाग लपेट नही हो पाता।और फिर नई पीढी जो नवगीत को सार्थक ढंग से समझना चाहती है उसके सामने सच्चाई रखना सबका कर्तव्य है।किशन सरोज जी या फिर कमलेश भट्ट जी हमारे आदरणीय है लेकिन वो जहां अतार्किक होंगे वहां हमे उनके विचारो का खंडन करने का भी अधिकार है।
July 28 at 6:23pm · Edited · Unlike · 4

Jairam Jay Samay aur kaal k anusar kavita bhi chalti hai vaise kishan ji ki mansikta manch tak seemit hai ve hamare aadarneey hai unki ye bat to samajh me nhi aayi ki naee kavita ne navgeet ka nuksan nhi kiya hai !
July 28 at 8:15am · Like · 1

Ranjana Gupta सम्भवतः किशन जी का तातपर्य लयात्मकता से है,उन्होंने अपने समय में ही सही,बहुत मार्मिक और बरसोंबरस जेहन पर,मन पर छा जाने वाली कवितायेँ लिखी है,व्यक्तिगत रूप से तो मैं आज भी उनकी कविताओं के जादू से मुक्त नही हूँ,पर समकालीन सन्दर्भ को वे आत्मसात नही कर पाये ,अपनी तरह की रचनाये उनकी सीमा है,और सीमा के पार की दुनिया वे देखना नही चाहते क्यों ?आज जटिल जीवन ,कठिन समय कविता से स्वयं को परिभाषित करने की माँग करता है,आज के समय के दारुण लम्हें,नवगीत के रूप में कठोर नियति पर प्रहार कररहे है,और ताजा झोंके की भाँति साहित्य को समृद्ध कर रहे है,गीतों की एकरसता टूटी है,उन्होंने नवगीतों के रूप में पुनर्जन्म लिया है,फिर कैसे नवगीत रागात्मकता को ,गीतों को, नुकसान पहुँचा रहे है?
July 28 at 8:54am · Edited · Unlike · 5

Jagdish Vyom गीतों का जादुई प्रभाव श्रोताओं को प्रभावित करता रहा और सुरीले कंठ वाले गीतकार मंचों के राजकुमार बने रहे यह सच है, लेकिन यह भी सच है कि जब जादुई प्रभाव होता है तो यथार्थ से जुड़ी प्रवृत्तियाँ कहीं पीछे छूट जाती हैं, जन सामान्य की यथार्थ भावनाओं, उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता है वहाँ तो जादू का प्रभाव और ताली की गूँज ही सब कुछ होती है, मंचों पर आज भी यही सब चल रहा है... बड़े बड़े पुरस्कार पद्मश्री, यशभारती और अन्य इसी जादुई प्रभाव से प्रभावित हैं [हाल में मिले पुरस्कारों को देख लीजिये] .... ऐसे में गीत का यह जादुई प्रभाव कम होता है और यथार्थ से जुड़ी अभिव्यक्तियाँ गीत को नवगीत में बदल देती हैं.... तो फिर एक प्रकार से नवगीत के द्वारा गीत के इस जादुई प्रभाव को कम करने का ही तो कार्य हुआ.... यही बात किशन सरोज जी भी कह रहे हैं..... हाँ वे स्वयं को नहीं बदल पाये.... इसे वे स्वीकार भी करते हैं...."आपने ठीक कहा, मैंने यथार्थ से जुड़ी अभिव्यक्तियों को जरूरी नहीं समझा और इसका मुझे पछतावा भी नहीं है ..... ठीक है मैं वैसा नहीं कर पा रहा हूँ जैसा दूसरे लोग कर रहे हैं..." अपने समय के अनुरूप जो अपने को नहीं ढाल पाता है उसे कूप मंडूक कहा जाता है, गीत के जिन कवियों ने समय के अनुरूप अपने को ढाल लिया वे नवगीत से जुड़ गये और जो अपने को नहीं ढाल पाये वे अभी भी वहीं हैं उसी कूप में.... मुझे तो लगता है कि नवगीतों ने गीतों का नुकसान नहीं किया है बल्कि यथार्थ की भावभूमि से जोड़कर उसे संजीवनी दी है.... गीत अब नवगीत के रूप में तरोताज़ा होकर पूरी दमखम के साथ अपने युगीन काव्य से होड़ लेने के लिए तैयार खड़ा है.....।
July 28 at 9:09am · Edited · Like · 6

Bhartendu Mishra ऐसे ही गीतकारो को स्व.डा.शंभुनाथ सिंह जी ने नवगीत का नादान दोस्त कहा था।मंचो पर ऐसे और भी आदरणीय हैं।
July 28 at 9:10am · Unlike · 4

Ved Sharma भारतेंदु जी मैं तो आपकी इस अदा का कायलहूँ .....भांड..कुछ ज्यादा सालगरहा था यदपि इस तरह की मानसिकता यही भाषाडिजर्व करतीहै
July 28 at 9:55am · Like · 1

Brij Nath Srivastava देवदास ने समाज को क्या दिया इश्क का नसेड़ी और सदा टुन्न रहने वाला ।बस भाई किशन सरोज जी उनके गीत उन्हें सुनकर मदमस्त हो जाने वाले श्रोता इसके अलावा कुछ नहीं। इन्हें दूसरे की लड़की दूसरे की बीवी अर्थात् परकीया मे ही मजा आता है अपने मां बाप भाई बहन भाभी अपने पालित संग में रहने वाले जीवों से प्रेम करने की क्या जरूरत ।धन्य हो भाई घनानन्द
July 28 at 3:33pm · Like

Jagdish Prasad Jend कमलेश भट्ट कमल द्वारा किशन सरोज जी के साक्षात्कार में सरोज जी का कथन है कि नई कविता ने उतना नुकसान गीतों का नहीं किया है जितना नवगीतों ने किया है। साक्षात्कार में कविता के लिए राग तत्व को जरूरी माना है। सरोज जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के आलोक में उनके कथन को ग्रहण किया जाए तो उन्हें यही कहना चाहिए था जो कहा है। जीवन भर मंचीय गलेबाजी के सहारे वाह-वाही लूटने वाले गीतकार को जीवन की कडुवी सच्चाइयों से क्या लेना-देना जब उसका काम एक अमूर्त और वायवीय संसार में मेंहदी रचे हाथों या ताल से हिलते हुए मन की कल्पनाओं में खोये रहकर कमाई होती रही हो? जिस व्यक्ति को मंच पर सुनने-सुनाने और संकेत देकर तालियों को आमंत्रित करने से ही फुर्सत नहीं मिली वह साहित्य के सामाजिक सरोकारों की ओर क्यों देखेगा और क्यों पढ़ेगा किसी भी गंभीर साहित्यिक रचना को या क्यों करेगा ऐसा विमर्श जिससे उसे कोई आर्थिक लाभ न होता हो? वास्तविकता यह है कि एक सफल मंचीय गीतकार होने के नाते जिस काल्पनिक गीत से उन्हें जो प्राप्त हुआ है उसे छोड़कर वे समसामयिक यथार्थ-बोध की ओर क्यों उन्मुख हों ?उन्होंने जिन गीतकारों से प्रभावित होने की बात की है उनमे सभी मंचीय ही रहे हैं और अधिकतर दुहरे चरित्र के प्राणी जो सच के खुरदरेपन से दूर ही रहे। सरोज जी का मनोविज्ञान उनकी परिस्थितियों की निर्मिति हैं अतः वे उससे बाहर नहीं जा सकते और उसी के अनुरूप उनका अनुभव क्षेत्र होगा। नवगीत पर फतवा देने से पहले नवगीत की परम्परा ,वैचारिकी ,सृजन और नवगीत के ध्वजवाहक रचनाकारों को पढ़ना पडेगा जो सरोज जी या उनके साक्षात्कारकर्ता ऐसा श्रम करना नहीं चाहते। बस आत्ममुग्धता में जीते हुए अपनी दूकान चला रहे हैं और मंचीय भंड़ैती को ही साहित्य मान रहे हैं। जहां राग तत्व की बात है नवगीत में गेयता भी जरूरी तत्व है तथा जो नवगीत लिखे जा रहे हैं वे अपनी गेयता के तत्व के कारण नवगीत की श्रेणी में हैं। नवगीत के लिए समकालीन वास्तविक विश्व और उसके मानव की बहुआयामी ज्ञानात्मक संवेदनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति प्रमुख है जिसे आज के अनेक नवगीतकार बखूबी निभा रहे हैं । ज़रा नवगीतों में गहरे उतर कर देखिये सरोज जी ,आपको एकरसता नहीं रचनात्मक वैविध्य के दर्शन होंगे। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जब जीवन ही विसंगतियों और विद्रूपताओं से भरा है तब उसका खुरदरापन और सत्य का झुलसा हुआ चेहरा भी नवगीत में दिखना ही चाहिए क्योंकि जीवन में केवल लालित्य और माधुर्य ही नहीं है।अतः आज के जटिल जीवन की सच्चाई को समझें और उसी की रौशनी में आज के मानव की प्राथमिकताओं का सृजन में समावेश करें यही नवगीत का ध्येय है जिसे वह निभा रहा है। साक्षात्कारकर्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह साक्षात्कार के दौरान प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों के द्वारा एक सार्थक निष्कर्ष तक पहुँचने में पहल करे तथा किसी विवादास्पद मत के लिए प्रयास न करे। इस साक्षात्कार के आलेख में कमलेश भट्ट कमल ने इस विवादस्पद कथन पर कोई समुचित प्रश्न नहीं किया अपितु एक स्तुतिगान की तरह किशन सरोज जी के महिमा-मंडन में लगे रहे। यह कमलेश जी के नवगीतविषयक अध्ययन पर भी सवाल खड़े करता है अन्यथा अपने आलेख में एक सम्यक दृष्टि अपनाते। इस पूरे विमर्श में मेरा मत है कि किशन सरोज और कमलेश भट्ट कमल पहले अपना अन्तः प्रेक्षण करके नवगीतविषयक ज्ञान को अद्यतन करके नवगीत को समझें फिर कोई फतवा देने की सोचें। -जगदीश पंकज
July 28 at 3:48pm · Like · 4

Jagdish Vyom यह नवगीत विमर्श का मंच है.... सभी से यह अनुरोध है कि टिप्पणियों में भाषा की मर्यादा का पूरा ध्यान रखें और अपनी टिप्पणी को व्यक्तिगत तो कतई न होने दें..... ठीक है आप पारंपरिक गीत से खफा हो सकते हैं.... किसी विचार से खफा हो सकते हैं परन्तु यह ज़रूरी नहीं कि केवल आप ही सही हों..... अपनी टिप्पणी लिखें.. अपना तर्क रखें पर शालीनता बनाये रखें .... " इन्हें दूसरे की लड़की दूसरे की बीवी अर्थात् परकीया मे ही मजा आता है " इस तरह की टिप्पणी क्या ठीक है ? ?
July 28 at 6:34pm · Like · 4

Saurabh Pandey इन अर्थों में एक प्रश्न यह भी उठता है, कि क्या स्वानभूतियों का व्यापक होना समष्टि से बनते संवाद का इंगित नहीं होता ? क्या हर व्यक्तिगत अनुभव व्यापकता में समूचे मानव-समुदाय का अपना अनुभव नहीं होता ? क्योंकि, वस्तुतः कोई सचेत एवं दायित्वबोध से सजग कवि अपनी व्यक्तिगत सोच में समस्त मनुष्य-जाति को ही जीता है । तभी तो व्यष्टि-समष्टि से बँधा कोई गेय-संप्रेषण वस्तुतः मानवीय चेतनानुभूति का ललित शब्द-स्वरूप हुआ करता है । विभिन्न भावों को ग्रहण कर उसकी वैयक्तिक अभिव्यक्ति मानवीय विशिष्टता है । गीतों का सम्बन्ध भले ही वैयक्तिक हृदय और उसकी अनुभूतियों से हुआ करता है, किन्तु, मानव-समाज के कार्मिक वर्ग का सामुहिक श्रमदान इन गीतों के शाब्दिक स्वरूप से ही प्रखर तथा ऊर्जावान होता रहा है । ग्रामीण परिवेश में गीत गाती स्त्रियों की सामुहिक कार्यशीलता हो या खेतों या कार्यक्षेत्र में कार्यरत पुरुषों का समवेत प्रयासरत होना हो, गीत स्वानुभूतियों को ही समष्टि की व्यापकता में जीते हैं । अर्थात, वैयक्तिक हृदय से उपजे गीतों का बहुजन-प्रेरक, बहुउद्देशीय-स्वर एवं इनकी सांसारिकता पुनः एक सिरे से परिभाषित होती है ।

वस्तुतः, गीतों में आया आधुनिकताबोध गीतों में सदियों से व्याप गये ’वही-वहीपन’ का त्याग है । इसे पारम्परिक गीतों को सामने रख कर समझा जा सकता है, जहाँ बिम्ब-प्रतीक ही नहीं कथ्य तक एक ढर्रे पर टिक गये थे । रूमानी भावनाओं या गलदश्रु अभिव्यक्तियों से गीतों को बचा ले जाना भगीरथ प्रयास की अपेक्षा करता था । इसी तरह के प्रयास के तहत अभिव्यक्तियों के बासीपन से ऊब तथा अभिव्यक्ति में स्वभावतः नवता की तलाश आधुनिक सृजनात्मकता प्रक्रिया का आधार बनी । जो कुछ परिणाम आया वह ’नवगीत’ के नाम से प्रचलित हुआ । अतः गीत का नया कलेवर कोमलता के नाम पर मात्र गलदश्रु भावनाओं को ही नहीं जीता । रीढ़हीन भावाभिव्यक्तियों तथा कोमल भाव-संप्रेषणों में महती अंतर होता है । इसे न समझ पाना समस्त भ्रमकारी वक्तव्यों का कारण है हुआ करता है । जिससे ह म दो-चार हो रहे हैं ।

परन्तु, आमजन को जोड़ने के क्रम में यह भी प्रतीत होने लगा है, और यह अत्यंत दुःख के साथ स्वीकारना पड़ रहा है, कि नवगीतों के माध्यम से हो रही आज की कुछ रचनाकारों की अभिव्यक्तियाँ मानकों के नाम पर अपनी ही बनायी हुई कुछ रूढ़ियों को जीने लगी हैं । जबकि गीतों में जड़ जमा चुकी ऐसी रूढियों को ही नकारते हुए ’नवगीत’ सामने आये थे । इस स्थिति से ’नवगीत’ को बचना ही होगा, आज फ़ैशन हो चले विधा-नामकरणों से खुद को बचाते हुए ! यह स्वीकारने में किसी को कदापि उज़्र न हो, कि ’नवगीत’ भी प्रमुखतः वैयक्तिक अनुभूतियों को ही स्वर देते हैं जिसकी सीमा व्यापक होती हुई आमजन की अभिव्यक्ति बन जाती है ।
July 29 at 1:17am · Edited · Unlike · 5

Jagdish Prasad Jend सौरभ जी ने गीत से नवगीत तक की पृष्ठभूमि और वैयक्तिक से सामूहिकता में श्रमशील और खेतों में काम कर रही ग्रामीण महिलाओं के सहगान के जीवित दृष्टान्तों से व्यष्टि और समष्टि के एकात्म का उल्लेख किया है और यह दर्शाया है कि वैयक्तिकता भी समाज से ही होती है। व्यक्ति समाज से ही लेता है और अपनी अभिव्यक्ति में समाज को ही लौटाता है। इस प्रकार व्यक्तिगत तौर पर गीतों में अभिव्यक्त किये गए बिम्ब ,भाव ,शब्द-चित्र सभी केवल गीतकार की ही स्वानुभूति नहीं बल्कि समाज की भावना की ही प्रस्तुति है।बड़ी अच्छी तरह अपने मंतव्य को प्रकट किया है तथा नवगीत के सम्बन्ध में नवगीतकारों को भी अपने आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है ताकि गीत और नवगीत का भला हो सके। अब इससे आगे प्रस्तुत विमर्श के बिन्दुओं पर आएं और देखें कि विमर्श का मुख्य प्रश्न सरोज जी के साक्षात्कार का वह अंश है जहां वे कहते हैं कि गीत को नुक्सान नवगीत से हुआ है। अतः मेरा निवेदन है कि सौरभ जी विमर्श के उपर्युक्त बिन्दुओं पर भी अपना स्पष्ट अभिमत प्रकट करके समूह को समृद्ध करें ताकि नवगीत और नवगीतकारों पर रहे प्रत्यक्ष और परोक्ष आक्रमण का समुचित जवाब दिया जा सके। - जगदीश पंकज
July 29 at 11:16am · Like · 2

Ramshanker Verma अगर इस दृष्टि से देखें कि गीत को अपदस्थ कर नवगीत उसकी जगह काबिज हुआ तो गीत/गीतकार को तो पीड़ा हुई ही न! पर अगर गीत की संरचना, उसकी लय, संवेदना नवगीत ने आत्मसात की तो गीत अपने नए अवतार में पहले से कहीं अधिक समयसापेक्ष, जनपक्षधर और मुखर है। जादुई रागात्मकता और चमत्कारिकता ताली बजाने पर अवश्य विवश कर सकती है पर इससे नवगीत का भला नहीं होगा। नवगीत '"क्लासिकल संगीत"' नहीं है। वह कुछ अधिक की मांग करता है। संवेदना केवल रोमांटिसिज़्म पर ही निर्भर नहीं है, जीवन और समय की दुर्धर्ष चुनौतियों के गहन पर्यवेक्षण, अनुभूति से जो नवगीत रचे जायेंगे वे मन को अवश्य छुएंगे। यह एक विस्तृत फ़लक है और नवगीतकर सक्षम हैं इस पर कलम चलाने में। हमें थोक के भाव लिखने से भी बचना होगा। "'नई कविता ने उतना नुकसान गीतों का नहीं किया है जितना नवगीतों ने किया है"' यह इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि "'नयी कविता"' के ध्वजवाहक अधिक संगठित हैं, माध्यम सम्पन्न हैं, कटखने हैं। उन्हे छेडना जोखिमभरा है।
July 29 at 12:50pm · Unlike · 6

Saurabh Pandey भाई रामशंकर ने कई तथ्यों को स्पष्ट किया है, जिसकी अपेक्षा जगदीश भाईजी को मुझसे थी. मैं व्यक्तिगत तौर पर इस तरह के वक्तव्यों, कि इस विधा ने उस विधा का ऐसा किया या वैसा किया, पर बहुत ध्यान नहीं देता. कई बार गीतकार नीरज को ग़ज़ल और गीत पर ऐसा बहुत कुछ कहते सुना है जो आज एक तरीके से अप्रासंगिक ही हैं. क्या हर उस कहे पर इसलिए विमर्श हो कि नीरज जैसों का कहा हुआ है ? नहीं. हम सभी उस पर बिना कान-ध्यान दिये, सतत क्रियाशील रहें. हमारा रचनाकर्म और हमारी अपनी विभिन्न विन्दुवत कोशिशें स्वयं ही सटीक उत्तर होती जायेंगीं. ऐसों से अलबत्ता आशीष लेकर आगे बढते रहें.
वस्तुतः इसी कड़ी में आज सरोजजी को पढ़ रहे हैं हम. हम ऐसे कथनों से डाइरेक्ट प्रभावित होने से बचें. क्योंकि नवगीत की क्षमता और उसके समृद्ध विन्यास को कुछ लोग जानबूझ कर नहीं समझना चाह रहे. अन्यथा नवगीत के व्यतीत पचास वर्षों में क्या उन्होंने इस विधा को समझने की चेष्टा नहीं की होगी ? उसके बाद भी यदि किसी वरिष्ठ से ऐसा कुछ अतुकान्त कहते हुए सुनते हैं तो उसकी समझ की सीमा को ही अभिव्यक्त होना समझा जाय, यह अधिक उचित होगा.
इसी कारण मैंने अपनी उपर्युक्त टिप्पणी में नवगीतकारों की उस जमात से ही प्रश्न किया है जो नवगीत के नाम पर अनावश्यक रूप से उपदेशात्मक या संस्मरणात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत करती फिर रही है. या फिर, उथले मानकों का साँचा दे कर अपनी विधाजन्य कमियों को छुपा रही है. नवगीत को सही कहा जाय तो खतरा नहीं बल्कि बचना और सचेत रहना है तो ऐसे अभ्यासियों से.
July 29 at 3:00pm · Like · 2

Saurabh Pandey आश्चर्य नहीं कि कुछ ऐसे-ऐसे विन्दु भी साक्षात्कार में उभरे हैं जिनसे दूर जाना या नवगीतकारों को बचा लेजाना उचित नहीं होगा. किन्तु यह भी सही है कि नवगीतों पर कमलेशजी के प्रश्न और तदनुरूप सरोजजी के उत्तर प्रारम्भिक स्तर के हैं. नवगीत वस्तुतः आज बहुत आगे निकल चुके हैं.

सर्वोपरि, नवगीत को लेकर साक्षात्कारकर्ता कमलेश भट्ट कमल ही संयत नहीं हैं, न उनकी आवश्यक तैयारी दिखती है. तो फिर सरोजजी से उचित उत्तर की अपेक्षा कैसे संभव है ? फिर, सरोजजी ने नवगीत को लेकर जो कुछ अपनी ओर से कहा है, उससे असहज होने या अक्रामक होने या भयभीत होने की ज़रूरत मुझे व्यक्तिगत तौर पर समझ में नहीं आयी. जहाँ वे माँ, बरगद, पीपल, मन्दिर, गाँव आदि-आदि को लेकर कटाक्ष करते हैं, वह पूर्णतया अप्रासंगिक भी है क्या ? क्या नवगीतों की यही दशा नहीं थी ? या, नवगीत के नाम पर यही कुछ बाँचे नहीं जा रहे थे ? लेकिन इधर जो नवगीतों में कथ्यात्मक, बिम्बात्मक, गठनात्मक, रागात्मक परिष्कार हुआ है, उसकी ओर यदि सरोजजी जैसे वरिष्ठों का ध्यान नहीं गया है, या, साक्षात्कारकर्ता के तौर पर कमलेश भट्ट कमल जैसों को जानकारी नहीं है, तो यह नवगीत का विधा के तौर पर कमजोरी का बयान नहीं बन सकता.
July 29 at 8:37pm · Edited · Like · 2

Brijesh Neeraj आश्चर्य कि जटिल होते जीवन और विकास में गुम होती प्रकृति, समाज की तमाम विसंगतियों के बीच भी वे ‘रंग बिरंगे आंचल और गंध लुटाते फूल’ ढूँढ लेते हैं. मुझे लखनऊ में तो कहीं रंग बिरंगा आँचल और गंध लुटाते फूल नज़र नहीं आते. समय बदल गया है कविता चारण भट्टों के कब्जे से और दरबारी परिवेश से बाहर आ चुकी है. रीतिकालीन रागात्मकता कहीं पीछे छूट गई है. खाली पेट माशूक की जुल्फों की कल्पना नहीं हो पाती. कविता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है यथार्थ. जीवन की सच्चाइयों से जो विधा जितनी दूर होगी वह उतनी ही पीछे छूटती जाएगी.
July 29 at 10:51pm · Edited · Like · 3

Brijesh Neeraj राम शंकर वर्मा जी की इस बात पर मुझे आपत्ति है- //"'नयी कविता"' के ध्वजवाहक अधिक संगठित हैं, माध्यम सम्पन्न हैं, कटखने हैं। उन्हे छेडना जोखिम भरा है।// विधाओं को आधार बनाकर इस तरह की टीका टिप्पणी हमें हल्का बनाती है. इससे बचना चाहिए. कोई विधा किसी दूसरी विधा को नुकसान नहीं पहुँचाती बल्कि विधाओं का जन्म काल विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप होता है. समय अपनी अभिव्यक्ति जिस विधा में बेहतर पा जाता है वह बची रह जाती है, दूसरी विधाएँ हाशिए पर चली जाती हैं.
July 29 at 8:26pm · Unlike · 3

सुधीर कुमार राम शंकर वर्मा जी की इस टिप्पणी में आखिर ऐसा क्या है जिस पर आपको आपत्ति है...? मुझे तो लग रहा है कि राम शंकर जी बिलकुल ठीक कह रहे हैं।

००००

सुधीर कुमार
August 11 at 8:42am
श्री बी.एल. गौड़ ने अपनी फेसबुक पर लिखा है कि सभी विधाओं ने ग़ज़ल से हार मान ली है..... और नवगीत आज इधर उधर शरण लेता फिर रहा है..... आखिर क्या कहना चाहते हैं ये महाशय...... नवगीत, गीत का बाप कैसे बन गया है.. ? ...... क्या कोई इस पर प्रकाश डालेगा.....
" साहित्य की सभी विधाओं ने आज ग़ज़ल से लगभग लगभग हार मान ली है । गीत के बाद नवगीत आया और वह भी अपने बाप (गीत ) का बाप बन बैठा । आज उस बाप की ये हालत है कि वह यदा कदा इधर उधर मेरे जैसे लोगों के घरों में शरण लेता फिर रहा है ।"
-बी.एल. गौड़


Jagdish Prasad Jend, Kumar Ravindra, RV Acharya and 4 others like this.

RV Acharya बी एल गौड़ साहब का नजरिया ही वास्तव में नकारात्मक है । वे नवगीत को गीत का बाप बनने की बात कर रहे हैं परन्तु मेरा स्पष्ट मत है कि न तो नवगीत गीत का बेटा था और न ही बाप बना है । वास्तव में गीत और नवगीत अलग अलग विधायें हैं ही नहीं अपितु एक ही हैं अंतर केवल यह आया है कि गीत ने अपना कलेवर बदला है । यह उसी तरह है जैसे पहले धोती कुर्ता पहनने वाला समय के परिवर्तन के साथ अपनी वेशभूषा बदलकर टाई सूट पहन कर आधुनिक बन जाये । नये बिम्ब नये प्रतीक और नये उपमानों के साथ गीत नये तेवर के साथ प्रस्तुत हुआ तो उसके नाम में नवता का वाचक नव उपसर्ग के रूप में उसी तरह जुड़ गया जैसे किसी व्यक्ति के नाम के साथ पं., डाॅ. या प्रो. जुड़ जाता है जो उसकी विशिष्टता को रेखांकित करता है । अब यदि आपको ऐसा लगता है कि वह आपके घर में मूँह छिपाये बैठा है तो यह आपकी शुतुरमुर्गी मुद्रा का ही परिचायक है जो केवल उन्हीं दोयमदर्जे के गीत पढ़ पा रहा है जो बस एक ही लीक पकड़कर चलनेवाले गीतकारों के पिष्टपेशन का परिणाम है । अाज बहुत से गीतकार हैं जो नित नये विषयों पर धारदार गीत लिख रहे हैं । दर असल सदा से यही होता आया है कि जब भी किसी विधा में अमौलिक रचनाकारों की बाढ़ आई है एक नये आंदोलन का जन्म हुआ है और नई धारा प्रवाहित हुई है । पहले गीत के मरने की घोषणा हुई तो अब मुँह छिपाने की बात की जा रही है परन्तु न गीत मरा न मरेगा न मुँह छुपायेगा । मुंह छुपायेंगे वे गीतकार जो चुक जाएंगे । वे ही पलायन कर दूसरी विधाओं की शरण लेंगे और एक दिन वहाँ भी उन्हें मुँह छिपाये फरना पड़ेगा ।
August 11 at 9:30am · Unlike · 7

Kavi Devendra Shukla Safal आचार्य जी , गीत समय के साथ नवता का संवरण करता हुआ अपने अभीष्ट पथ पर सतत अग्रसर है ।गीत, युगीन संचेतना को नवगीत के रूप मेंअपना कर एक विराट स्वरूप दर्शा रहा है ।मैं भी वैचारिक धरातल पर आपसे सहमत हूँ ।साधुवाद।
August 11 at 3:57pm · Unlike · 3

Ved Sharma कुछ मुखर स्वरों का मौन ? क्या अर्थ निकालें रहा नवगीत किसी के कहने सुनने से वह नही मरेगा ऐसा होता तो सब कुछ बहुत सुगम होता ....बाकी परमात्मा सबको स्द्बुधि दे
August 12 at 10:03pm · Like · 1

Jagdish Vyom विधाओं की आपस में कोई लड़ाई नहीं होती है इसलिए किसी विधा का किसी विधा से हार मान लेने जैसी बात एक अगम्भीर टिप्पणी है.... नवगीत का क्षेत्र बहुत व्यापक है और प्रभावक भी..... मुझे तो लगता है कि यह नवगीत को न समझ पाने वाले एक रचनाकार का स्वकथन है.... इसका संज्ञान लेने की कोई खास आवश्यकता भी नहीं है..... नवगीत को समझने के लिए कम से कम अच्छे नवगीतों को खोजकर पढ़ना तो होगा ही.....
August 13 at 5:45am · Like · 1

Jagdish Prasad Jend मैंने श्री बी.एल. गौड़ के पोस्ट पर इसके बारे में आपत्ति उठायी थी जिसके उत्तर में उन्होंने कहा है कि उनका आशय तो यह है कि गीत कम लिखे जा रहे हैं। उन टिप्पणियों को मैं नीचे दे रहा हूँ। जगदीश व्योम जी का कथन सही है कि इसका संज्ञान लेने की कोई खास आवश्यकता भी नहीं है।
'' Jagdish Prasad Jend परम आदरणीय श्री गौड जी, आपने अपने दोहों को प्रस्तुत करते हुए जो प्राक्कथन रूप में पंक्तियाँ लिखी हैं, वे आपके सृजन और सोच की दशा को प्रकट करती हैं। किन्तु इनका साधारणीकरण सम्पूर्ण समकालीन सर्जनात्मकता पर प्रश्न-चिन्ह लगा रहा है। मेरा विनम्र निवेदन है कि अपनी धारणा पर पुनर्विचार करने का कष्ट करें तथा गीत /नवगीत /ग़ज़ल या मुक्तछंद /छंदमुक्त कविता पर उसके बाद अपनी उद्घोषणात्मक तार्किक टिप्पणी करें तो ज्यादा उचित होगा। आशा है मेरी टिप्पणी को सकारात्मक रूप में ग्रहण करेंगे। आदरणीय अग्रज धनञ्जय सिंह जी ने भी इस पटल पर अपनी टिप्पणी की है ,क्या वे भी गौड़ जी की अवधारणा से सहमत हैं ?यदि वे अपने विचार प्रकट करेंगे तो अन्य अनेक लोगों को लाभ होगा। -जगदीश पंकज
Like · Reply · August 11 at 6:15pm

Vijyant Singh वाह बहुत सुन्दर
Like · Reply · 1 · August 11 at 6:53pm

Banwari Lal Gaur Bhai jagdish pd. Jend ! Mera ashay to kewal itna tha ki geet kam likha ja raha hai .
Like · Reply · August 11 at 7:30pm ''
August 13 at 12:35pm · Like

Bhartendu Mishra व्योम जी आप से पहले भी निवेदन किया था कि ये विमर्श का मंच है अत: जो लोग पर्दे मे हैं अर्थात जिनका चेहरा भी नही दिखाई देता।जिनके साहित्यिक खासकर नवगीत संबन्धी कार्य आदि के बारे मे बहुत कम लोग जानते हैं(कम से कम मै) ..उनकी पहचान उजागर करना भी आपका ही दायित्व है क्योकि विमर्श मे असली और नकली पहचान का बडा गंभीर अर्थ होता है।यदि आदरणीय सुधीर जी की पोस्ट आप एप्रूव करते हैं तो हमारा यह अधिकार है कि सुधीर जी कहीं मंचीय कविता के समर्थक तो नही हैं यह भी देखना चाहिए यह आप भी स्पष्ट कर सकते हैं। उनकी पिछली टिप्पणियों से मेरे मन मे भ्रम की स्थिति बनी है ।..माने उनके काम के बारे मे भी आप जानकारी दें तो अधिक उपयुक्त रहेगा।
August 13 at 6:34pm · Unlike · 1

Jagdish Vyom जी हाँ डा० भारतेन्दु जी, मैंने उन्हें सन्देश दे दिया है कि अपना फोटो लगायें ..... बिना फोटो लगे सदस्यों को समूह से हटा दिया जायेगा.....
August 13 at 6:39pm · Like · 1

Bhartendu Mishra ऐसे तो ये नवगीत विमर्श की जगह कुछ और हो जाएगा।आपका भगीरथ प्रयास निरर्थक हो जाएगा।
August 13 at 6:41pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra व्योम जी ये जो आर.वी.आचार्य जी कह रहे हैं जरा उनसे पूछिए कि दशरथ और राम मे ,वसुदेव और कृष्ण में या फिर छायावाद के समय और इक्कीसवीं सदी की रचनाशीलता मे कोई फर्क वो मानते हैं कि नही ?.नवगीत दशको और व्यापक नवगीत आन्दोलन के बारे मे जानते हैं या नहीं......ये लगातार गीत और नवगीत को एक ही साबित करने की चेष्टा करना कहां तक उचित है ?..यदि गीत और नवगीत के अंतर को नकारना ही ध्येय है तो अलग बात है अंतर न समझ पाना दूसरी बात है।..इसके लिए सतर्क प्रमाण भी देने चाहिए।
August 13 at 11:25pm · Unlike · 4

Jagdish Vyom आचार्य जी ने आपकी टिप्पणी पढ़ ली होगी..... उनसे टिप्पणी की अपेक्षा है
August 15 at 6:52pm · Like · 1

RV Acharya श्रद्धेय भारतेन्दु मिश्र जी सादर अभिवादन । अभी आपकी एवं श्रद्धेय व्योम जी की पोस्ट पढ़ी । मैं निवेदन करना चाहूँगा कि मैंने अपनी पोस्ट में लिखा था कि वास्तव में गीत और नवगीत अलग अलग विधायें हैं ही नहीं अपितु एक ही हैं । अंतर कवल यह आया है कि गीत ने अपना कलेवर बदला है ।...... नये बिम्ब, नये प्रतीक और नये उपमानों के साथ गीत नये तेवर के साथ प्रस्तुत हुआ तो उसके नाम में नवता का वाचक नव उपसर्ग उसी तरह जुड़ गया जैसे किसी व्यक्ति के नाम के साथ. पं. , डा. या प्रो. जुड़ जाता है जो उसकी विशिष्टता को रेखांकित. करता है । मेरे इस विवेचन से स्पष्ट है कि मैं नवगीत को पारंपरिक गीत से विशिष्ट कह रहा हूँ, कारण कि उसका कलेवर बदला है अर्थात कथ्य भिन्न है, नये बिम्ब नये प्रतीक और नये उपमान हैं और साथ ही तेवर भी नया है । जहाँ तक एक विधा होने की बात है तो गीत और नवगीत में लयात्मकता, छंदानुशासन, गति और यति आदि शिल्पगत समानता होने से मेरी दृष्टि में मूलतः दोनों की विधा एक है । साहित्य की अन्य विधायें निबंध, कहानी नाटक, आदि की प्रकृति भिन्न होने से वे पृथक विधायें मानी जाती हैं । मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ विपरीत बात कही है । यदि आप नवगीत को गीत का पुत्र मानते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं परन्तु मैं अपनी अल्पबुद्धि से इतना समझता हूँ कि पुत्र पुत्री या संततिभाव जीवधारियों में तो उचित है परन्तु ज्ञान संबंधी विषयों में इसे परंपरा कहना उचित होगा जो सरित प्रवाह के समान निरंतर परिवर्तित होते हुए भी उसकी एक ही संज्ञा होती है । आशा है आप इस संबंध. में मेरा मार्गदर्शन कर अनुग्रहीत करेंगे ।
उत्तरापेक्षी - डा. राम वल्लभ आचार्य
August 15 at 11:03pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra आदरणीय हमे साफ तौर पर आपका तर्क चाहिए कि हम आधुनिक यथार्य की अभिव्यक्ति देने वाले समकालीन नवगीत को गीत ही क्यो माने नवगीत कहने मे क्या कष्ट है? टिप्पणी नहीं साफ साफ तर्क देने चाहिए।और ये भी साबित करना चाहिए कि शंभुनाथ सिंह,वीरेन्द्र मिश्र,रमेश रंजक,ठाकुर प्रसाद सिह,उमाकांत मालवीय,शिवबहादुर सिंह भदौरिया , देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,माहेश्वर तिवारी,डा.राजेन्द्र गौतम जैसे अनेक गीतकारो ने एक साथ मिलकर जब नवगीत आन्दोलन को स्थापित किया था।तो क्या वह व्यर्थ की कवायत थी?नवगीत कोई विधा नही है।यह सही है।वह तो मंचीय गीत और ब्लैंकवर्स दोनो के विरुद्ध आन्दोलन के रूप मे खडा हुआ था।..अब कुह्ह लोग चाहते हैं..कि उसे(नवगीत को) फिर से गीत ही मान लिया जाये ?.ताकि--.जिसमे--- जलाओ दिये पर रहेध्यान इतना.. (नीरज) चाहे हवन का हो(रमानाथ अवस्थी)या फिर आधुनिक तम--कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है(कुमार विश्वास)जैसे कवियो को भी सार्थक गीतकार मान कर विमर्श मे शामिल कर लिया जाये।जो लोग उत्सवो, पर्वो के लिए कविसम्मेलनी गीत लिख रहे है उसे नवगीत मे शामिल कैसे किया जा सकता है।
August 15 at 11:23pm · Unlike · 1

RV Acharya अादरणीय मैंने नवगीत को गीत कहने का आग्रह किया ही नहीं है । नवगीत. नवगीत ही है क्योंकि वह परंपरागत गीत से विशिष्ट है । मेरी प्रथम टिप्पणी में ही लिखा है कि जब भी किसी विधा में अमौलिक रचनाकारों की बाढ आई है एक नये आन्दोलन का जन्म हुआ है और एक नई धारा प्रवाहित हुई है ।" क्या गीत की यह नई धारा ही नवगीत नहीं है । जो मैंने नहीं कहा वह आप मेरे मुँह से कहा मानकर मुझे क्यों नवगीत के विरुद्ध सिद्ध करना चाहते हैं, यह मेरी समझ से बाहर है । आपकी विद्वत्ता में मुझे कोई संदेह नहीं । आप अपनी बात कहें कि आप बी. एल. गौड़ जी की पोस्टपर क्या कहना चाहते हैं? मैं नहीं समझता कि इस संबंध में मुझे आगे कोई स्पष्टीकरण देने की जरूरत है ।
August 15 at 11:58pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra वो मै संकेतो मे कह चुका हूं,आदरणीय उनकी पोस्ट के बारे मे यही कहा जा सकता है कि उन्हे नवगीत के बारे मे जानकारी ही नही है।आप तो अपनी राय दें। असल मे भ्र्म तो इस बात से भी उत्पन्न होता है।कि बी.एल.गौड साहब को लोग विमर्शकार मानने लगे हैं।मेरी नजर मे वे कवि हैं और एक अखबार के प्रबन्धक हैं/निकालते हैं.अच्छे संपन्न व्यक्ति हैं.हमारे व्यक्तिगत परिचित भी है आदि आदि किंतु वे नवगीत के विमर्शकार हैं यह मै नही जानता हूं।उनकी आलोचना की कोई किताब भी मैने नही पढी फिर उनकी किसी पोस्ट पर क्या कहा जाये? सुधीर नामक कोई अत्यल्प ग्यात आचार्य की टिप्पणी पता भी नही है कि वो सही है या नही उनकी ये टिप्पणी कहां छपी है ?..व्योम जी को मालूम होगा कि ये ..कौन सज्जन हैं क्या चाहते हैं...
August 16 at 12:16am · Unlike · 1

Santosh Kumar Singh व्योम जी गीत और नवगीत में क्या विशेष अन्तर होता है कुछ
प्रकाश डालें तो हम जैसे भी नवगीत ज्ञान समझ लें. अपेक्षा
August 16 at 7:03am · Unlike · 1

RV Acharya यद्यपि मैं अपनी बात कह चुका हूँ तथापि आदरणीय मिश्र जी को मैं नवगीत के पुरोधा श्रद्धेय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी की यह उक्ति स्मरण कराना चाहूँगा - "हर नवगीत गीत होता है परंतु हर गीत नवगीत नहीं ।" यदि मैं उन्ही की बात को कह रहा हूँ तो फिर भ्रम कहाँ है ?
August 16 at 9:10am · Unlike · 1

Jagdish Vyom नवगीत विमर्श पर बहुत सारे सदस्य है जो सहज रूप में नवगीत को समझना चाहते हैं..... हिन्दी की अन्यान्य विधाओं की तरह नवगीत भी एक विधा है... हमें सभी का आदर करना है और हिन्दी भाषा और साहित्य को समृद्ध करना है.... हम यह भी चाहते हैं कि नये रचनाकार नवगीत को समझ सकें इस हेतु सहजता के साथ सरल भाषा में गीत और नवगीत का अन्तर स्पष्ट हो...., हम नवगीत को लोकप्रिय बनाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं और आप सभी से यही अनुरोध है कि इस दिशा में सहयोग करें.........
August 16 at 10:43am · Edited · Like · 1

Bhartendu Mishra आचार्य जी ,यह जो सूक्ति आप इन्द्र जी के नाम से उद्धृत कर रहे हैं मुझे नही मालूम कि आदरणीय इन्द्र जी ने कब किस प्रसंग मे लिखी है लेकिन मैने 2001 मे -गीत नवगीत का फर्क -शीर्षक आलेख मे लिखी थी। फिर समांतर (म.प्र.)में वह आलेख राष्ट्रीय� सहारा तथा गीताभ के अंक आदि मे बाद भी प्रकाशित हुआ था।2013 मे प्रकाशित मेरी पुस्तक मे भी पृ.26 पर ये वाक्य मिल जायेगा.इसकी पुष्टि भी करें।
August 16 at 11:10am · Edited · Unlike · 1

RV Acharya यदि यह उक्ति इन्द्र जी की नहीं आपकी है तो फिर अापकी उक्ति से मेरे कथन की पुष्टि होती है । अाभार!
August 16 at 12:34pm · Like

Bhartendu Mishra जी आप जब गीत और नवगीत को एक मानेगे तब समस्या होगी जो कि वे कतई नही हैं..वैचारिक रूप से दोनो मे भेद है आकार की दृष्टि दोनो एक जैसे दिखते हैं किंतु गेयता वहां अनिवार्य नही हैं।जब हम पाठ्य पर चर्चा करते हैं तब युगानुकूल नवता पर ध्यान देते हैं।इस रूप मे वह अलग विधा भी नही है। हां यदि मंचीय गीत और नवगीत को अलग करने लिए व्योम जी उसे अलग विधा कह रहे हैं तो कोई आपत्ति नही है।
August 16 at 12:50pm · Unlike · 3

Saurabh Pandey मैं भी इस मंतव्य का हामी हूँ कि किसी-कोई’ के किसी कथ्य को लेकर विमर्श न करें. जो जिस विधा को जानता ही नहीं या न जानने का दुराग्रही है उसके कुछ कहे पर परेशान क्यों हुआ जाये ?
August 18 at 10:41am · Like

Om Prakash Tiwari वाकई, इतने विश्वास से कोई स्थापना देने वाले सुधीर कुमार जी का पूरा परिचय जानने की उत्सुकता बढ़ गई है
August 18 at 3:59pm · Like

Om Prakash Tiwari क्षमा करें, गौड़ जी के बारे में
August 18 at 4:01pm · Like
०००००


Bhartendu Mishra
August 18 at 7:36am
मंच के प्रपंच से नवगीत को कैसे बचाया जाये ?कवि सम्मेलन अब कपि सम्मेलन हो चुके हैं।..वहां जनता से तालियो के लिए आशीर्वाद मांगते हुए दो चार मिनट तक चुटकुले फिर सुकंठी स्वरालाप होता है।..अपने गुट के चहेते कवि को एक लाइन पढते ही वाह वाह कह कर उठा लेते हैं।कोई ताली बजाता है कोई माला पहनाने दौडता है कोई खडा होकर डांस करने लगता है...कोई नजाकत से हाथ पैर चलाकर नौटंकी करने लगता है।कोई सीटी बजाने लगता है ...और दुहरे बेहूदे अर्थवाली पंक्तियो पढ कर कवि स्वयं को धन्य मानने लगता है।...हां इस उत्सवधर्मी आयोजन का हिस्सा बनने मे पैसा है ....भोग की अंन्य वस्तुए भी सहज मिल सकती हैं...लेकिन ये पर्फार्मिंग गीत/गजल का फार्म अलग है जिसका विमर्श से कुछ लेना देना नही है। साहित्यिक विमर्श ऐसे गीतकारो को लेकर नही किया जा सकता। क्योकि ऐसे लोग अपने ही शब्दो/पंक्तियो को लेकर समाज और अंतिमजन के प्रति प्रतिबद्ध नही होते।उनका उद्देश्य केवल तफरी करना होता है।

ता पंडित, Pradeep Shukla, Ramakant Yadav and 20 others like this.

RV Acharya एक एक बात सही है । मैं सहमत हूँ ।
August 18 at 10:07am · Unlike · 2

Shailendra Sharma बिल्कुल सही कहा आपने
August 18 at 10:09am · Unlike · 3

Ravindra Garg लगता है आप भूल चुके हैं अब सच बोलना मना है
August 18 at 1:37pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra रवीन्द्र गर्ग जी जिस साहित्यिक विधा का उद्देश्य केवल तफरी लेना हो गया हो उसे नष्ट हो जाना चाहिए।..केवल तफरी लेना/मौजकरना भर साहित्य का उद्देश्य नही है।...मेरी चिंता यही है कि हमारी नयी पीढी नवगीत को मंचीय कविता का पर्याय मानने लगी है उसके पास कविता नही है लेकिन सेटिंग मे अपने को खपाये दे रही है।उसे कैसे समझाया जाये।..
August 18 at 7:37pm · Unlike · 3

Saurabh Pandey //केवल तफरी लेना/मौजकरना भर साहित्य का उद्देश्य नही है //
बहुत सही ..
August 18 at 8:28pm · Edited · Unlike · 1

Jairam Jay manch par chhane lage hai chutukule /kaun todega ye pathreele kile???
August 19 at 5:29am · Edited · Unlike · 1

Jagdish Vyom भारतेन्दु जी की चिन्ता सही है, जिनके पास कविता नहीं है अधिकतर वही मंच पर हैं और नवगीत मंच से दूर है ऐसे में नयी पीढ़ी तो मंचीय कविता को ही नवगीत का पर्याय मानेगी.... क्या नवगीत को मंच पर नही जाना चाहिए...... इस दिशा में गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है.....
August 19 at 5:42am · Like · 1

Bhartendu Mishra शंभुनाथ सिंह जी ने प्रारंभ में नवगीत दशको मे केवल उन्ही को शामिल किया था जो कविसम्मेलन मे नही जाते थे। जो उपनाम नही लगाते थे।...मंच पर जाने वाली कविता क्षणिक बिकाऊ और कभी कभी तो कविता होती ही नही है।यदि नवगीतकार मंच की ओर हसरत भरी नजरो से देख रहा है तो उसकी रचनाशीलता चिंता का कारण है।
August 19 at 7:55am · Unlike · 1

Shailendra Sharma मैं भारतेन्दु जी की बात से किसी हद तक सहमत हूँ. मैने कई अच्छे गीतकारों को मंच से जुड़ कर पूरी तरह मंचीय होते देखा है .इसके पीछे कारण तालियों की गड़गड़lहट /वाहवाही और साथ में मिलने वाला लिफाफा है. अपवाद स्वरूप ब-मुश्किल कुछ ही लोग मिलेंगे जिन्हों ने मंच से समझौता न किया हो. प्रारंभ में लोग दोनों नावों में पैर रखते हैं किन्तु कुछ सफलता मिलते ही पूरी तरह मंचीय हो जाते हैं.
August 19 at 8:10am · Unlike · 1

Jagdish Vyom नवगीत के लोग मंच पर नहीं जायेंगे, नवगीत की स्तरीय पत्रिकाएँ न के बराबर होंगी, नवगीत के स्वयंभू सम्पादक अपने सम्पादित संकलनों में खुद को और अपने खेमे के रचनाकारों को प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में पूरी शक्ति लगाते रहेंगे, नवगीत के लोग साहित्य अकादमियों में नहीं होंगे, नवगीत के लोग हिन्दी की बड़ी पत्रिकाओं के सम्पादक नहीं होंगे, नवगीत के लोग एन सी ई आर टी, एस सी आर टी तथा अन्य पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाली समितियों में नहीं होंगे..... तो फिर आखिर नवगीत लोगों तक पहुँचेगा कैसे ? और जब लोगों तक पहुँचेगा ही नहीं तो लोकप्रिय कैसे होगा....
August 19 at 8:18am · Like · 5

Bhartendu Mishra व्योम जी नवगीत शब्द निराला के नवगति नव लय ताल छ्न्द नव...की कल्पना से निकला है।वो निराला जिन्होने पंत जी की अनेक प्रार्थनाओ के बावजूद एक पंक्ति भी आकाशवाणी के लिए टेप नही करायी और कहते रहे मेरी कविताएं बिकाऊ नही हैं।..उस नवगीत को खाये पिये अघाये लोगो के मंचो पर तफरी की चीज बना देना चाहते हैं।..पैसे के लिए बाजारू बना दिया जाये ?.उसे मंच के मस्खरो के सामने ले जाना चाहते हैं..ठीक है यदि यही चाहते हैं तो फिर विमर्श क्यो हो ?साहित्यिक विमर्श आम आदमी /सर्वहारा की चिंता से उपजता है।मारवाडी श्रोताओ की प्रशस्ति का मुखापेक्षी नही होता।
August 19 at 8:33am · Like

Shailendra Sharma आ.व्योम जी ,इसके लिये नवगीतकारों को ही एकजुट हो कर पूरी निष्ठा से कार्य करना होगा. स्वयं ऐसेमंचो के निर्माण में जुटना होगा जो नवगीत को आगे बढाने में योगदान दे ,सकें.
बगैर आमजन के जुड़lव के
हमारा सपना पूरा हो सकेगा,मुझे संदेह है .मेरा अपना मानना है कि अच्छे श्रोताओं की कमी नही रहेगी.
यदि मंच साहित्यिक सामग्री उपलब्ध करा सके. आमश्रोता का दोष नही है वह तो वही सुनने को विवश है जो उसे परोसा जा रहा है.भरे पूरे पेट वालों की बात दीगर हैं. उनके बारे में हम क्यों चिंतित हों . वे चुटकुले /मुजरे जो सुनना चाहें शौक से सुनें .
August 19 at 8:52am · Edited · Unlike · 3

Jagdish Vyom भारतेन्दु जी, मेरी टिप्पणी कृपया फिर से देखें... नवगीत को बाजारू बनाने की बात नहीं कही गयी है.... इस पर विचार करना है कि नवगीत जब इन सभी जगहों पर नहीं होगा तो फिर वह लोकप्रिय कैसे होगा ? ..... इसके लिए कुछ तो करना होगा..... और वह क्या करना होगा..... इसी बिन्दु पर सभी को सामूहिक रूप से सोचना होगा..... नवगीत से जुड़े अन्य लोगों के विचारों की भी प्रतीक्षा है .......
August 19 at 9:03am · Edited · Like · 1

Bhartendu Mishra नवगीत का संगठन बनाइए।..नवगीत पाठ आयोजित कीजिए।एकल नवगीत पाठ काराइए..।चुने हुए लोगो के बीच।
August 19 at 9:06am · Unlike · 3

Shailendra Sharma जी , भारतेन्दु जी , मैं आपकी बात से सहमत हूँ.
August 19 at 9:36am · Like

पूर्णिमा वर्मन मेरे विचार से स्तरीय नवगीत से आम जन को जोड़ना आवश्यक है। नवगीत को स्तर गिराने या बाजारू होने की जरूरत नहीं है, जरूरत है सुनने वालों के स्तर को ऊँचा उठाने की... नवगीत को मीडिया के विभिन्न आयामों के साथ जोड़कर प्रबुद्ध श्रोताओं, पाठको, दर्शकों को उससे जोड़ना ताकि यह जन जन की आवाज बन सके और कविता की मुख्य धारा में आ सके... पाठ्यक्रम का हिस्सा बन सके... ताकि नई कविता के साथ-साथ नवगीत की धारा को भी मान्यता मिल सके।
August 20 at 10:35pm · Edited · Unlike · 7

Saurabh Pandey इस परिचर्चा के क्रम में कुछ महत्त्वपूर्ण विन्दु सामने आये हैं, जिनपर अभी और समय तथा सोच देने की आवश्यकता है.
नवगीत या कुछ हद तक स्तरीय गीत पाठक-श्रोता से दूर हुए, साथ ही, आमजन के लिए अबूझ बने हैं तो कारण गीतकारों-नवगीतकारों की मंच या आमजन से स्वयं ही बना ली गयी दूरी भी उतना ही दोषी है. जब हम खाली जगह बना कर ’दो कौड़ियों’ को उपहार में दे देंगे तो उस पर ’दो कौड़िये’ ही जगह बनायेंगे. फिर, हम कैसे मंच की ’स्थिति’ पर कुछ कहने के अधिकारी होंगे ?
दूसरी बात, कि हम क्यों पूर्वाग्रह पालें कि जो नवगीतकार मंच पर जाते हैं या जायेंगे वे उसी रंग में रंग जायेंगे ? तथा उनमें घटिया होने की होड़ लग जायेगी ? यह अवश्य है कि पठनीय तथा श्रवणीय रचनाओं में अन्तर होता है. यह नवगीत के साथ भी होगा. लाजिमी है. लेकिन क्या ऐसा हर विधा की रचना के साथ नहीं होता ? वैसे, नवगीत का ढंग तो अधिक जन-मनस के करीब और रोचक है. उसे बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने का हम क्यों न अभ्यास करें ? नवगीतकारों द्वारा मुख्य धारा से बना ली गयी दूरी में नुकसान नवगीत का ही होगा. हमें मंच पर जाने वाले नवगीतकारों के प्रति संशय न पाल कर उनकी प्रस्तुतियों और उनके प्रस्तुतीकरण पर ध्यान देना चहिये. फिर, एकल पाठ हो या सम्मेलन पाठ, यदि इसका सार्थक क्रियान्वयन एवं आयोजन हो तो संस्कारित करने का महती कार्य हो सकता है.
कुछ प्रिण्ट पत्रिकाओं में मैं नवगीत-संग्रहों (मात्र नवगीत या गीत या गेय रचनाओं के संग्रह) पर समीक्षाएँ दे रहा हूँ. शुरुआत हो भी गयी है. प्रतिसाद बहुत ही उत्साहवर्द्धक है. उन प्रिण्ट पत्रिकाओं ने स्वीकार कर लिया है कि ये समीक्षाएँ हर अंक में आयेंगीं. मेरे इस इनिशियेटिव का मुख्य कारण यह है कि नवगीत पर वे समीक्षक या उनके अनुयायी क्या लिखेंगे, जिन्होंने रचनाओं में गेयता या मात्रिकता को ही अप्रासंगिक बता दिया था, या गीत के मर जाने की घोषणा कर दी थी ?
मेरा कहने का तत्पर्य यह है कि महाप्राण निराला की विशिष्ट सोच प्रणम्य है. लेकिन हमें किसी एक उदाहरण को अपना मंतव्य नहीं बनाना चाहिये. और हम कुछ एकसोची तथा आग्रही लोग यदि संयत कदम बढ़ायें तो आजके रचनाकारों को नवगीत के गुणों से संस्कारित् कर सकते हैं.
August 19 at 12:32pm · Like · 1

K.k. Bhasin मुझे जगदीश व्योम जी के विचारों से सहमति है ! आख़िर हम अच्छे साहित्य संरचना की चर्चा कर रहे हैं या हुकुमनामें जारी कर रहे हैं ! मेट के माध्यम से अच्छा साहित्य यदि जनता तक पहुँचता है और वह पसंद किया जाता है तो ग़लत क्या है ! वाहवाही या उन्हें लिफ़ाफ़े मिलते हैं तो ग़लत क्या है? हम अच्छे साहित्य या नवगीत की पैरवी तो कर सकते हैं मार्शल लाँ लगाने की इजाज़त क्यों चाहते हैं? मंच पर चुटकुले चलते हैं, समितियों में ये नहीं होना चाहिये, लिफ़ाफ़े की चिन्ता , क्यों ? हम केवल अच्छे लेखन की पैरवी करें ! उसे स्थापित करें ! उसे प्रोत्साहित करें ! अगर इसे लक्ष्य बनाये तो भला होगा !
August 19 at 1:18pm · Like · 1

Bhartendu Mishra मेरा निवेदन है कि यदि नवगीत को आप सब मंचीय ही बनाना चाहते हैं तो फिर पाठ्यक्रम मे भी शामिल होने की बात पत्रिकाओ मे शामिल किए जीने की बात और विमर्श की बात भूल जाइए।रही मंच और और लिफाफा पकडने की बात और साहित्य जगत मे सबसे तालिया पिटवा लेने की बात उसके लिए जुगाढ बनाइए।जोमंच दिलवा सके उसके घर बाहर चक्कर लगाइए।सन्योजको को पार्टी दीजिए/सेवा कीजिए/ओबलाइज कीजिए कि आप पर भी कृपा करें।..मैने देखा है लालकिले की कविसम्मेलन की सूची मे किस जतन से लोग शामिल होते हैं।पत्रिका मे छपने के लिए क्या करते हैं पुरस्कार लेने के लिए किस जतन से घुटने मोडकर बैठते हैं।..बस इतना कीजिए कि उसे गीत ही मान लीजिए .क्योकि मंच की काजल की कोठरी से बाहर निकलने पर नवगीत का बचना असंभव है।...भली करेंगे राम। कमसे कम निराला जी के सपनो को जिन्दा रखने के लिए इस मंचीयता के लोभ को नवगीत कहना बन्द करें।..नवगीत का इतिहास पढकर देखें....।
August 19 at 7:18pm · Like

Saurabh Pandey //यदि नवगीत को आप सब मंचीय ही बनाना चाहते हैं तो फिर पाठ्यक्रम मे भी शामिल होने की बात पत्रिकाओ मे शामिल किए जीने की बात और विमर्श की बात भूल जाइए//
उपर्युक्त पंक्ति और इसके आगे की पंक्तियाँ उन रीढ़हीनों केलिए सही है जिनके लिए साहित्य भौतिक ’कुछ’ प्राप्ति का ज़रीया है. ऐसे लिजलिजे इन्सान तो हर तरह की विधा और क्षेत्र में हैं. हमें तो यह सोचना चाहिये कि दृढ़ मनस और दूरगामी सोच के साथ हम कैसे नवगीत विधा को विस्तार दें, व्यापक बनायें. इसके लिए यदि कोई विन्दु साझा करना उचित है तो वह साझा करें. अन्यथा मंच को गरिमा मंच से भागने से नहीं मिलने वाली है. इससे तो हम ही एक समय बाद हाशिये पर चले जायेंगे. या कुछ ’मनमौजी जानकारों’ का समूह बन कर रह जायेंगे. सम्मेलनों में येन-केन-प्रकारेण अपनी जुगत भिड़ा लेना और जगह बना लेना एक बात है. आमंत्रित होकर अपनी प्रस्तुति को साधिकाररखना दूसरी बात. मैं दूसरी बात का पक्षधर हूँ. पत्र-पुष्प या लिफ़ाफ़ा के पीछे भागना या पुरस्कारों के लिए किसी स्तर तक निहुर जाना घृणित है.

चार दिनों पहले मेरे पास आये एक पत्र का मैं ज़िक्र करना प्रासंगिक समझता हूँ. एक संस्था हैै, ’अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान’. इसका केन्द्र इलाहाबाद, लखनऊ, देहरादून, नाहन, हैदराबाद, अहमदनगर बताया गया है. इसके सदस्यों और आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में बहुत-बहुत बड़े प्रणम्य नाम सूचीबद्ध हैं. इस संस्था के उक्त पत्र ने मुझे पुरस्कृत करने की सूचना दी. फोन किया तो बताया गया कि उसके पूर्व मुझे स्वयं को रजिस्टर्ड कराना होगा और उसकी निर्धारित रकम है. मैंने कड़े शब्दों में, यही कि मुझे ’पुरस्कार’ नहीं खरीदना, मना कर दिया. लेकिन जिन साहित्यकारों को इस संस्था ने पुरस्कृत किया है, उनके प्रति मेरे मन में अब यही भाव बन रहा हैैं कि उन ’विद्वान’ साहित्यकारों ने मना क्यों नहीं किया था ? या ऐसे पुरस्कारों की क्या महत्ता ? यदि नहीं तो ऐसे कौन लोग हैं जो ऐसे संस्थाओं को जिला रहे हैं ? लेकिन, यदि सात्विक या सही संस्थाओं या गोष्ठियों में मैं यदि बुलाया गया, लिफ़ाफ़ा छोड़िये आने-जाने का खर्च मुझे ही करना पड़े, तो क्या मुझे नहीं जाना चाहिये कि अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान जैसी संस्थाएँ सम्मेलन और पुरस्कार का खेल खेल रही हैं ?
August 19 at 8:09pm · Edited · Like

Bhartendu Mishra जी आप दोनो नावों पर खडे नही रह सकते...आप किसान सम्मेलनो मे/विद्यालयो मे /साहित्यिक सस्थाओं /अन्य सामाजिक महत्व की संगोष्ठियों मे नवगीत पढिए जहां प्रबुद्ध श्रोता हो नवगीत का महत्व बनेगा लेकिन ऐसा हो कहां रहा है ? पैसे की चिंता कौन नही करता है ? कीजिए..मनुष्य ,साहित्य और विचार प्रमुख हो तभी कुछ बात बन सकती है लेकिन मेरे एक परिचित है जिन्होने बताया--कि उन्हे एक कविसम्मेलन मे 5000/मिल रहे थे तो उसके लिए एक अत्यंत साहित्यिक महत्व का कार्यक्रम उन्होने छोड दिया।य्ह कार्यक्रम मजदूर दिवस पर जनता /मजदूरो के बीच कविता पाठ का था यहां केवल सांकेतिक मार्गव्यय था। ..पैसे के सामने नवगीतकार कितने नैतिक बने रह सकते हैं ?..जरा और गंभीर होकर सोचिए...
August 19 at 8:12pm · Unlike · 1

Saurabh Pandey तो ऐसे में क्या हम अपनी तपस्या रोक दें कि अगले अधिकतर बह जाते हैं ? फिर, नवगीत विधा का तथाकथित रचनाकार यदि ऐसा कुछ कर ही रहा है तो क्या हमआप उसकी रचना को नवगीत होने से ख़ारिज़ करेंगे ? फिर, आदरणीय, एक प्रश्न और उठता है कि नवगीत मानकों और मूलभूत विन्दुओं पर मान्य होगा या रचनाकार के आचरण पर ? और अच्छे नवगीतों की बिना पर कोई नवगीतकार ’ठीक-ठाक’ पत्र-पुष्प प्राप्त करता है तो यह उस रचनाकार की व्यक्तिगत हेठाई हुई या उसकी रचना की ताकत हुई ?
August 19 at 8:19pm · Unlike · 1

Saurabh Pandey //आप किसान सम्मेलनो मे/विद्यालयो मे /साहित्यिक सस्थाओं /अन्य सामाजिक महत्व की संगोष्ठियों मे नवगीत पढिए जहां प्रबुद्ध श्रोता हो नवगीत का महत्व बनेगा लेकिन ऐसा हो कहां रहा है ? //

मैं तो वस्तुतः ऐसे ही माहौल की बात कर रहा हूँ. परन्तु, यह भी सही है कि इसके आगे का रास्ता तथाकथित सम्मेलन ही हैं. या हो जाते हैं. तो क्या फिर हम विलग हो जायें ?
August 19 at 8:23pm · Edited · Unlike · 2

Bhartendu Mishra जी सौरभ जी जो पैसे के पीछे भाग रहे हैं उनकी प्रतिबद्धता रचना के साथ हो सकती है क्या ?....नवगीत छन्दोबद्ध कविता की प्रतिबद्ध धारा का नाम है। जो जनता को आन्दोलित भी कर सकती है।
August 19 at 8:27pm · Unlike · 2

K.k. Bhasin बहस की मूलभूत अवधारणा अच्छे साहित्य के लिए श्रोताओं में जागरूकता पैदा करना है न कि कट्टरपंथी सोच पैदा करना कि या
नवगीत का झंडी उठाएँ वरना बिरादरी से बाहर हो जाँए ! कोशिश यह हो कि श्रोताओं में अच्छा और श्रेष्ठ साहित्य पहुँचे ताकि अच्छे लेखन को सुनने की उनमें ललक पैदा हो ! यह समझ से परे बात जा रही है कि लिफ़ाफ़े की पीड़ा क्यों उभर कर आ जाती है ! महोदय अच्छी रचना प्रबुद्ध गोष्ठी में पढ़ी सुनी जाए या मंच पर उसे श्रोताओं को प्रभावित करने की ऊर्जा होनी चाहिए ! लिफ़ाफ़े मिलना न मिलना ,लेना न लेना कवि के ऊपर छोड़िए ! ध्यान रहे कट्टरपंथी ज़्यादा जेल नहीं टिकते !
August 19 at 9:16pm · Like

Ranjana Gupta नवगीत लोकप्रिय हो इसके लिए नवगीतों की अच्छी पत्रिकायें आनी बहुत अधिक आवश्यक है,पर मंचीय पाठ मुझे नही लगता कि हथकंडो से बच पायेगा ,भले ही वह लिफ़ाफ़े के रूप में हो,या वाहवाही का चस्का हो , नवगीत के अच्छे कार्यक्रम,और नवगीत संग्रह भी बहुत महत्वपूंर्ण है,जैसा काम आदरणीय पूर्णिमाजी कर रही है,नवगीत के क्षेत्र में ,वह अभिनंदनीय है,बस कुछ उसी प्रकार की कोशिशें ही नवगीत को अक्षय जीवन दे पाएँगी !
August 19 at 9:17pm · Like

Jagdish Vyom ".नवगीत छन्दोबद्ध कविता की प्रतिबद्ध धारा का नाम है। जो जनता को आन्दोलित भी कर सकती है।" .... यही बात तो कही जा रही है ... नवगीत जनता को आन्दोलित कर सकता है परन्तु यदि नवगीत जनता तक पहुँचेगा ही नहीं तो आन्दोलित कैसे करेगा..... इसके लिए कोई और प्रयास करने नहीं आयेगा हमें मिलकर कुछ करना होगा.... मंचों की चर्चा करना अपना सिर पीटना ही है..... लेकिन हम नवगीत के पाठ के लिए मंच की व्यवस्था करें, अपने अपने स्तर से करें.... यह छोटे छोटे प्रयास यदि हम करने शुरू कर दें तो नवगीत के लिए यह भी एक बड़ा योगदान होगा..... मंचों के पतन का एक कारण यह भी रहा है कि समर्थ रचनाकारों ने खुद को कविता के मंच से अलग कर लिया..... यह एक आत्मघाती कदम सिद्ध हुआ ...... अब भी समय है कि नवगीत पाठ के कार्यक्रम हों जिनमें कुछ प्रबुद्ध श्रोता हों .... इस तरह कुछ कोशिश की जा सकती है...... यह विशेष ध्यान रखना होगा कि नवगीत, नवगीत रहकर मंच पर जाये......
August 19 at 9:27pm · Like

Jagdish Vyom अन्य सदस्य भी अपने विचार रखें...... इन्हीं सब विचारों में से ही कुछ हल निकलेगा.....
August 19 at 9:33pm · Like

Saurabh Pandey सबसे पहला काम तो यह हो कि जो विमर्श आदि केलिए उत्सुक है वे कायदे का नवगीत लिखें और उस पर मिली प्रतिक्रिया पर मनन करें.अन्य नवगीतकारों के लिखे अच्छे नवगीतों को समझने का प्रयास करें.
प्रारम्भिक तौर पर नवगीत के विधान केलि यह महती योगदान होगा. उसकेबाद सार्थक मंच और गोष्ठियों में अपनी नम्र उपस्थिति बनायें.
August 19 at 10:26pm · Like

K.k. Bhasin व्योम जी ! मेरे कहने का तात्पर्य भी यही है ! नवगीत या अच्छे साहित्य के प्रति स्नेहियों में जागरूकता व लगाव पैदा करना हम अपना उद्देश्य बनायें न कि व्यर्थ की माथापच्ची करते फिरें ! अपने उद्देश्यों एवं प्रतिबद्धताओं को विस्तार दें ! झंडे उछाल उछाल कर नारे लगाने से कुछ होने वाला नहीं सिवाय भटकाव के !
August 19 at 10:30pm · Like

Bhartendu Mishra ...ये किस की झंडी को उठाने की बात हो रही है?... व्योम जी, ये न्यायमूर्ति कौन हैं ?मै अधिकांश मंचीय गीतकारो को नही जानता।..
August 19 at 11:00pm · Like · 1

K.k. Bhasin अच्छा है नहीं जानते वरना बेतुकी बहस नहीं छेड़ते ! बातें वो कीजिए जो तथ्यपरक हो ! दो किलोमीटर के भाषण प्रभावित नहीं करते अगर लीक से हट कर दिए जाँए तो !
August 20 at 12:17am · Like

Jagdish Vyom भसीन जी, भारतेन्दु जी वरिष्ठ नवगीतकार हैं, नवगीत के विमर्श में उन्होंने अपना बहुत महत्त्वपूर्ण समय खपाया है.... हिन्दी काव्यमंच कहाँ से कहाँ पहुँच गया.... लिफाफे के व्यामोह ने अनेक अच्छे रचनाकारों को रचनात्मक दृष्टि से पतित कर दिया, अनेक घसियारे लोग हिन्दी के काव्यमंचों पर कवि का चोला ओढ़कर आ गये, हिन्दी और हिन्दी साहित्य की तो ऐसी तैसी की ही श्रोताओं की रुचि का ही अपहरण कर लिया इन सबके पीछे लिफाफे की भी बड़ी भूमिका रही है...... भारतेन्दु जी की मंचों के लिए चिन्ता और उस पर तल्ख टिप्पणी बेतुकी नहीं है..... यह बहस भी बेतुकी नहीं है.... आपसे अनुरोध यह भी है कि कृपया नवगीत विमर्श के इस पटल की गरिमा को बनाये रखें और व्यक्तिगत टिप्पणी न करें.... आप अपनी बात रखें पर पूरी शालीनता के साथ....... हमारा विमर्श नवगीत को और अधिक स्तरीय बनाने तथा उसे लोकप्रिय बनाने की दिशा में है, साथ ही हमारी चिन्ता समग्र हिन्दी साहित्य के लिए है....
August 20 at 8:51am · Like · 3

अवनीश सिंह चौहान पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे - बाबा तुलसीदास ने भी क्या-क्या कह डाला। बहुतों को अच्छा, बहुतों को बुरा लग सकता है।
August 20 at 10:00am · Like

Ravindra Garg Bhartendu Mishra जी ने एक सच परन्तु कष्टदायक विचार सम्मुख रखा और Jagdish Vyom जी ने एक सही प्रश्न. जब तक कोई साहित्य लोकप्रिय न हो महान नहीं कहा जा सकता. तलसीदास की रामचरित मानस, प्रेमचंद की कहानियों, सूरदास के पदों और रहीम व कबीर के दोहों की महानता उनकी लोकप्रियता में है. अत: व्योम जी के प्रश्न का उत्तर मिलना बहुत आवश्यक है. यह सही है कि मंच की स्थिति एकदम वही है जो मिश्र जी ने बयान की है. साथ ही यह भी सही है कि कवि सम्मेलन के श्रोता को न तो कविता सुनने की समझ है और न वे कविता सुनने आते हैं. ले तफरी करने ही आते हैं. इसीलिये मंच पर कवि की नहीं entertainer की पूछ है. आज हिंदी के सबसे मँहगे कवि इसलिये मँहगे नहीं हैं कि उनकी कवितायें सर्वोत्तम हैं अपितु इसलिये मँहगे हैं कि उन्हें मंच पर समाँ बाँधना आता है. यह धंधे की बात है साहित्य की नहीं.
परन्तु जो लोकलुभावन न हो जो साधारण से साधारण व्यक्ति अपनी ओर आकर्षित न कर सके उसे साहित्य भी नहीं कह सकते. विचारणीय विषय यह है कि नवगीत कैसे लोकप्रिय हो. यदि नवगीत लोकप्रिय होगा तो मंच के भांड अपने आप मंच से गायब हो जायेंगे और मंच पर नवगीत के सृष्टा ही दिखेंगे
August 20 at 3:18pm · Unlike · 2

Jagdish Prasad Jend व्योम जी ,जहां तक मुझे याद आता है ,k k bhasin लगभग 40-45 साल पहले कृष्ण भारतीय के नाम से लिखते थे तथा उस समय वे ग़ाज़ियाबाद में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड में कार्यरत थे और मंच पर व्यवस्था विरोध की तुकांत कवितायें पढ़ते थे। गीत/नवगीत भी लिखे तथा उस समय की मधुमती जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे भी थे।बीच में कहाँ भूमिगत हो गए ,मुझे पता नहीं। अब फेसबुक पर अवतरित हुए हैं। स्वागत है उनका ,इस निवेदन के साथ कि विमर्श में वैचारिक ,सैद्धान्तिक और व्यावहारिक टिप्पणी करना अच्छा लगता है। किसी प्रकार के पूर्वाग्रह/दुराग्रह और कुतर्क विमर्श को सार्थक नहीं बनाते ,अतः उनसे बचना चाहिए। -जगदीश पंकज
August 20 at 4:10pm · Unlike · 2

Jagdish Prasad Jend डॉ भारतेंदु मिश्र ने बहुत गंभीर प्रश्न को उठाकर विमर्श आरम्भ किया है। उनकी चिन्ता कि नवगीत को कैसे बचाया जाये ?,एक ऐसा ज्वलंत प्रश्न है जिस पर नवगीत के समर्थन में खड़े रचनाकार ,सामान्य पाठक ,समालोचक तथा गंभीर विमर्शकर्ता मिलकर न केवल विचार करें बल्कि एक सुदृढ़ कार्यनीति के द्वारा तथाकथित मुख्यधारा के स्वयंभू पुरोधाओं के षड़यंत्र का मुकाबला किया जा सके। आज जिस मंच और मंचीय गीत या कविता के स्तर की बातें की जा रहीं हैं उसके बारे में नवगीत के पक्षधरों का यह कर्तव्य बन जाता है कि वे नवगीतविषयक किसी भी संवाद तथा विमर्श में भागीदारी से सार्थक उपस्थिति दर्ज कराएं और गुणात्मक व मात्रात्मक स्तर पर अपना पक्ष प्रस्तुत करें। नवगीत के बारे में यह केवल मंच की कविता का ही नहीं बल्कि नई कविता और मुख्यधारा के साहित्य में नवगीत के उल्लेख तक न करने के षड़यंत्र पर भी प्रहार करें। आज यह भी एक सच्चाई है कि नवगीत को लिखने वाले ही सामान्य रूप से उसके पाठक और श्रोता हैं। भारतेन्दु जी का यह सुझाव समीचीन है कि नवगीतकार अपना समान्तर संगठन बनाएं और नवगीतकारों के सम्मेलन और एकल पाठ द्वारा मंच का मंच के द्वारा मुकाबला करें। आज जब गंभीर साहित्य और कविता के पाठक/श्रोता सिमटते जा रहे हैं तब नवगीत को सामान्य जनता में लोकप्रिय बनाने के लिए उस जनता तक साहित्य की पहुँच जरूरी है। जहाँ तक मंचीय सम्मेलनों में नवगीतकारों के भाग लेने का प्रश्न है रचनाकार को अपनी प्रतिबद्धता और पक्षधरता का ध्यान रखते हुए ही हिस्सा लेना चाहिए। स्तरीय संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर यदि हम अपनी बात नवगीत के माध्यम से सफलतापूर्वक कह सकते हैं तो इसमें कोई बुरा नहीं मानना चाहिए।फिर यदि आपकी अपनी प्रतिबद्धता को कायम रखते हुए लिफाफा भी मिलता है तो इसमें हर्ज क्या है? अनेक नवगीतकारों ने ऐसे आयोजनों में हिस्सा लिया भी है और नवगीत को सामान्य श्रोताओं के बीच प्रतिष्ठित करते हुए सराहना भी प्राप्त की है। मेरा मानना है कि नवगीतकारों पर यह जिम्मेदारी भी है कि वे वैकल्पिक मंच के लिए प्रयास करें। -जगदीश पंकज
August 20 at 5:24pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra आप सभी मित्रो का आभार कि आपने अपने विचारो से नवगीत के इस मंचीय पक्ष पर बात रखी।..परस्पर विमर्श से ही कोई नया रास्ता दिखायी देगा।नवगीत की प्रतिष्ठा हो मेरा तो इतना ही लक्ष्य है।
August 20 at 5:59pm · Unlike · 2

Saurabh Pandey जगदीश पंकजजी, आपने सही कहा है. आपने संभवतः मेरी टिप्पणियाँ न देखी हों. वस्तुतः मेरा भी यही कहना था. भारतेन्दुजी को इसी की आश्वस्ति है.
August 20 at 7:03pm · Like

Brijesh Neeraj आम आदमी साहित्य से दूर नहीं हुआ है। साहित्य आम जन से दूर हो गया है यह स्वीकार करना चाहिए। लोक के दर्द और पीड़ा की अभिव्यक्ति आज रचे जा रहे साहित्य के कितने हिस्से में सही जगह पा लेता है यह भी विचारणीय है। बाज़ार सदा फायदे के लिए काम करता है। जो पैसा देता है वह लाभ भी कमाएगा। सीटियाँ और तालियाँ बटोरने वाली रचनाएँ उस लाभ को सुनिश्चित करती हैं। क्रांति और आंदोलन मुनाफे का काम नहीं है। ऐसी बातों पर सीटियाँ और तालियाँ नहीं बजतीं। बाज़ार का मोह छोड़े बगैर साहित्य को आम आदमी से जोड़ना कठिन है, क्रांति और आंदोलन तो दूर की बात है। पैसा कमाते हुए आंदोलन नहीं खड़े होते। बाकी आप सब प्रबुद्ध हैं।
August 20 at 8:06pm · Like

Jagdish Vyom इस विमर्श में भारतेन्दु जी ने दो उदाहरण दिए हैं, एक शंभुनाथ सिंह जी का और दूसरा निराला जी का.... मुझे लगता है कि यह दोनों बिन्दु अलग विमर्श की माँग करते हैं.....
१. " शंभुनाथ सिंह जी ने प्रारंभ में नवगीत दशकों मे केवल उन्हीं को शामिल किया था जो कविसम्मेलन में नहीं जाते थे। जो उपनाम नहीं लगाते थे।"
२. "वो निराला जिन्होंने पंत जी की अनेक प्रार्थनाओं के बावजूद एक पंक्ति भी आकाशवाणी के लिए टेप नहीं करायी और कहते रहे मेरी कविताएं बिकाऊ नहीं हैं।"
August 20 at 10:26pm · Like

K.k. Bhasin व्योम जी ! कुछ व्यस्तता के कारण आपकी टिप्पणी का जवाब नहीं दे सका ! मेरा पूरी विनम्रतापूर्वक एवं सम्मान के साथ कहना है कि मैंने आदरणीय भारतेन्दु जी के विषय में या उनके सम्मान के विरूद्ध एक शब्द नहीं लिखा है अपितु किसी के लिए नहीं कहाँ है ! यदि कहीं किसी के सम्मान पर सिंचित भी आँच आयी है तो मैं विनम्रतापूर्वक क्षमा चाहता हूँ। आदरणीय भारतेनदुजी का तो ज़िक्र ही नहीं था! बल्कि किसी साहब ने एक न्यायमूर्ति से अलंकित कर दिया ! ख़ैर यह। तो ...!
August 20 at 11:20pm · Unlike · 2

००००

Bhartendu Mishra
July 29
चाहे कफन का हो
चाहे हवन का हो
धुंए का रंग एक है। (‪#‎रमानाथ‬ अवस्थी)-रमानाथ जी की ये पंक्तियां मुझे एक समय मे बहुत प्रभावित करती थीं।किंतु जब इन पक्तियो की विवेचना की तो अर्थ निकालने मे समस्या आयी। नवगीतकार मित्र भी जरा देखें और कोशिश करें। हालांकि जब वो इन पंक्तियो को गाते थे तो एक जादुई धुन समा बांध� देती थी ।

Saurabh Pandey भारतेन्दुजी, आपने सही कहा है, कि ऐसी पंक्तियाँ वाकई समा बाँध देती हैं. वस्तुतः, ऐसी कई पंक्तियाँ ही नहीं कई रचनाएँ भी हैं जो अपनी अद्भुत शाब्दिकता, अप्रतिम तुकान्तता और कुछ उनके सप्रवाह राग-लय में वाचन के कारण मनाकाश पर ’निम्बस क्लाउड’ की तरह आच्छादित हो जाती हैं, और, सदैव बरसती हुई आप्लावित करती रहती हैं, जबतक ऐसी पंक्तियों की तार्किक मीमांसा न की जाये. फिर तो आप्लावित हृदय को झटका लगता है. ..
अब कफन से धुआँ निकलता शायद ही किसी ने देखा हो. निकलता ही नहीं. फिर हवन से निकलते धुएँ का इन संदर्भों में कैसा बखान ? परन्तु, सस्वर पाठ से बने वातावरण, बड़े नाम की ठसक और रूमानियत से मोहित होती आयुदशा, ये सब मुग्धावस्था का कारण बन जाती हैं.
नवगीत इन्हीं तथाकथित लालित भावदशा और शाब्दिक कौतुक के विरुद्ध तार्किकता के साथ यथार्थ को वैधानिक रागात्मकता के साथ जीते और जिलाते हैं.
July 29 at 8:30pm · Like · 2

Bhartendu Mishra जी ये जो ललित भावदशा है वह संगीत का विषय है कविता का नही।कविता संगीत से पृथक कला माध्यम है।साहित्य और संगीत दो अलग चीजें हैं।फिल्मो मे भी गीतकार ,गायक,संगीतकार,अभिनेता सब अलग होते हैं।उत्सवधर्मिता के लिए ये तालीपिटाऊ गीतकार जो पहले ही ताली बजवाने का आग्रह करके वाह वाह की धुन पर प्रमुदित होते हैं और श्रोताओ को द्विअर्थी पंक्तियो और हावभाव से भी मस्त करते हैं-अच्छे लगते हैं..लेकिन गंभीर कविता और विचार विमर्श के लिए इनका कोई अर्थ नही होता।
July 29 at 10:36pm · Unlike · 4

Manoj Jain Madhur मैं आपसे सहमत हूँ आदरणीय भारतेंदु भाई साहब दरअसल ऐसा सोच विश्लेषण दृष्टि की परिपक्वता के बाद ही आता है ऐसे कई फ़िल्मी गीत भी है जो सुनने भर के लिए कर्णप्रिय हैं अर्थ के स्तर पर उनमे भी कोई ताल मेल नहीं है ।प्रसंगवश यहाँ उधृत करना चाहूंगा एक दिन
एक कवि महोदय का कथन था कि स्वयं भी कोई रचनाओ की समीक्षा करता है क्या ?
सभी दूसरो के मुखापेक्षी रहते हैं
इस संबंध में मैं उनसे सहमत नहीं था ,अगर सहमत होता तो भारतेन्दु भाई साहब के प्रवर्तित विषय से असहमति व्यक्त करता।
जब हम अपनी ही रचना के स्वयं आलोचक होंगें (और होना भी चाहिए)तोकम से कम ऐसी गल्तियों का दोहराव तो नहीं होगा।
यही प्रवर्तित विषय का लाभ है।
August 1 at 6:29pm · Edited · Unlike · 3

Bhartendu Mishra जी मधुर जी आत्मालोचन की क्षमता का विकास धीरे धीरे होता है।
August 1 at 7:31pm · Unlike · 2

Shivanand Singh Sahyogi गीतकार के मन की संवेदना का अ‍र्थ लगाना एक गूढ़ विषय है.
August 23 at 12:26pm · Like · 1

००००

Jagdish Vyom
August 24 at 8:33am
माहेश्वर तिवारी का साक्षात्कार दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है। यश मालवीय के साथ नवगीत पर बात करते हुए माहेश्वर तिवारी ने कहा है कि " कवि सम्मेलन जन से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम है। मैं मंच से कभी पलायन नहीं करूँगा। कुछ गम्भीर कवियों ने मंच को अछूत समझकर कविता का बड़ा अपकार किया है। वैसे आज कवि सम्मेलन की जगह कविता सम्मेलन किए जाने की जरूरत है। जब आप जगह खाली करेंगे तो वह जगह खाली तो रहेगी नहीं, कोई न कोई भांड़, विदूषक या नौटंकीबाज वहाँ काबिज हो जायेगा।"
कहाँ तक सहमत हैं माहेश्वर तिवारी जी की इस बात से कि "कुछ गम्भीर कवियों ने मंच को अछूत समझकर कविता का बड़ा अपकार किया है..."

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Shivanand Singh Sahyogi दादा के शब्दों में दम होता है. सत्य वचन.
August 24 at 9:44am · Like · 1

Saurabh Pandey जगदीश व्योमजी, पिछले दिनों विमर्श के समूह में इन्हीं विन्दुओं पर हम सबने खुल कर बातें की थींं. आ. माहेश्वर तिवारीजी का उन विशिष्ट विन्दुओं पर तार्किक तौर पर स्पष्ट होना संतुष्ट करता है.
August 24 at 10:10am · Unlike · 2

Jagdish Vyom जी सौरभ जी, माहेश्वर तिवारी जी ने प्रकारान्तर से उसी विमर्श को आगे बढ़ाया है इस साक्षात्कार के माध्यम से
August 24 at 10:12am · Like · 3

Saurabh Pandey सत्य कहा आपने. मैं तो हैरान हूँ कि यशजी के प्रश्नों पर जिस तरह से आ. माहेश्वरजी ने विन्दुवत बातें की हैं इस तरह से आजकी तारीख में बोलने वाले कम रह गये हैं. जो हैं, उन्हें प्रकारान्तर से न सुनने का हठ पाल लिया गया है.
आपने जिस तरह से उक्त विमर्श को इस समूह में इनिशियेट किया. ’जागरण’ में छपा यह साक्षात्कार उसी का विस्तार सदृश है.
August 24 at 11:20am · Unlike · 2

K.k. Bhasin जगदीश व्योम जी ! माहेश्वरी तिवारी जी का साक्षात्कारः पढ़ा ! माहेशवर जी वे नहीं बात कहीं है जो मैंने अपनी पोस्ट में कही थी जिसकी। वजह से मुझे 'ये कौन न्यायाधीश हैं' जैसी उपाधि से विभूषित होना पड़ा ! ख़ैर , माहेशवर जी वे सही कहा है कि मंच गीत/कविता का सशक्ति माध्यम है ! उन्होंने बहुत सटीक बात कही कि चुटकुलेबाज और नौटंकीबाज़ अपना काम करते हैं आप अपना ! आप उन्हें रोक नहीं सकते ! आदरणीय , यदि उन माध्यमों से नवगीत अपने को दूर रखेगा जो श्रोताओं तक पहुँचे का सीधा रास्ता है तो हम अच्छे साहित्य के लिये दूसरों से डर कर नयी राह क्यों तलाशे बल्कि इस कोशिश में लगे कि हल्की बात कहने वाले हमारी राह से घबरा कर पलायन करें 'मेरे रस्ते तो जंगल से ही गुज़रते है , तुझे तकलीफ़ है तो राह बदल सकता है ! ' गीत/कविता की राह इतनी आसान भी नहीं कि जब चाहा क़लम उठायी और लिख मारा !
August 24 at 2:19pm · Unlike · 1

अवनीश सिंह चौहान पिछली बार एक इंटरव्यू पर तमाम विद्वानों ने अपनी बात रखी थी। इस बार प्रतिक्रियाएं बहुत कम आयी हैं। क्या कारण हो सकता है, व्योम जी?
August 24 at 5:14pm · Unlike · 2

अवनीश सिंह चौहान तिवारी जी ने नवगीत के समकालीन परिदृश्य पर चुप्पी साधते हुए नई पीढ़ी के जो नाम गिनाये हैं वे कहीं इरादतन तो नहीं है? कहीं इससे यह संकेत तो नहीं होता कि नवगीत में भेड़ों की तरह गुट बनाकर चलने की परंपरा मौजूद है ?
August 24 at 5:24pm · Edited · Unlike · 3

Ganga Pd Sharma यह साक्षात्कार नवगीत पर एक सार्थक चर्चा कहा जा सकता है। एक गीतकार की दृष्टि से लिया गया यह साक्षात्कार स्वाभाविक भाव से संवेदनाओं को ही अधिक महत्त्व देता है।इस साक्षात्कार में नवगीत को समकालीन कविता के समकक्ष चिंतन वाली विधा तो माना गया है पर समकालीन कविता की मूल प्रवृत्तियों जैसे उत्तर आधुनिकता और नव उदारवादी प्रवृत्तियों को उपेक्षित ही रहने दिया गया है। लेकिन फिर भी नवगीत पर काफ़ी कुछ समेटने की कोशिश यहाँ दिखती है जो स्वागत योग्य है। माहेश्वर तिवारी जी नवगीत को जीते ही नहीं उसे जीवन भी देते हैं।वैसे सभी गीत नवगीत अंतःसलिला से ही फूटते हैं पर इनके तो और गहरे अंतस्तल के ऐसे किसी पाताल तोड़ कुएं को भेद कर आते हैं कि उनके उत्स का छोर ही नहीं मिलता।इन्हें और इनके नवगीतों को अलगाना मुश्किल है। इन्हें-उन्हें परस्पर प्रतिछवियाँ कहा जा सकता है। जैसा कि गीतकार ने स्वयं भी स्वीकारा है और वैसे भी इन्हें पढ़-सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे इन्होंने नवगीत नहीं नवगीतों ने इन्हें रचा है।
August 24 at 6:04pm · Unlike · 5

Bhartendu Mishra तिवारी जी के अपने रचनाधर्म को लेकर अच्छी चर्चा हुई है। नवगीत को लेकर उसके दोहरे संघर्ष को लेकर जिसके वो साक्षी रहे हैं उस पर और बात होती तो अच्छा लगता.उनके समकालीनो को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए....इसी प्रकार नवगीत के इतिहास पर कुछ और सवाल हो सकते थे आदरणीय से..अब भाई यश मालवीय ने प्रश्नावली जैसी बनाई हो वैसे ही उत्तर मिलने स्वाभाविक हैं।
August 24 at 6:19pm · Unlike · 4

Jagdish Vyom केवल प्रशंसात्मक बातें ही यहाँ न लिखिये... यह विमर्श का मंच है..... यहाँ पहले से ही नवगीत के इसी सन्दर्भ पर चर्चा हो रही थी और इसी बीच आज यह साक्षात्कार प्रकाशित हुआ जो विमर्श के विषय से जुड़ा हुआ है इसीलिए यहाँ इसे पोस्ट किया गया है..... यदि कुछ छूट गया है तो उस पर भी दृष्टि डालें.... ऐसे और कौन से प्रश्न हो सकते हैं जिन्हें साक्षात्कार लेने वाले को पूछना चाहिए था परन्तु नहीं पूछा गया..... या आपकी दृष्टि से कुछ और बहुत महत्त्वपूर्ण जो छूट रहा हो.......
August 24 at 6:24pm · Edited · Unlike · 3

अवनीश सिंह चौहान नवगीत में जातिबोध और अंधभक्ति की भी बड़ी भूमिका रही है - उठाने-गिराने से लेकर जय-जयकार करने तक। लेकिन कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो जातिवादी मानसिकता और भक्ति-भावना से ऊपर उठकर सच कहने का साहस रखते हैं। ऐसे सत्यनिष्ठ गुणीजनों को मैं हृदय से नमन करता हूँ। आ. भारतेंदु जी ने एक गंभीर बात कही है कि 'प्रश्नावली जैसी बनाई हो वैसे ही उत्तर मिलने स्वाभाविक हैं।" यानि कि - प्रश्नावली कैसी है और क्यों है, विचारणीय है? और प्रश्नोत्तर देने वाले ने ऐसे प्रश्नों पर अपना मत कैसे और क्यों रखा, जबकि वह वरिष्ठतम नवगीतकारों में से एक हैं?
August 24 at 6:39pm · Like · 2

Ramakant Yadav पूरा साक्षात्कार पढ़ने पर कई तरह के प्रश्न उभर रहे हैं।पहली चीज तो यह कियश मालवीय ने पृष्ठभूमि को कुछ ज्यादा ही सजा दिया है।सम्मान और प्रशंसा में शब्दों का अलंकरण ऐसा भी न हो कि कविता पीछे छूट जाए और कवि आदमी न होकर बड़़ा आदमी नजर आने लगे।मेघ मंद्र स्वर हवाओं में गूंज रहा है-मुझे नहीं लगता कि माहेश्वर तिवारी या किसी भी समकालीन गीत कवि को ऐसी किसी अलंकारी भाषा की जरूरत है।आज का समय इस भाषा को स्वीकार करने को जरा भी तैयार नहीं।और माहेश्वर तिवारी के गीतों को मानक मानना अभीजल्दबाजी होगी।माहेश्वर तिवारी कहते हैं किगीत लेखन के लिए बहुत भटकना पड़ता हैपर वे भटकते हुए गये कहां?नदी झील पर्वत झरने मरुस्थल के पास वह भी आवारगी करते हुए।आज का नवगीत ऐसी आवारगी कोमान्यता कतई नहीं देता जहां आम आदमी उसकी पीड़ाशोषण अन्यायदिखायी ही न पड़े या बाइचान्स दिखायी भी पड़ जाए तो वहां भी तफरी के लिएजगह बना ली जाए।
August 24 at 9:38pm · Like · 4

Om Prakash Tiwari मैं इस बात से तो सहमत हूँ कि खाली जगह को कोई न कोई भरता ही है। चाहे साहित्य हो, चाहे राजनीति या कोई और क्षेत्र। कवि सम्मेलनों में अच्छे गीतों और छंदों को प्रशंसा हमेशा मिलती रही है, बशर्ते वे गीत-छंद समाज से जुड़े प्रासंगिक विषयों पर केंद्रित रहे हों।
August 24 at 9:59pm · Like · 3

Ramakant Yadav और यह ठीक ही कहा है तिवारी जी ने किआवारगी का बड़ा सहयोग मिला है उनके गीतों को।तभी तो उनके गीत गुनगुनाने के लिए अधिक हैं तथ्य और सत्य की खोज के लिए कम।उनके गीतआधुनिक पेंटिंग की तरह ही हैंजैसा कि वे कहते हैं कि स्वामीनाथन जी ने उनकी प्रशंसा में कभी कहा था।और ये पेंटिगनुमा गीत कभी न तो ठीक ठीक विचार दे पाते हैं और क्रांतिधर्मा तो होते ही नहीं।माहेश्वर जी जब यह कहते हैं कि गम्भीर कवियों ने मंच को अछूत समझकर कविता का बड़ा अपकार किया है तो बात कुछ जचती नहीं।क्या सार्थक कविता मंचों की बदौलत जिन्दा है?सच तो यह है कि आज के मंच ने कविता का व्यापार ही किया हैदिया है तो बस थोड़ा सा मनोरंजन जो कि कोई कीर्तनकार या नौटंकी कार भी अपने तरीके से करता है।हां पहले कवि लोग मंच पर जाते थे पर तब गम्भीर कविता को सुनने सुनानेवाले मौजूद थे।नहीं जनवाद मन से नहीं उपजता जैसा कि माहेश्वर जी कहते हैं।असल में माहेश्वर जी के गीत मन से उपजते हैं।जनवाद तो विचार है दृष्टि है प्रतिबद्धता है।और इन्हीं चीजों का माहेश्वर जी के गीतों में अभाव है।आंखों में आंसू आना औरआंखों से चिंगारी फूटना दो अलग तरह की परिघटनाएं हैंदोनों को कभी कहीं विशेष परिस्थिति में ही जोड़ा जाना चाहिये।व्यक्तिगत भावुकता आशा निराशा प्रेम और सामाजिक सरोकारों के ज्ञानात्मक आवेगों में बड़ फर्क है।माहेश्वर जी उन्हें एक करने की कोशिश में सफल नहीं दिखते।और अंत में नई पीढ़ी केनवगीतकारों के नाम गिनाते हुए भी माहेश्वर तिवारी जी दृष्टि साफ नहीं हैं।ऐसाबुजुर्गगीतकार जिसके पास इतना अनुभव हो ज्ञान हो वह भी किसी मोह में फंसकर जो कुछ नाम गिनारहा है वे किसी भी तरह से विवेकपूर्ण तटस्थ न्यायपूर्ण और तर्क संगत नहीं दिखते।ये चुनाव माहेश्वर जी के गीत व्यक्तित्व को एक और तरह से कमजोर सिद्ध करते हैं।
August 24 at 10:25pm · Unlike · 3

K.k. Bhasin माहेशवर तिवारी जी के साक्षात्कारः में अगर ध्यान से मनन करें तो उनकी मन की सहजता का भी पता लगता है ! असल में माहेशवर जी के अन्दर एक सहज गीतकार भी है जो संवेदना एवं गीत के भावात्मक पक्ष से भी जुड़ा है ! उनके साक्षात्कारः में उनका यह पक्ष साफ़ दृष्टिगोचर होता है ! पूरी प्रस्तुति को नवगीत की कसौटी पर ही कैसे देखें?
August 24 at 11:46pm · Unlike · 2

अवनीश सिंह चौहान जब महेश्वर जी कहते हैं कि खाली जगह को कोई भरता है और वह कोई कौन है उसका भी उन्होंने संकेत किया - "कोई न कोई भांड़, विदूषक या नौटंकीबाज वहाँ काबिज हो जायेगा।" यानी कि वह स्वयं मंचों पर जाते हैं और वहां खाली जगह को भरने में तिवारी जी के साथ 'भांड़, विदूषक या नौटंकीबाज' मौजूद रहते होंगे। क्या महेश्वर जी ने उक्त लोगों का कभी प्रतिरोध किया- किसी मंच पर? क्या उन्होंने मंच पर कभी गंभीर कवियों की उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास किया? या सिर्फ मंच शेयर करते रहे और उक्त श्रेणी से दोस्ती भी गांठे रहे ? यह दोहरा आचरण तो नहीं ?
August 25 at 6:51am · Unlike · 3

Bhartendu Mishra नवगीत के लिए समानांतर मंच की आवश्यकता है जिसमे तथाकथित विदूषको की कोई जगह न हो।जहां गंभीर विमर्श हो।2004 मे आगरा की नवगीत गोष्ठी मे मैने सोमठाकुर जी से पूछा था कि नवगीत दशको का विमर्श क्यो नही कराते..वे उनदिनो हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष थे।मंच पर तिवारी जी भी थे यश मालवीय भी थे राजेन्द्र गौतम ,बुद्धिनाथ मिश्र आदि अनेक नवगीतकार भी थे सबने सहमति दी थी स्वीकार किया गया -सस्थान से किसी को यह कार्य सौपने की बात भी हुई लेकिन ..फिर सब खतम .. सोमठाकुर जी नवगीत दशक 1 के रचनाकार हैं उन्हे भी मंच ही खींचता रहा विमर्श नही ।..जो कविता विमर्श के लिए नही है उसकी पाठ्यचर्या क्यो की जाए ?..ऐसे मंचीय कवियो के सरोकार गंगा गये गंगादास जमुना गये जमुना दास हो जाते है।लोगो की नजर मे सब रहता है ..माया और राम दोनो को साधने की कोशिश असंभव है। जिनकी श्र्द्धा मंचीय प्रपंचो से जुडी है वे सच्चे अर्थो मे नवगीत के मित्र नही हो सकते।शंभुनाथ जी के शब्दो मे वे नवगीत के शत्रु हैं।
August 25 at 7:54am · Edited · Unlike · 5

Radhey Shyam Bandhu माहेश्वर तिवारी की बात आंशिक रूप से सही है । कुछ अच्छे कवि भी मंच पर पहुचकर मंचीय़ हो गये । कवि सम्मेलनी व्यवसाय का हिस्सा बनने से
उनका स्तर गिरा है । इससे हमें बचना चाहिये ।
August 25 at 9:07am · Unlike · 4

K.k. Bhasin नवगीत की स्वीकारता एवं दर्शकों की जागरूकता में बड़े स्तर पर एक अच्छी सोच पैदा करने की हमारी प्रबल इच्छा और दूसरी तरफ़ अपनी सरहदें खींच कर उन्हीं को प्रवेश देना जो हमारे उसूलों से बँधे हों , हम रेगिस्तान की आँधी में फँस जायेंगे ! अपनी सही दिशा पर विचार गम्भीरता से करें !
August 25 at 9:33am · Like · 2

Jagdish Vyom हिन्दी संस्थान या अन्य साहित्यिक अकादमियों में जिस तरह की साहित्यिक माफियागीरी और राजनीति व्याप्त है, उनसे नवगीत के लिए कोई उम्मीद करना समय खराब करना ही है.... हमें ही नवगीत और हिन्दी साहित्य के लिए अपने स्तर से ही जो कर सकते हैं वह करना है, नवगीत विमर्श इसी पहल का एक सोपान है....... मेरा निवेदन तो सिर्फ यही है कि ---- " बहते जल के साथ न बह / कोशिश कर के मन की कह " .....
August 25 at 9:36am · Like · 5

अवनीश सिंह चौहान भाई रमाकांत जी ने तिवारी जी के इंटरव्यू के निहितार्थ को बखूबी रेखांकित किया है, वहीं "मंचीय कवियो के सरोकार गंगा गये गंगादास जमुना गये जमुना दास हो जाते है।लोगो की नजर मे सब रहता है ..माया और राम दोनो को साधने की कोशिश असंभव है। जिनकी श्र्द्धा मंचीय प्रपंचो से जुडी है वे सच्चे अर्थो मे नवगीत के मित्र नही हो सकते।शंभुनाथ जी के शब्दो मे वे नवगीत के शत्रु हैं।"- कहकर आ. भारतेंदु जी ने माहेश्वर जी जैसे उन तमाम लोगो के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि ऐसे लोग नवगीत के 'मित्र' नहीं हो सकते। यानि कि ऐसे लोग सच्चे नवगीतकार नहीं। मुझे लगता है कि आ. राधेश्याम जी ("कुछ अच्छे कवि भी मंच पर पहुचकर मंचीय़ हो गये । कवि सम्मेलनी व्यवसाय का हिस्सा बनने से उनका स्तर गिरा है) ने भी तिवारी जी जैसे मंच से जुड़े रचनाकारों की ओर संकेत किया है। भसीन जी कहते हैं - "असल में माहेशवर जी के अन्दर एक सहज गीतकार भी है". यहाँ भी शब्द विचलन की ओर संकेत करता है। एक बार माहेश्वर जी ने दैनिक जागरण में 'सहज गीत' की वकालत की थी। यह वकालत भसीन जी की मीमांसा से मेल खाती है। तो क्या तिवारी जी को सहज गीतकार माना जाना चाहिए (मंच से उनके जुड़ाव और मंच की डिमांड को ध्यान में रखते हुए)?
August 25 at 11:08am · Edited · Like · 1

Brijesh Neeraj मंचीय कवि मंच की वकालत ही करेगा और उसके पक्ष में कुछ न कुछ तर्क गढ़ेगा जैसा कि तिवारी जी ने किया है। और यह संवेदना शब्द आजकल अच्छा प्रचलन में है कुछ भी दाल भात इसके नाम पर परोस दिया जाता है। मंच पर जाकर कौन सी जनता से जुड़ना चाहते हैं और कैसी संवेदना बटोरना चाहते हैं। सही क्यों नहीं कहते कि संवेदना के नाम पैसा बटोरना चाहते हैं। बाज़ार में दुकान सजाकर नवगीत बेचने की वकालत कब तक सुनी जाएगी। जनपक्षीय साहित्य और तथाकथित संवेदना युक्त साहित्य में अंतर होता है। जनपक्षीय साहित्य पैसे नहीं देता। उस पर सीटी और ताली नहीं बजती तो जाहिर है पैसे भी नहीं मिलते। तिवारी जी जनता से संपर्क करना चाहते हैं अपने नवगीत सुनाना चाहते हैं तो चलिए किसी गाँव में बाग़ में जमीन पर बैठते हैं और वहीं दो चार को इकट्ठा कर उन्हें अपने नवगीत सुनाते हैं। चलब्या।
August 25 at 6:18pm · Unlike · 5

Awanish Tripathi मुझे नहीं लगता कि मंच ही नवगीत के पारेषण का सही स्थल है।तिवारी जी हों या अन्य कोई रचनाधर्मी यदि वे मंचों से जुड़े हैं तो उनके अपने निहितार्थ हैं चाहे वो बाज़ारवादी सोच से ग्रसित हों या तथाकथित संवेदना से।
हंस क्यों बगुलों के बीच जाकर बैठने लगा??क्या ये स्वस्थ साहित्यिकता से परे नहीं हुआ??
प्रश्न यह है कि क्या यह साक्षात्कार पूर्व प्रेरित प्रश्नों का समूह तो नहीं।यश जी ने प्रश्नों का जो जाल बुना उत्तर भी उसी दिशा में बहते हुए मंचों की प्रशंसा के सागर में मिल गए।
साक्षात्कार तो तब उत्कृष्ट बनता और तिवारी जी की सटीक सोच का ताना बाना तब खुलता जब प्रश्नकर्त्ता उनका प्रशंसक न होता और मंचीय प्रावधानों की विचार धारा से दूर होता।
विमर्श की धारा को मोड़कर सोचना होगा क्या इस तरह के प्रश्न उत्तर से नवगीतकार के मन में मंचों के प्रति अधिष्ठित उदासीनता को समाप्त करने की चेष्टा तो नहीं?
August 25 at 7:45pm · Unlike · 4

Brijesh Neeraj निश्चित रूप से दुकानदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास है। मंच से जुड़ाव के पीछे पैसे का लालच ही काम करता है भले ही तुर्रा जनता से जुड़ाव का हो। मुझे समझ नहीं आता मंच पर बैठे नशे में टुन्न ये महान साहित्यकार संगीत के आठवें सुर के सहारे कौन सी जनता से कैसा संवाद स्थापित करना चाहते हैं।
August 25 at 8:18pm · Unlike · 2

Jagdish Vyom क्या अभी ऐसे कुछ लोग हैं जो मंचों पर लोकप्रिय हैं, जिन्होंने मंचों से खूब पैसा भी कमाया है और उनके अन्दर का नवगीतकार अभी तक जिन्दा है ? यदि ऐसे कोई कवि या कवयित्रियाँ हों तो उनके नाम बतायें ......और उनका एक एक प्रतिनिधि नवगीत भी बता दें.....
August 25 at 9:36pm · Edited · Like · 1

K.k. Bhasin Do nam to mere dhyan me atte hai. Kuwar Bechain v Dr Dhananjay Singh.
August 25 at 9:33pm · Like

Saurabh Pandey क्या मंच का मतलब सिर्फ़ पैसा है ? गोष्ठियों की परम्परा पर बात क्यों न हो ?
August 26 at 1:55am · Unlike · 1

Jagdish Vyom सौरभ जी, बात क्या करनी...... बातें तो होती ही रहती हैं...... नवगीत गोष्ठी शुरू कर दीजिये.... देखा देखी कुछ अन्य लोग भी अपने अपने स्तर से ऐसी पहल करने लगेंगे..... हाँ यह ध्यान रखना होगा कि नवगीत गोष्ठियों को मंच के गलेबाजों और दसियों साल से एक दो गीत गाने वालों से बचना चाहिए .....
August 26 at 9:43am · Like · 1

Saurabh Pandey आपने बिल्कुल सटीक बातें की हैं, जगदीश व्योमजी. मैं इस सार्थक समूह में चल रही चर्चां-टिप्पणियों से निस्सृत बहुत सारे विन्दुओं को उनकी प्रतिच्छाया के सापेक्ष भी देखता हूँ. सब समझ में आता है.

//अपने तईं हमने नवगीत गोष्ठी शुरु कर दीजिये //

एक शुरुआत हो गयी है. उसकी आवृति को नियत करना है. यह आरम्भिक दौर है, यह भी हो जायेगा. ऐसे ही एक प्रयास के अंतर्गत आपभी दिल्ली के ’विश्व पुस्तक मेला २०१५’ में हुई नवगीत-गोष्ठी का हिस्सा बने थे.

//यह ध्यान रखना होगा कि नवगीत गोष्ठियों को मंच के गलेबाजों और दसियों साल से एक दो गीत गाने वालों से बचना चाहिए //

गोष्ठियों में ऐसी कोई ’विकलांगता’ तुरत पकड़ में आ जाती है. गले का उपयोग स्वीकार्य है लेकिन नवगीत के शिल्प और कथ्य की कीमत पर नहीं. गोष्ठियों का स्वरूप चूँकि अध्ययनपरक तथा विधासम्मत होता है, अतः वातावरण कभी व्यावसायिक नहीं हो सकता.

इन्हीं संदर्भों को लेकर मैं इस समूह में अपनी टिप्पणियाँ करता रहा हूँ. अब यह अलग बात है कई ’सज्जन’ मंच का अर्थ उसी मंच से लेते हैं जिसका विरूपीकरण हो चुका है. ऐसे कई सज्जनों को जानता हूँ जो चाहें जितना बोलें, व्यक्तिगत जमावड़े से अलग अन्य किसी ’मंच’ के अनुभव से शायद ही परिचित हों तथा तदनुरूप लाभान्वित हुए हों.

००००


Jagdish Vyom
August 23 at 11:30am
" शंभुनाथ सिंह जी ने प्रारंभ में नवगीत दशकों मे केवल उन्हीं को शामिल किया था जो कविसम्मेलन में नहीं जाते थे। जो उपनाम नहीं लगाते थे।"
कितना सही था उनका यह दृष्टिकोण ?

Comment
You, कृष्ण नन्दन मौर्य, आशुतोष नारायण त्रिपाठी, Bhartendu Mishra and 4 others like this.

Bhartendu Mishra जो श्रेष्ठ नवगीतकार कविसम्मेलनो मे शिरकत करते थे या जो उपनाम भी लगाते थे उन्हे नवगीतदशक-1 मे बिल्कुल ही नही लिया गया था।..कारण मंचीय कवियों की प्रतिबद्धता को लेकर सदैव सन्देह बना रहा..जो आज भी है।..हालांकि बाद में शंभुनाथ जी ने - नवगीत अर्धशती- तक आते आते मंचो पर हो रही आलोचनाओ के बादकुछ चुनिन्दा मंच के लोगो को भी शामिल किया था।इसप्रकार 50 नवगीतकारो की सूची बनी थी।
August 23 at 1:03pm · Unlike · 1

K.k. Bhasin कवियों के उपनाम रखने की परम्परा क्यों , कैसे व कब पड़ी इस पर कुछ प्रकाश डालिये भारतेनदुजी ! जानकारी का इच्छुक हूँ !
August 23 at 1:19pm · Like

Jagdish Vyom कवियों के उपनाम की परम्परा कब पड़ी, क्यों पड़ी आदि पर चर्चा करने से हमारा मूल विषय छूट जायेगा.... मूल बिन्दु पर बात करें.... कि उपनाम रखने से या कवि सम्मेलन में कविता पढ़ने मात्र से कोई रचनाकार हेय कैसे हो सकता है ? किसी भी चयन का आधार रचना की गुणवत्ता होनी चाहिये या रचनाकार का कविसम्मेलन में जाना या उपनाम रखना .....
August 23 at 1:37pm · Like · 1

K.k. Bhasin व्योम जी! मेरी अपनी सोच यही कहती है कि अच्छा साहित्य श्रोता ओं तक कैसे पहुँचे व उन्हें इसके प्रति कैसे जागरूक करें वह नवगीत हो या अन्य , माध्यम कोई भी हो सकता है गोष्ठियाँ ,सम्मेलन या विचारमंच ! एकला चलो का मार्ग सही नहीं है! इसपर विचार की आवश्यकता है ! रास्ता तो मिलेगा !
August 23 at 2:06pm · Unlike · 2

Sanjiv Verma 'salil' निराला जी तो कवि सम्मेलनों में जाते थे और उन्होंने उपनाम भी रखा था. शम्भुनाथ जी के मानक के अनुसार तो निराला जी भी अपात्र हो जाएंगे. क्या किसी एक व्यक्ति को भले वह कितना भी बड़ा या महान रचनाकार हो, को किसी साहित्यिक विधा का भविष्य बंधक रखने दिया जा सकता है? या उसका नाम लेकर उसके द्वारा चयनित लोग अगली पीढ़ी की सोच और परिवर्तनों को अमान्य कर सकते हैं? भाषा और कविता दोनों बहती हुई नदी की तरह होती हैं. हर युग अपनी अभिव्यक्ति की राह खुद बनाता है. नवगीत की नवता के मानक, आयाम या पैमाने कुछ धारणाओं में खुद को बंदी रखनेवाले कैसे तय कर सकते हैं?
August 23 at 5:24pm · Unlike · 4

Shivanand Singh Sahyogi कविसम्मेलन में जाना या उपनाम लिखना अलग-अलग बातें हैं . यदि दोनों बातें एक कारण हैं एक दोष है तो उंनके जैसे सम्मानित गीतकार को मेरी समझ से अपना जातिसूचक शब्द अवश्य एक गीतकार होने के नाते हटा देना चाहिये था .
August 23 at 6:01pm · Like

Bhartendu Mishra जी व्योम जी आपने जो प्रश्न उठाये हैं इन्ही बिन्दुओ को लेकर बाद मे शंभुनाथ सिंह की आलोचना हुई बाद मे उन्होने अपने आपको बदला लेकिन तब तक नवगीत और जनगीत जैसे दो खेमे खडे हो चुके थे।..वीरेन्द्र मिश्र और रमेश रंजक जैसे प्रातिभ नवगीतकार नवगीत दशको मे शामिल नही हुए।..इसके बावजूद तीनो दशको मे 30 नवगीतकारो का चयन करके उन्होने एक बडा काम किया।नवगीत की बुनियाद इन संकलनो की भूमिकाएं हैं। उस समय के अन्य विद्वानो के आलेख और तभी डा..राजेन्द्र गौतम की ऐतिहासिक पुस्तक भी आयी थी-हिन्दी नवगीत उद्भव और विकास-..हमे इस बारे मे यदि जानना है तो ये सब पढना चाहिए।..कई पत्रिकाओ के नवगीत अंक भी निकले थे।
August 23 at 8:29pm · Like · 2

Jagdish Vyom जी हाँ भारतेन्दु जी, नवगीत को समझने के लिए यह सब पढ़ना होगा और यह सब संकलन तथा पत्रिकाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में सदस्यों का सहयोग भी करना होगा ....
August 23 at 9:44pm · Like · 3

Ganga Pd Sharma नई कविता के प्रभाव के चलते जब गीत ,छंदबद्ध और तुकांत गेय काव्य गौड़ हो गए थे,उस समय नवगीत ने गेयता और छंद की वापसी में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। गीत पर छाए संकट के बादलों को छांटा था। विश्वविद्यालय भी रुचि लेते दिखे थे। लेकिन यह वृत्ति स्थायी भाव नहीं बन सकी,जो इसके भविष्य के लिए अच्छा अच्छा नहीं हुआ।'सलिल'जी की बात सही है।उपनाम में क्या दोष है?उपनाम ही क्या मंच में भी कोई दोष नहीं है। उर्दू मुशायरों में बशीर बद्र ,निदा फ़ाजली भी जाते हैं और केवल गवैये भी।वहाँ इतना कुहराम नहीं मचता । हिंदी में 'कौआ कान ले गया'बोलने भर से लोग उसी दिशा में दौड़ पड़ते हैं। मंचों ने नवगीत से क्या छीन लिया ?वहाँ साधारण समझ के लोग आते हैं ज़्यादा जटिल बिंबों और प्रतीकों को नहीं समेट पाते हैं तो इसमें उनका क्या दोष है। उनमें संस्कार के बीजवपन का काम कौन करेगा?इस पर भी विचार करना होगा कि कहीं मंचों से अच्छे कवियों को उतारने से ही तो जनता का रुझान चुटकुलों की ओर नहीं हुआ है। शंभूनाथ सिंह ने केवल मंचों पर न जाने वालों को ही अपने संकलनों में स्थान देकर स्वयं ही एकांगी दृष्टि का परिचय दिया था। मंचीय काव्य जीवन और जगत के चिंतन से एकदम कटा हो ऐसा भी नहीं है। महाप्राण निराला ही क्या ,उनसे बहुत बाद के अदम गोंडवी को भी मंचों पर खूब सुना और सराहा जाता रहा है। कविता क्या गद्य भी सुना जाता है। मंचों पर केपी सक्सेना अपने गद्य पढ़ते थे।बिंबों और प्रतीकों के व्यामोह ने भी नवगीतों का का कम नुकसान नहीं किया । इससे वे ज़बान पर तो चढ़े पर दिल में नहीं उतर पाए। एक और बात ध्यान देने योग्य है कि नवगीत पर प्रायः नवगीतकार ही आलोचक का भी दायित्त्व निभाते रहे हैं। आलोचना के मानदंडों के निर्धारक आलोचकों ने इसमें कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। इससे इस विधा के लिए आलोचना के केंद्र में भी कोई खास हलचल नहीं हुई। इन आलोचकों के लिए नवगीत ,गीत से भी अधिक अछूत और अछूता दोनों रहा। निश्चय ही ये आलोचक भी दूसरे शंभूनाथ सिंह ही हैं जिन्हें गेयताऔर छंद की गंध तक से परहेज़ है। तुकांतता से इन्हें उलटी आती है। पर यह भी विचारणीय है कि यह नवगीत उन्हें अपनी ओर आकृष्ट क्यों नहीं कर सका ।क्या इस पर भी विचार नहीं होना चाहिए कि नवगीतकारों ने शायद उन्हें ही लुभाने के लिए नवगीतों को नई कविता की शक्ल में छपना ,छपाना भी शुरू कर दिया था। मीटर और पैरामीटर सब वही थे बस लाइनें छोटी-बड़ी करके ये नवगीतकार क्या सिद्ध करना चाहते थे?आवश्यकता आत्मावलोकन की भी है।
August 25 at 12:08pm · Like · 1

Bhartendu Mishra जो नवगीतकार मंच पर जाना चाहते हैं भाई गंगा प्रसाद शर्मा जी से संपर्क करें।उन्होने तीन चार नवगीतकारो का उल्लेख भी किया है-निदाफाजिली,बशीरबद्र,अदम गोण्डवी और के पी सक्सेना।अब ऐसी टिप्पणियो के बाद नवगीत विमर्श की आवश्यकता ही नही बची।....व्योम जी जरा आदरणीय सलिल जी से पता कीजिए कि जब निराला कविसम्मेलन मे जाते थे तो किसकी शर्त पर जाते थे।उस समय का मंच कैसा था।कितना धन कमाया उन्होने?अब के कवि लाख और 50 हजार की बात कर रहे हैं..किसको रोका है किसने रोका है कविसम्मेलन मे जाने के लिए..आप भी जाइए आलाप भरिए,प्रपंची लोगो के सहारे बहुत लाभ मिलेंगे। भोग की सारी चीजें......फिर पूछा जाएगा कि तद्द्भव ,हंस,वागर्थ,कथादेश,आलोचना,समकालीन भारतीय साहित्य आदि मे आपके मंच से बिककर लौटे हुए नवगीतो को कितना स्थान मिला?..और क्यो मिलना चाहिए?जब फूहड हास्यवाला 50 हजार लेता है और आपको नवगीत पढने के 5000 भी बडी मुश्किल से मिलेंगे। हां कुमार विश्वास जैसा नवगीतकार बनना चाहते हैं..तो यही मार्ग है..जय हो विद्वत मंडली की।
August 25 at 6:24pm · Unlike · 2

Ganga Pd Sharma आदरणीय अग्रज भारतेन्दु जी !मैं मंच का वकील नहीं हूँ। लेकिन कम पढे-लिखों को काव्य संस्कार कौन देगा?उनके मनोरंजन का भी तो ध्यान रखना होगा। या तो आप अपना उत्कृष्ट साहित्य गाँव-गाँव पहुंचाइए या फिर उन्हें जैसा मिल रहा है सुनने दीजिए। निदाफाजली,बशीरबद्र,अदम गोण्डवी और के पी सक्सेना को मैंने नवगीतकार कभी नहीं कहा है। इनके मंच पर जाने की बात कही है। उर्दू मे मंच से परहेज़ घृणा के स्तर का नहीं है लेकिन हिन्दी में है।यह स्वस्थ और शुभ लक्षण नहीं है।कविता का एक माध्यम यह भी था । इसके पतन का दायित्व जनता पर नहीं थोपा जा सकता ।'तद्द्भव ,हंस,वागर्थ,कथादेश,आलोचना,समकालीन भारतीय साहित्य आदि'की पहुँच के बाहर के लोगसाहित्यिक अछूत नहीं कहे जा सकते। आमीन।
August 25 at 8:11pm · Like

Bhartendu Mishra आज का कविसम्मेलन का मंच जनता को मूर्ख बनाता हैं।फूहड कवियो को और गलेबाज गीतकारो को पैसा देता है। मंच को मस्खरो ने लूट लिया/आप अब किसकी बात करते हैं।..आपके हिसाब से मंच नवगीत को स्थापित करने का आवश्यक सोपान है....मतलब ये भी हुआ कि जिसे गाना न आता हो उसे नवगीत नही लिखना चाहिए,जिसकी मित्रता मंचीय लोगो से न हो उसे नवगीत नही लिखना चाहिए,जिस नवगीतकार को एक रात के बदले मोटी कमाई न हो उसका जीवन निरर्थक।..मंच जिन्दा रहे नवगीत रहे या न रहे..उर्दू हिन्दी की बात क्यो ?..मंच की कविता की बात कीजिए। ये भी कि मंच पर नही पढा तो कविता का विस्तार ही नही हुआ...कभी किसानो /विद्यालयो/मजदूरो अस्पतालो के परिसरो मे जाकर कविता पाठ करने के बारे मे भी सोचिए जहां पैसे मिलने का जुगाढ न हो।
August 25 at 10:23pm · Edited · Like

Ganga Pd Sharma आदरणीय! अस्पतालों मे तो मरीज वैसे ही अपने दर्द से अरशान रहते हैं ,उन्हें कविता सुनाकर और परेशान करना उचित नहीं। हाँ ,विद्यालयों मे होने चाहिए । कहीं-कहीं होते भी हैं।लेकिन आपके नवगीतकार क्या वहाँ आने को तैयार हैं?मैं अपने गाँव के विद्यालय मेन करवाना चाहता हूँ। आप सूची बनाइए मैं उन सभी का मार्गव्यय दूंगा । परंतु बात यह है कि मार्ग व्यय मात्र द्वितीय श्रेणी का होगा। वह मैं अपनी जेब से दूँगा। पहली मई 2015 को रखा जाएगा । मजदूर दिवस पर। बोलिए मंजूर है!
August 26 at 7:02am · Like

Ganga Pd Sharma अरशान को परेशान कर सकते हैं ।
August 26 at 8:02am · Like

Bhartendu Mishra व्योम जी से सूची बनवाइए...और कविसम्मेलन का धन्धा शुरू कीजिए।पहली खेप मे बडे मंचीय कलाकारो से पूछिए जो नवगीतकार भी बने रहना चाहते हैं ?
August 26 at 8:22am · Like · 1

Jagdish Vyom जी हाँ भारतेन्दु जी..... आपका यह अच्छा सुझाव है ........
August 26 at 9:21am · Like · 1

Ganga Pd Sharma वैकल्पिक मंच के पीछे क्यों पड़े हैं। नई कविता और गज़ल वाले कभी वैकल्पिक मंच के पीछे नहीं पड़े।नौटंकी होती है। बहुत फूहड़ स्तर की होती है।लेकिन नाटक वाले उसके पीछे नहीं पड़ते ।मेरी राय में इसी तरह नवगीत वालों को भी लिखते रहना चाहिए । अगर कोई मंच पर पढ़ता है। पैसे पाता है ,उसे पाने दीजिए। संभव हो तो उससे कोई साहित्यिक आयोजन करवा डालिए। नवगीतों पर गंभीर विमर्श का आयोजन रखवा लीजिए। कभी शिल्प के बिंब,रूपक और प्रतीक विधान पर तो कभी उसके वर्ण्य विषय,लोकसंपृक्तता,प्रासंगिकता/अप्रासंगिकता पर विमर्श हो। केवल वाग्विलास से न तो कुछ भला नवगीत का होगा और न ही नवगीतकारों का। मुझे ऐसा लगता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी की बात आज पहले से अधिक प्रासंगिक है कि,"पंडित सोइ जो गाल बजावा।" नवगीतकार बंधु बुरा न मानें तो एक बात और कह लेने की इच्छा है कि जिन आलोचकों द्वारा लोकगीतों को मूल्यांकित किया गया उनमें समाई लोक जीवन की संपृक्तता को सराहा गया ,उन्हीं से नवगीत उपेक्षित क्यों हुआ?ऐसे विषयों पर कभी विमर्श रखवाइए । मंचों की क्या है ?उन्हें उखाड़ने में ऊर्जा खर्चकरने से बेहतर है सार्थक चर्चाएँ-परिचर्चाएँ आयोजित की जाएँ। विमर्शकारों या नवगीतकारों की सूची तैयार हो तो मुझे अवश्य अवगत कराया जाए। कुछ न होगा तो उसे इस नाचीज़ के द्वारा अगड़म-बगड़म तरीके से समेटे जा रहे 'हिंदी साहित्य का सरल और संक्षिप्त इतिहास' में ही ले किया जाएगा। आगे नाम छूटने के कारण गाली खाने से बच जाएंगे । यह मज़ाक में नहीं , गंभीरता से स्वीकार किया जाएगा तो अच्छा लगेगा।
August 26 at 11:42am · Like · 1

Jagdish Vyom नवगीत के लिए यह सब कुछ हो रहा है, लखनऊ में प्रतिवर्ष दो दिवसीय नवगीत विमर्श का आयोजन होता है..... नवगीत पर केन्द्रित गम्भीर चर्चा होती हे, पहले से विषय दिये जाते हैं..... नये लोगों के लिए "नवगीत की पाठशाला" है,.... नवगीत पर घर बैठे विमर्श करना चाहते हैं तो यह मंच "नवगीत विमर्श" है ही..... .
August 26 at 4:05pm · Edited · Like · 1

Bhartendu Mishra दिल्ली सहित कई विश्वविद्यालयो मे नवगीत पाठ्यक्रम मे लगाये जा चुके हैं।हिन्दी कविता के इतिहास मे उसे कितनी मेहनत के बाद लोग शामिल करा पाये ,यह पुराने विद्वानो के अलावा- प्रो विष्णु विराट(अब स्व.) प्रो राजेन्द्र गौतम सरीखे विद्वानो से पूछिए।कई जगह शोध हुए और अभी लगातार शोध हो रहा है।..हिन्दी का नया शोधार्थी नवगीत को सीरियसली लेने लगा है।अब यह नयी पीढी को तय करना है कि वह प्रपंची मंच चाहती है जहां जम जाने के बाद पैसा ही पैसा है। या जन सरोकारो की प्रतिबद्ध कविता धारा का विकास जिसमे-स्त्री, किसान मजदूर की श्रमश्लथ चेतना को मांजने का प्रयास हो चाहे स्वय्ं ही कुछ खर्च करना पडे ।..ये विमर्श भी किसी के लिए जीवन मरण का प्रश्न हो सकता है किसी अन्य के लिए तफरी का साधन।
August 26 at 7:08pm · Edited · Unlike · 4

Jagdish Vyom जी भारतेन्दु जी, उन सभी के प्रति आभार.... जिन्होंने नवगीत की गरिमा को बढ़ाया है
August 26 at 6:23pm · Like · 1

Brijesh Neeraj निराला का उदाहरण देकर अपनी खाल बचाने की कोशिश न की जाए। अपनी प्रतिबद्धताएँ भी देखें। निराला की सी प्रतिबद्धता है क्या आपमें? आदम गोंडवी सा साहस है? सच लिजलिजा नहीं होता। पैसे के लिए जीभ नहीं लपलपाता। आज का मंच वो मंच नहीं है जो 1947 के पहले था। संवेदना को अपने लिए सहेज के रखें। सच कहने की कितनी ताकत है यह बताएँ। जिनको उदाहरण बनाते हैं उनकी ताकत को भी समझिए। पाठक पर भी उंगली उठा देते हैं आप। वह गंभीर बिम्ब संकेत नहीं समझता। अज्ञेय प्रसाद महादेवी निराला अदम त्यागी इन सबको क्या सिर्फ आप पढ़ते हैं? विश्वास की तरह जो अपनी दुकान चलाना चाहते हों वे मंचों पर जाएँ कौन रोकता है लेकिन वे घटिया साहित्य को प्रश्रय देने वालों में ही शामिल किए जाएँगे।
August 26 at 10:32pm · Unlike · 1

Ranjana Gupta मैं भी अपनी बात रखना चाहूँगी,अभी मुझे मध्यप्रदेश में एक सम्मान समारोह में जाना पड़ा,मैंने कभी भी गोष्ठियो के सिवा कही कविता नही पढ़ी थी ,मुझसे विशेष आग्रह किया जा रहा था ,मंच पाठ लिए ,मैंने संचालक से कहलवा दिया कि मैं मंचीय कवि नही हूँ ,बस कुछ नव गीत ही पढ़ सकूँगी..मुझसे पहले एक दो मंचीय कवि पूरी तरह से सुंदर गायन शैली में मंच और श्रोताओ को मुग्ध कर चुके थे खूब तालियां बजी ,मैं नर्वस थी ...पर मैंने अपना काम किया मैंने अपने दो तीन नवगीत सधी भाषा में ,पढे चूँकि मुझे गायन नही आता, अतः कुछ विद्वत जनो को मेरे नवगीत बहुत अच्छे लगे...पर मैंने अनुभव किया, कि मंच अवश्य राग और गला माँगता है उन्हें शब्दचयन ,उत्कृष्टता से अधिक संगीतात्मकता से लगाव है ,मंच पर निसंदेह वही सफल कवि माना जायेगा जो काव्य पाठ जैसा भी करे ,पर गीतात्मकता समां बाँधने वाली होनी चाहिए,मेरे कहने का तातपर्य केवल यही है, कि मंच श्रेष्ठ विकल्प नही है ,स्तरीय काव्य पाठ या नवगीत के लिए ,वहाँ आधे से अधिक संख्या आमजन की होती है जो प्रतीकात्मक्ता बिम्ब विधान को ,लक्षणा ,व्यंजना को अधिक आत्मसात नही कर पाते.. वे एक खास किस्म के मनोरंजन के लिए वहाँ जाते है,और वह मनोरंजन उन्हें एक खास किस्म का कवि समुदाय ही दे सकता है...पहले की बात और थी पहले साहित्य का सुनने समझने का स्तर और था...।अदम गोंडवी ,निराला ,फ़िराक आदि का वह न मंच है न समय ...!
Yesterday at 8:32am · Edited · Like · 4

Brijesh Neeraj उद्देश्यहीन साहित्य मनोरंजन का ही साधन रह जाता है। मनोरंजन करके पैसे कमाए जा सकते हैं।

००००

Jagdish Vyom
July 28 · Edited
===== विमर्श के लिए नवगीत [28-07-2015]=====
यह एक नवगीत है जिसके रचनाकार का नाम नहीं दिया जा रहा है, यदि आप रचनाकार का नाम जानते हैं तो यहाँ न लिखें... विमर्श चलने तक.... इस नवगीत पर अपनि टिप्पणी लिख सकते हैं..... झुनियाँ पर केन्द्रित यह नवगीत अपने उदर में क्या-क्या छिपाये हैं ...... रचनाकार का नाम विमर्श समाप्त होने के बाद बताया जायेगा ------
==========
कंडे बीन रही है
झुनियाँ देखो सूखे ताल में
आग बरसती, लू चलती है
कितनी तेज न जाने
अपना काम इसे सौंपा है
विधवा बूढ़ी माँ ने
बात-बात में चित हो जाती
पाँच रुपल्ली में सो जाती
जैसे इसकी माँ सोती थी
कभी पाव भर दाल में
वही गाँव है, वही लोग हैं
वही पुराने किस्से
साझे की मिल्कियत सरीखी
झुनियाँ सबके हिस्से
नहीं चाहती फिर भी इसको
मार-पीट कर लातों-मुक्को
बाँह पकड़ कर ले जाते हैं
अरहर और पुआल में
नीचे ढकी तो ऊपर नंगी
ऊपर ढकी तो नीचे
जैसे कोई ऊसर जोते
सौ-सौ पानी सींचे
मेहनत का फल कभी न पाती
खून पसीना रोज बहाती
बादल देख पपीहा रोये
जैसे घोर अकाल में
रोटी इससे दूर भागती
किस्मत ऐसी खोटी
आदमकद कुत्तों के आगे
इसकी बोटी-बोटी
अक्सर शहर गई बेचारी
इसी गाँव-घर की बलिहारी
जाने कितनी बार अभागिन
कुचिला खाती साल में
=========

e   Comment
Brijesh Neeraj, Awanish Tripathi, Seema Harisharma and 17 others like this.

सीमा अग्रवाल मुझे नहीं मालूम गीत किसका है । गीत जिस विषय पर है वो स्पष्ट है । पर एक ही बात थोड़े शब्द बदल कर हर बंद में दोहराई गयी है । कविता में बात सांकेतिक होनी चाहिए विशेषकर इतने सवेदनशील विषय पर ।
बात भले ही सच हो पर गीत की दृष्टि से कई शब्दों ने मुझे असहज किया । कथ्य की क्लिष्टता और सम्वेदना को गीत के मूल स्वभाव के अनुरूप ही अनुवादित होना चाहिए ।
गीत सहज और कोमल भावाभिव्यक्ति यही उसका मूल आकर्षण है ।यथार्थ कटु होता है निश्चित ही ।कड़वे सच को कोमलता के साथ सब तक पहुंचाने का काम नवगीत की जिम्मेदारी भी है और चुनौती भी ।
किसी वरिष्ठ गीतकार का गीत होने की दशा में मेरा कथ्य सादर और क्षमा सहित स्वीकार किया जाए ।
July 29 at 9:10am · Edited · Unlike · 5

Jagdish Prasad Jend प्रस्तुत गीत के रचनाकार का नाम तो मुझे नहीं मालूम लेकिन गीत में जिस सच का उल्लेख किया गया है उसके एक ही कथ्य को ही बार -बार दोहराया गया है। विधवा माँ की किशोर अवस्था की बेटी झुनिया को भी अपनी माँ की तरह ही देह अर्पित करके रोटी खाने को मिल रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि माँ को अपने समय में एक पाव दाल मिल जाती थी और बेटी को पांच रूपये में वही सब कुछ झेलना पड़ता है तथा सार्वजानिक संपत्ति की तरह उस बेबस पर बलात खेतों और पुआलों में वही सब कुछ किया जाता है। इस जबरदस्ती के परिणामस्वरूप उसे गर्भ समाप्ति के लिए गाँव में प्रचलित उपाय कुचला का सेवन करना पड़ता है।गीत के माध्यम से गीतकार ने ग्राम्य-जीवन के उस कडुवे सच को व्यक्त किया है जिससे गरीब,असहाय की बेबसी को कदम-कदम पर शिकार बनाया जाता है। यहां गीत में किसी प्रतिरोध का स्वर नहीं बल्कि नियति को स्वीकार लेने का ही वर्णन है। न ही किसी अन्य को इस अन्याय का विरोध करते हुए कोई संकेत दिया है। बस , उस परिवेश में इसे दबंगों के सामान्य व्यवहार की तरह दर्शाया है जिसका कोई विरोध नहीं करता और गरीब ,असहाय ,बेबस ,कमजोर व्यक्ति अन्याय सहने को अपनी नियति समझने को मजबूर है। प्रस्तुत गीत समाज को आईना दिखाता हुआ सफल गीत है किन्तु इसमें अतिरेक से बचा जा सकता था और इसकी जगह ग्राम्य-जीवन में अन्याय के कुछ अन्य रूपों का समावेश किया जा सकता था। -जगदीश पंकज
July 29 at 12:27pm · Unlike · 5

सीमा अग्रवाल सहमत हूँ जगदीश जी आपकी बात से
July 29 at 12:45pm · Edited · Like · 1

Ranjana Gupta नवगीत एक शालीन और सहज परिवेश की रचना करे,तो ही सर्वग्राह्य हो सकता है,कुछ तो असहजता हैं,नवगीत बहुत कठोर सत्य कह रहा है!और कदाचित इससे भी कड़वे परिवेश में यथार्थ है !सब कुछ न कह पाना शब्दों में नवगीत की सीमा हो सकती है!उसके लिए साहित्य की और विधाएँ है!सादर !
July 29 at 8:39pm · Unlike · 2

Saurabh Pandey नवगीत के कथ्य में घटना या व्यवहार विशेष को लेकर जो बारम्बारता बनी है वह वर्णित पात्र (झुनिया) की परिस्थितियों से पाठक मन को ठस्स कर देती है. गीतकार का हेतु यह भी हो सकता है कि ग्रामीण परिवेश के जुगुप्साकारी यथार्थ से पाठक किसी तौर पर निर्लिप्त न रह जाये और उसका सिर फटने लगे. यह ऐसी प्रस्तुतियों, विशेषकर रचनाकार, की या तो सीमा हो सकती है, या फिर गीतकार दुर्दशा को अमूमन घटने वाली घटना बताते हुए पाठकों (श्रोताओं) को इसके विरुद्ध तत्पर हो जाने के लिए उकसाना चाहता है. ग्रामीण परिवेश में जिस तरह से ताकतवालों की दबंगई चलती है, उसकी ओर ध्यान खींचना भी उद्येश्य है. जातिभेद पुरुषों-पुरुषों और स्त्रियों-स्त्रियों के बीच का व्यवहार है, इस छुपे तौर पर कहे जाने वाले तथ्य को रचनाकार कायदे से पाठक के मन में बिठा देना चाहता है. कि, झुनिया की जाति कारण विशेष में उन ’श्रेष्ठ’ पुरुषों के लिए मायने नहीं रखती. यानी, झुनिया ’अस्पृश्य’ नहीं है !
या फिर, हो सकता है यह नवगीत ऐसे परिवेश में सुनाये जाने केलिए विशेष तौर पर रचा गया हो जहाँ ऐसे कदाचार आम व्यवहार का हिस्सा हों.
आर्थिक रूप से लाचार तथा त्रस्त, दैहिक रूप से पीड़ित, जाति के तौर शोषित तथा भौतिक रूप से भोग्या झुनिया जैसे पात्र किन शर्तों पर जीते हैं वह इन पंक्तियों से भी स्पष्ट है - अक्सर शहर गयी बेचारी / इसी गाँव-घर की बलिहारी.
गाँव की दुनिया का स्याह पक्ष इस नवगीत में यदि वाचाल है तो इसका एक और कारण हो सकता है. वह है इसकी अंतर्धारा मंचीय है.
हाँ, एक बात अवश्य साझा करना चाहूँगा कि कटु और विद्रूप यथार्थ कोमल शब्दों से अभिव्यक्त नहीं होने चाहिये. यह नवगीत केलिए चुनौती नहीं है. लेकिन यह भी सत्य है कि नवगीत गालियों में बात न करने लगें, इसके प्रति भी सभी गीतकार अवश्य सचेत रहें.
July 30 at 2:58am · Unlike · 1

Kamlesh Kumar Diwan jaise koi usar jote so so pani siche bahut sundar bhavpoorn or ek brihat shavadchitra parstut kara geet hai rachnakar ko dhanyabad
July 30 at 6:40am · Unlike · 1

Bhartendu Mishra किसी कवि के अनुभव को किसी विधा के लिए कभी अनुचित नही माना जा सकता।नवगीत मे आरती और पूजा/उत्सव आदि के ही या फिर काल्पनिक नैतिकता के ही भाव क्यो आने चाहिए ?..तो किसी साहित्य की विधा पर विषयगत कोई पाबन्दी नही होती।दूसरी बात ये है कि इस गीत का यथार्थ एक संघर्ष करती महिला के अस्तित्व का सवाल उठाता है क्या हमे उसकी संवेदना के करुण प्रसंग पर ध्यान नही देना चाहिए?..क्या हमारे समाज को ये सच्ची सामाजिक विसंगतियां देखकर आंखे मूद लेना चाहिए। कदापि नही।..देखें प्राचीन काव्यशास्त्री राजशेखर ने आख्यानकवान मुक्तको मे ऐसे अनेक कथात्मक कविताओ की चर्चा की है।..तो इस नवगीत का स्वागत है इस जैसे अनेक नवगीतो का स्वागत है।
August 2 at 11:20am · Unlike · 5

Laxmi Shankar Bajpai sach kadwa hota hai .. kroor sach aur bhi kadwaa...
August 2 at 1:57pm · Unlike · 2

Jagdish Vyom इस नवगीत पर नचिकेता जी की टिप्पणी है--
" .... नवगीत में झुनियाँ गाँव के दबंगों के अमानवीय अत्याचार, बलात्कार और दैहिक शोषण के आगे अपना आत्मसमर्पण कर देती है तथा रचनाकार के मन में स्त्री जाति पर पुरुष-सत्ता (दबंगों और लफंगे जमींदार-पुत्रों) के द्वारा किए गए अमानवीय अत्याचार पर कोई करुणा, घृणा या आक्रोश का भाव नहीं जागता, उल्टे वे झुनियाँ की बेबसी को उसका पुश्तैनी धंधा बतलाकर अपने सामंती और पूँजीवादी सोच को उजागर करने का पुनीत काम करना ज्यादा जरूरी समझते हैं। आगे वे झुनियाँ को "सेक्स-वर्कर" बनाकर अपनी बौद्धिक खुजलाहट भी शांत करते हैं..... इस नवगीत में स्त्रियों पर की जा रही ज्यादती और अमानवीय अत्याचार में पूरा गाँव, बल्कि समाज शरीक हो जाता है, इसके खिलाफ कोई आक्रोश या प्रतिरोध का स्वर नहीं उभरता।"
-नचिकेता
August 2 at 3:56pm · Like · 4

Shiv Murti Tiwari नचिकेता जी से सहमत हूँ।।नवगीतकार दबंगों की क्रूरता को दुत्कारता नहीं है बल्कि ये कहता हुआ प्रतीत होता है कि पाव भर दाल माँ की मजबूरी थी तो पाँच रूपया झुनिया की।पता नही क्यों हम सब विद्रुपता, बेचारगी चित्रित कर च च च बेचारी कहकर *अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी * वाली भंगिमा आ जाते हैं। " मैने उसको जब देखा,लोहे जैसा गलते देखा,ढलते देखा-------------गोली जैसा चलते देखा" वाली भंगिमा कवि प्रजापतित्व वाली भूमिका के लिए ज्यादा जायज है।।
सुधीजन मै कवि नही हूँ ना ही नवगीत विधा निष्णात हूँ अतः किसी भी अतिकथन हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ ।।
August 2 at 4:55pm · Unlike · 4

Jagdish Vyom साहित्यकार का कार्य किसी अनैतिक कार्य को ज्यों का त्यों दिखाना या उसमें आनन्द लेना नहीं होता है.... कुछ और भी होता है......
August 2 at 5:32pm · Like · 6

Bhartendu Mishra यह मालूम भी हो जाये कि वे कौन सी परिस्थितियां रही होंगी जिनके कारण झुनिया ने दबंगो के सामने आत्मसमर्पण किया। तो भी यह एक काल्पनिक स्थिति है ।कविता/डाक्यूमेंटेशन से अलग होती है।वह संपूर्ण सत्य या सत्य घटना नही होती।झुनिया जैसे पात्र का यथार्थ चित्रण करना बिना करुणा के संभव नही है। संवेदनशील कवि- पत्रकार नही है जो चटकीली खबर बनाकर कमायी करना चाहता है।..बहरहाल ये किसकी रचना है मालूम नही ..।
August 2 at 7:22pm · Unlike · 5

Saurabh Pandey रचनाकार संवेदनशील है, इसके कई विन्दु जहाँ-तहाँ हैं रचना में. किन्तु इस रचना में संवेदना यथार्थबोध के फेर में वैसी प्रभावी नहीं हो पायी है. इसका ज़िक्र हमने अपनी उपर्युक्त टिप्पणी में किया है.
August 2 at 8:34pm · Edited · Unlike · 2

Ved Sharma भारतेंदुजी से सहमत हूँ ....यह गीत नवगीत कितना है/?
August 2 at 9:49pm · Like

सीमा अग्रवाल निश्चित रूप से झुनिया समाज में मौजूद हैं । समस्या भले ही सामाजिक है पर एक स्त्री से जुडी है अतः एक स्त्री प्रस्तुत विषय के प्रति अधिक सम्वेदनशील हो सकती यह बात भी उतनी ही सच है जितनी यह समस्या ।
एक बलत्कृत महिला जांच पड़ताल के समय उठाये गए प्रश्नो से जिस तरह बार बार बलत्कृत होती है । रचना की भाषा बंद दर बंद मुझे वैसी ही होती प्रतीत हुयी ।
रचनाकार का संवेदनशील होना ज़रूरी है पर भाषाई सम्वेदनशीलता भी आवश्यक है । विशेषकर इस तरह के विषयों में ।
विषयवस्तु नवगीत के मर्म को छू रही है पर मेरी आपत्ति भावों के दोहराव और अति पर है साथ ही प्रयुक्त भाषा संयत की जा सकती है ।
August 2 at 11:40pm · Unlike · 2

Ganga Pd Sharma 'झुनियाँ'हमारे समाज की 'नंगी सच्चाई है'जिसे 'कभी ऊपर से तो कभी नीचे से' ढँकने के नकली प्रयास होते रहे हैं। इस नवगीत में लीक से हटकर विषय का चयन इसे उसी तरह नवगीत से अलग करता है जैसे 'नवगीत'खुद को गीत से अलगाने में सफल हुआ था।इसे नव गीत क्यों 'जन गीत'क्यों न कहा जाए। एक गीत जो जनचेतना से जुड़ जाता है,वह गीत की निजता को लोक अर्पित कर देता है। मेरी दृष्टि में जहाँ स्वानुभूति सार्वजनीन अनुभूति हो जाती है, उसे जन गीत कहना ही ठीक प्रतीत होता है।वह पेट की अग्नि के शमन के लिए आग बरसाती लू में 'कंडे बीन रही है'न कि ,'पाँच रुपल्ली में सो 'जाने के लिए वहाँ गई है।उस आग में भला कौन सोएगा । वह तो उन पेट भरों का शिकार है, जिनकी पेट से नीचे की ज्वाला का कोई ओर-छोर नहीं है।
'झुनियाँ'की हर विवशता इन्हें उसके पास की पहुँच को थोड़ा-थोड़ा आसान करती जाती है।इनके पास वासना की शांति के लिए पाँच रुपए हैं पर किसी की भूख के शमन के लिए कानी कौड़ी इनके पास से नहीं निकलेगी। इनकी वासना की ज्वाला इतनी तीव्र है कि हर झुनियाँ षड्यंत्र पूर्वक इतनी गरीब बनाई जाती है कि वह कंडे बीनने को विवश हो और वह सूखा ताल इनका प्रणयगाह बन सके ।मत्स्यगंधा से रमन के लिए वासनान्ध पाराशर के लिए कुहरा उत्पन्न करने जैसी विवशता झुनियाँ को भोगने वालों के सामने नहीं है । यहाँ तो भूखे पेट ने उसके लोकलाज को खा लिया है और वासना ने उसके भोगी की लोकलाज को। मज़े की बात यह है कि निर्दोष और विवश झुनियाँ ही दोषी मानी जाती है -"बात-बात में चित हो जाती
पाँच रुपल्ली में सो जाती
जैसे इसकी माँ सोती थी
कभी पाव भर दाल में।"

'झुनियाँ'को साझे की मिल्कियत बनाने वाले समाज ने 'उसका मनचाहा उपयोग किया है। अवधी में एक कहावत है 'निबरेक जोइया सबकी सरहज'। झुनिया उसी तर्ज़ पर सबकी भोग्या है क्योंकि वह गरीब है। वह जानती है कि अगर वह पाँच रुपए में नहीं सोएगी तो इन बेसब्रे भूखे भेड़ियों के आगे मुफ्त में सोना पड़ेगा ।वह विरोध नहीं करती। विरोध करने का भी परिणाम जानती है। शिकायत करने थाने जाएगी तो वहाँ भी उसे वही भोगना है जो यहाँ । वह समझौते करने के लिए विवश की जाती है। मूँड़े जाने के पहले भेंड की तरह घेरी जाती है झुनियाँ " वही गाँव है, वही लोग हैं
वही पुराने किस्से
साझे की मिल्कियत सरीखी
झुनियाँ सबके हिस्से।"अगर घेरे से बाहर आने के प्रयास करती भी है तो लातों-घूसों से उसे बेदम किया जाता है फिर गिराया जाता है,मूँड़ने के लिए- "नहीं चाहती फिर भी इसको
मार-पीट कर लातों-मुक्को
बाँह पकड़ कर ले जाते हैं
अरहर और पुआल में"उस ठूठियों वाली अरहर और पुआल में वह आदमक़द कुत्तों की शिकार होती है। उसकी बोटी-बोटी नोची जाती है।यही विडंबना है जो झुनिया को विरासत में मिली है। उसकी माँ पाव भर दाल पर लुटने और नुचने को विवश थी और यह पाँच रुपए में। उस पाँच रुपए में जिसमें आज पचास ग्राम भी दाल नहीं आती। यह जन गीत अपनी सहज संवेदना के झुनियाँ जैसे जन चरित्र के माध्यम से हमारे समाज की उस ढकी विडंबना से कपड़ा हटाता है जो जाने कबसे अहल्या की तरह पाषाण बनी बलात्कृता पड़ी थी।
August 3 at 3:15pm · Unlike · 5

सुधीर कुमार मैं कोई नवगीतकार नहीं हूँ पर कविता की व्यंजना को समझता हूँ... आश्चर्य है कि इसे अच्छा नवगीत और जनगीत तक कहा जा रहा है.... कवि के शब्दों पर ध्यान दें वह इसकी बेबसी का मज़ा ले रहा है.... क्योंकि मंच पर यही सबसे अच्छा बिकता है.... वह साफ साफ बता रहा है कि झुनियाँ पेशेवर है-
"अपना काम इसे सौंपा है
विधवा बूढ़ी माँ ने..."
यानी उसकी माँ का जो काम था वह उसकी माँ ने इसे सौंप दिया है क्योंकि वह बूढ़ी हो गई है--- और अब झुनियाँ ने अपना काम शुरू कर दिया है.... वह क्या काम है वह भी देखें कवि की दृष्टि से --
"बात-बात में चित हो जाती
पाँच रुपल्ली में सो जाती "
कवि ने और स्पष्ट कर दिया कि वह वही कार्य कर रही है जो उसकी माँ करती थी..... यानी कवि ने उसका पुश्तैनी पेशा बता दिया......
"जैसे इसकी माँ सोती थी
कभी पाव भर दाल में "
यग गीत मंच को रिझाने और सस्ती लोकप्रियता के लिए लिखा गया है... इसे नवगीत कहना भी ठीक नहीं है.... जनगीत तो भला हो ही नहीं सकता
August 3 at 5:37pm · Unlike · 2

Bhartendu Mishra एक ही रचना के समय और परिस्थिति के आधार पर अनेक अर्थ और अभिप्राय हो सकते हैं। यह गीत किस उद्देश्य से लिखा गया यह जानना उतना आवश्यक नही जितना उसके पाठ्य को लेकर हमारी चिंता होनी चाहिए।कवि जिस उद्देश्य को लेकर चलता है जरूरी नही कि उसे पाठक समुदाय/विद्वतमंडली भी उसी परिप्रेक्ष्य मे देखे।
August 3 at 5:53pm · Unlike · 2

Ganga Pd Sharma सुधीर कुमार जी !आपने कविता की व्यंजना को समझने का जो दावा किया है ,वह मेरी समझ से उसी तरह परे है जैसे झुनियां की समझ से पाँच रूपल्ली वाले उसके खरीदार । आप भी कमाल के हैं । 'झुनिया की माँ उसे भेजती है।' शायद आप इकलौते चश्मदीद गवाह हैं।यह कविता अगर अदालत गई तो आप बड़े काम के सिद्ध होंगे। वैसे साहित्य को क़ानूनी दस्तावेज़ की तरह देखने में रचना और रचनाकार दोनों के साथ अन्याय भी हो सकता है मान्यवर !कहीं आप वकील तो नहीं हैं?
August 3 at 6:09pm · Like · 1

सुधीर कुमार गंगा प्रसाद जी, आप इतने क्यों नाराज हो रहे हैं, गीत के शब्दों को फिर से पढ़ लीजिये.... चलिये आप की समझ को ही मान लेता हूँ... आप इस पंक्ति का आशय बता दीजिये.... "अपना काम इसे सौंपा है विधवा बूढ़ी माँ ने..." और फिर इसके तुरन्त आगे की पंक्तियाँ भी पढ़ लीजिये ..... " बात-बात में चित हो जाती....."
August 3 at 6:32pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra सुधीर जी मंच के मस्खरो की बाते क्या कीजिए,,असल मे यह नवगीत विमर्श की दृष्टि से बातचीत हो रही है।..हम आप किसी को कुछ भी अर्थ लगाने से रोक तो नही सकते।एक मंचीय गीतकार छाती ठोककर भुजाए फैलाकर गाते थे-मेरे देश को बचा लो मेरी जान ले लो रे।-इन पंक्तियो को जब पाठ्य की तरह देखा जाएगा तो उस कवि शायद देश भक्त मान लिया जाएगा।..जबकि वो शुद्ध मंचीय नौटंकी थी।..विमर्श मे ये नौटंकीबाज या ऐसे कवियो को कोई सार्थक रूप मे नही लेता।..ऐसे कवि स्वय्ं ही अस्त हो जाते हैं।
August 3 at 6:50pm · Unlike · 2

Ved Sharma n
August 3 at 9:49pm · Like

Ved Sharma नवगीत विमर्श से पहले यह देख लें यह नवगीत है या नही मुझेतो यह ठीक सा गीत भी नही लग रहा है खबर जैसा naration केवलत ुकबंदियों में लाचारी को परोस करक ्या गीत होजाता है?
August 3 at 9:59pm · Unlike · 1

Ranjana Gupta सहमत वेद जी, तुकबन्दी को गीत की शक्ल दी गयी है,मै किसी को कोई आरोप नही दे रही बस मेरी व्यक्तिगत राय है,कि बहुत खुलापन साहित्य को काम शास्त्र के करीब ले जायेगा !मुझे सत्य का घिनोना विकृत रूप नही स्वीकार ,क्या कसाई खानो का भी सत्य हम इस तर्क के कारण सबके सामने ला सकते है? नही लाएंगे !तो फिर इस रूप में नारी की बेबसी का चित्रण क्यों? और यदि कहना ही था तो कहानी ,उपन्यास बहुत सी विधाएँ है ?नवगीत को छुपे और सांकेतिक प्रतीकों से अपनी बात कहनी चाहिए !
August 3 at 10:46pm · Edited · Unlike · 2

जन विजय यह एक बेहद अच्छा नवगीत है। और जिन लोगों को यह गीत नहीं लग रहा या बेकार की बकवास लग रहा है, मुझे उन लोगों की समझ पर दया आ रही है।
August 3 at 10:51pm · Unlike · 2

Jagdish Vyom धन्यवाद आप सभी की महत्वपूर्ण टिप्पणियों के लिए...... यह कैलाश गौतम का नवगीत है।
August 4 at 8:53am · Like · 1

Ganga Pd Sharma आदरणीय सुधीर कुमार जी! बात आप व्यंजना को समझने की कर रहे हैं और अर्थ अभिधा में ले रहे हैं."अपना काम इसे सौंपा है विधवा बूढ़ी माँ ने..." और फिर इसके तुरन्त आगे की पंक्तियाँ भी पढ़ लीजिये ..... " बात-बात में चित हो जाती....."। इसमें यही विडंबना है कि 'झुनियाँ'को भी उसी नियति को भोगना पड़ता है जो कभी उसकी माँ भोगती थी। यहाँ झुनियाँ व्यक्ति नहीं विवशता है। उस गरीबी की प्रतीक है जो हर अमीर की सहज भोग्या है। 'झुनियाँ'के "बात-बात में चित हो जाने''की बात को अभिधा में लेने से इस का मर्म ही विखंडित हो जाएगा। इस तरह के अर्थों से तो वह आगे भी पाठकों के बौद्धिक बलात्कार का पुनः -पुनः शिकार होती रहेगी। कैलाश गौतम जैसे समर्थ गीतकार में इतनी समझ तो रही ही होगी कि वे कहना क्या चाह रहे हैं और गीत में वह कहा जा सका है या नहीं?
August 4 at 9:45am · Unlike · 3

सुधीर कुमार आदरणीय गंगा प्रसाद शर्मा जी, अभिधा का अर्थ अभिधा में ही ग्रहण किया जाता है, सामान्य जन तो अभिधा का अर्थ अभिधा में ही लगाता है हाँ अति विद्वान और कूटनीति के पुरोधा अवश्य ही अभिधा का अर्थ व्यंजना में खोजकर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते रहे हैं..... कवि कालिदास का प्रसंग इसका उदाहरण है .... कालिदास ने विद्योतमा के लिए अँगुली का संकेत अभिधा में किया था परन्तु कूटनीतिज्ञों ने उसका अर्थ व्यंजना में लगा दिया और एक अर्थ का अनर्थ कर दिया...... इस नवगीत की भी वही स्थिति है.... कैलाश गौतम जी को यह गीत मंचों पर चटखारे लेकर पढ़ते हुये और श्रोताओं को सतही और बेशर्म आनन्द लेते हुए मैंने भी कई बार देखा और सुना है..... शायद रचनाकार का नाम आपको पहले से पता रहा होगा अन्यथा आप रचना में अभिधा की जगह व्यंजना नहीं खोजते....
August 5 at 9:11am · Edited · Unlike · 2

Ganga Pd Sharma सुधीर कुमार जी !आप कैलाश गौतम के मंचीय पाठ के आधार पर अर्थ लगा रहे हैं कि भावक (जनता के )के द्वारा आत्मसात रस के आधार पर? गीतकार चटखारे लेकर पढ़ रहा था या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है। आपके देखे हुए क्षण विशेष में कैलाश गौतम दूषित हो सकते हैं लेकिन रचनाकाल के गौतम दूसरे भी हो सकते हैं,संभवतःनिष्कलुष ।कैलाश गौतम के निजी जीवन और चरित्र के किसी घटनाक्रम से अगर आप परिचित हों तो उसे कृपया इस गीत पर आरोपित न करें। गाँव के समर्थों को ध्यान में रखकर गीत पर गौर करें तो झुनियाँ का चरित्र पाठ में कहीं से दूषित नहीं दिखता। आजतक मैंने किसी गाँव में कोठे नहीं देखे । इसलिए झुनियाँ को वेश्या के समकक्ष रखना ग्रामीण संस्कृति का अपमान है। दबंगों से देह शोषण के बावजूद देह व्यापार गाँव की वृत्ति अब तक नहीं बनी है तो हमारे या आपके चाहने से यह वृत्ति नहीं आ जाएगी । वेश्यावृत्ति शहरी संस्कृति है ग्रामीण नहीं।इसपर पुनः गौर करें तभी रचना के साथ न्याय होगा। वैसे आप अपनी मर्जी के मालिक हैं और मैं अपनी। आपकी या मेरी निजी राय से इस गीत का न तो पाठ बदलने वाला है और न भाष्य।मान्यवर! इस पर टिप्पणी करते समय मैं बिल्कुल नहीं जानता था कि यह किसका गीत है और जानता भी होता तो भी यही अर्थ लगाता ।
August 6 at 9:07am · Unlike · 4

Jagdish Prasad Jend इस गीत पर काफी विमर्श हो गया है तथा इसके गीत या नवगीत होने के बारे बारे में भी सुधीजनों ने विचार व्यक्त किया हैं। रचना पर अभिधा ,लक्षणा और व्यंजना के अनुसार अपने-अपने अर्थ और आशय निकालकर रचनाकार के व्यक्तित्व और मानसिकता पर भी प्रश्न उठा कर स्वयं ही उत्तर गढ़ लिए गए हैं। बहरहाल ,इसे कुछ भी मान लीजिये किन्तु यह एक ऐसी कृति तो है जो किसी सामाजिक यथार्थ के विद्रूप को व्यक्त कर रही है। अभिव्यक्ति के अतिरेक के बारे में मैंने अपनी समझ से अपनी पूर्व की टिप्पणी में उल्लेख किया है। रचना की सम्प्रेषणीयता को ध्यान में रखते हुए किसी भी रूप में 'झुनिया' गीत में अपने आप खुद को अर्पित नहीं कर रही बल्कि उसकी बेबसी उससे यह अन्याय सहन करा रही है। ऐसी रचना की व्याख्या करते हुए यह आवश्यक है कि रचनाकार के आशय और पक्षधरता को समग्रता में समझा जाये। प्रस्तुत गीत की अभिधा को ही लें तो कवि ने कहा है ,'' कंडे बीन रही है/झुनियाँ देखो सूखे ताल में/आग बरसती, लू चलती है/कितनी तेज न जाने/अपना काम इसे सौंपा है /विधवा बूढ़ी माँ ने'' कवि आगे उसी सत्य को कह रहा है कि यह यौन शोषण उसकी माँ के समय में भी इसी प्रकार चलता था और उस गाँव में अन्याय का रूप नहीं बदला है। झुनियाँ के साथ क्या हो रहा है ,''नहीं चाहती फिर भी इसको/मार-पीट कर लातों-मुक्को/बाँह पकड़ कर ले जाते हैं/अरहर और पुआल में''… ''मेहनत का फल कभी न पाती/खून पसीना रोज बहाती''…रोटी इससे दूर भागती/किस्मत ऐसी खोटी/आदमकद कुत्तों के आगे/इसकी बोटी-बोटी ''…''जाने कितनी बार अभागिन/कुचिला खाती साल में''. पूरे गीत में झुनियाँ की विवशता और दबंगों की कुत्सित वासना का चित्रण करते हुए कवि की सहानुभूति पीड़ित झुनियाँ के साथ है तथा गाँव के दबंगों के( आदमकद कुत्तों के )कुकृत्यों के विरोध में है। यह सही है कि हर व्यक्ति किसी रचना का अपनी समझ के अनुसार अर्थ करने को स्वतंत्र है किन्तु कुतर्क के द्वारा अनर्थ नहीं करना चाहिए। -जगदीश पंकज
August 6 at 10:22pm · Unlike · 6

Shivanand Singh Sahyogi बहुत खूब
August 23 at 12:11pm · Like

Brijesh Neeraj यह रचना समाज के सच को व्यक्त कर रही है। यथार्थ इतना ही कड़वा और नंगा है। रही प्रतिरोध की बात तो प्रतिरोध का विकल्प है क्या उसके पास। दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने वाला किस कीमत पर प्रतिरोध करेगा? समाज की हकीकत से भी रू ब रू होइए।
Yesterday at 10:03am · Like

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Kumar Ravindra
August 20 at 3:48am
बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में हुए दो महायुद्धों ने योरोप की मानसिकता को पूरी तरह पदार्थवादी, भोगवादी, आशयमुक्तऔर मूल्यहीन बना दिया, जिसमें मनुष्य की मूल पहचान यानी उसकी संवेदनात्मक और रागात्मक संचेतना के लिए कोई स्थान नहीं रह गया | बंजर-हुए मानुषी संज्ञानों की परिणति हुई उस तथाकथित यथार्थवादी भटकन में, जिसमें मनुष्य की पाशविक-आसुरी चेष्टाओं को ही एकमात्र एवं अंतिम सत्य मान लिया गया | ऐसे में कविता ही एकमात्र ऐसी चिन्तन-शैली बची, जिसके माध्यम से मानुषी संज्ञान के सूख- रहे रस-स्रोतों की तलाश की कोशिश ज़िंदा रही | प्रथम महायुद्ध की विभीषिका के अहसास से उपजी अंग्रेजी भाषा की प्रसिद्ध कविता 'वेस्टलैंड' में इसी संकट की बात को बड़े प्रखर ढंग से उठाया गया | उस कविता में है एक छद्म नगर, उसका एक नपुंसक सम्राट, उसमें रहते-भटकते-दैहिक क्षणिक उत्तेजनाओं में सुख तलाशते लोग, बंजर भूमि में मसीहे की अदृश्य पगचाप, चेतावनी देती, दिशाहीन होने को अभिशप्त कवि की नितांत एकाकी, एकान्तिक समझ और अंततः औपनिषदिक आख्या में कविता की परिसमाप्ति | यही है वह रूपक, जिसमें कवि टी.एस. एलियट ने हमारी वर्तमान विश्वव्यापी सभ्यता की त्रासक नियति का अंकन किया है | महायुद्ध की यह विभीषिका आज के अतिविकसित पदार्थ-जगत में घर-घर व्याप गयी है | बंजर होने का अहसास आज किस भूमि पर नहीं है | ऐसे में मूल जल के सोतों की खोज बेहद ज़रूरी हो गयी है | आज की संपूर्ण कविता एलियट के 'वेस्टलैंड' यानी बंजरभूमि के वासियों की पानी के सोतों, बरखा के मेघों की खोज के मानिंद है | ऐसे में गीत की रागात्मकता मनुष्य को रससिक्त करने-रखने की आखिरी कोशिश है |



You, अवनीश सिंह चौहान, कल्पना रामानी, Bhartendu Mishra and 6 others like this.

Ramakant Yadav यह भटकाने की कोशिश है।गीतकारों के पास अभी भी सत्य और तथ्य को देखने समझने महसूस करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है।संवेदना और उसकी प्रस्तति झूठी है।ऐसे में रागात्मकता भी झुठी ही होगी।मैं गीत को कविता का वेस्टलैंड मानता हूं।और यह वेस्टलैंड परिवर्तन के लिए यथार्थ की व्यापक समझ संवेदना औरमानवीय दृष्टि की मांग करता है।
August 20 at 9:45am · Unlike · 3

अवनीश सिंह चौहान आपकी साधना, आपका चिंतन, आपका लेखन, आपकी मौलिक सोच मुझे सदैव प्रेरणा और शक्ति प्रदान करती है। सादर नमन।
August 20 at 9:52am · Unlike · 3

Kumar Ravindra 'गीत को कविता का वेस्टलैंड' कहकर आपने उसकी यथार्थ की समझ को ही रेखायित किया है, बंधु रमाकांत यादव जी। इसी वेस्टलैंड में कहीं जल की रससिक्त धार अंतर्प्रवाहित है और उसी से छद्म यथार्थ की बंजरभूमि का संस्कार संभव है। यथार्थ के नाम पर वर्तमान कालखण्ड में काफी कुछ अयथार्थ परोसा गया है। आज के नवगीत की प्रमुख भंगिमा भोगवादी-पदार्थवादी अपसंस्कृति के उसी अयथार्थ का पर्दाफ़ाश करने की है।
August 20 at 11:00am · Edited · Unlike · 3

Ramakant Yadav कृपया भोगवादी पदार्थवादी अपसंस्कृति के अयथार्थ को और स्पष्ट करें तो बात बने।
August 20 at 11:08am · Unlike · 2

Bhartendu Mishra 2010 मे ये अंतिम नवगीत बन सका था ।शायद इसमे कहीं संवेदना को पदार्थ रूप मे ढलते देखा जा सके-आदमी के वास्ते ही /आदमी का सीढी बना है। मोल श्रम का है न कोई/ मोल बस बाजीगरी
लोग कुछ उलटे खडे हैं/वक्त है जादूगरी का
हमें खुश रहना मना है। जाति-भाषा वर्ग की/कुछ धर्म की भी सीढियां हैं खुश रहे शोषक सदा ही /दर्द सहती पीढियां हैं
साफ कुछ कहना मना है।
जब जिसे चाहो खरीदो/जब जहां चाहो लगा लो सीढियां चढकर उतरकर /वक्त को अपना बना लो।
जाल वैभव का तना है।(अनुभव की सीढी )
6 hrs · Edited · Like · 3

Brijesh Neeraj यथार्थ की स्वीकारोक्ति और लोक की पीड़ा की अनुभूति के बिना कविता में किसी संवेदना के उपस्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती।

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You, Jagdish Prasad Jend, Shailendra Sharma, Seema Harisharma and 3 others like this.

Shailendra Sharma यह 21वीं सदी है .साहित्य में इस तरह की असन्गत बातों से बचना चाहिये
July 5 at 9:18am · Unlike · 1

Jagdish Vyom गीत लिखने के बाद उसका पहला आलोचक खुद बनकर उसे परख लेना चाहिए.....
July 5 at 5:49pm · Like · 1

Jairam Jay geet ki pahli shart hai sahaj saral yatharth hona
July 7 at 6:15am · Edited · Unlike · 1
Jagdish Vyom
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Bhartendu Mishra
June 23
सुन्दर शृंगार गीत है बधाई।लेकिन यह नवगीत नही हैं। श्रंगार एक प्रकार से नैसर्गिक सनातन मूल्य है और इस विषय वस्तु पर अब से पहले करोडो की संख्या मे गीत लिखे जा चुके हैं।नवगीत विमर्श मे परंपरा मे भी नवता का अनिवार्य आग्र्ह होता है ।यदि वह नही दिखाई देता है तो उसे हम नवगीत कैसे कहेंगे।इस गीत की भाषा भी छायावादी काव्य भाषा से आगे बढी हुई नही दिखती है।आदरणीय शुक्ल जी का सम्मान करते हुए असहमत हूं।शुक्ल जी श्रेष्ठ नवगीतकार है लेकिन उनका यह गीत नवगीत नही लगता। इससे नई पीढी के नवगीतकारो...
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Nirmal Shukla, Saurabh Pandey, Shashi Purwar and 2 others like this.
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Manoj Jain Madhur कृपया वे कौन से मानक है जिनके आधार पर उक्त रचना को गीत संज्ञा से नवाज गया यह भी स्पस्ट करें कि प्रस्तुत रचना नवगीत क्यों नहीं है?
July 4 at 10:15pm · Unlike · 1

Rajendra Verma भारतेंदु जी! आप विधा के आधिकारिक विद्वान हैं, पर निर्मल जी वरिष्ठ रचनाकार हैं- वे गीत और नवगीत में अंतर समझते हैं. ग्रुप में रचना पोस्ट करने में उनसे त्रुटि हुई है जिसे उन्होंने सुधार भी लिया था- इसलिए उनकी रचना को केंद्र में रखकर नवगीत पर विमर्श अपेक्षित न था. बहरहाल, अब इसे यहीं समाप्त किया जाना उपयुक्त रहेगा.
July 4 at 10:53pm · Unlike · 4

Bhartendu Mishra राजेन्द्र भाई आप सही कह रहे हैं किंतु ये विमर्श शुक्ल जी पर केन्द्रित न हो कर नवगीत पर केन्द्रित है।इस मंच का नाम ही नवगीत विमर्श है।अब शुक्ल जी इसे यदि अपने गीत से अलग करके नही देख रहे तो इसमे क्या किया जाए ?मैने एक भी शब्द उनके लिए नही कहा है। इस गी...See More
July 5 at 6:29am · Edited · Unlike · 4
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
July 1
एक गीत/नवगीत .... क्या कोई बता सकता है कि इसके रचनाकार कौन हैं.... क्या इसे नवगीत कहा जा सकता है ?
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एक हाथ में हल की मुठिया
एक हाथ में पैना
मुँह में तिक-तिक बैल भागते ...
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Nirmal Shukla आदरणीय व्योम जी यह विडम्बना है गीत प्रकाशित होना एक बात है और प्रकाश में आना अलग बात है इसी तरह से कितने और रचनाकार होंगे और न जाने कितने और गीत होंगे जो ऐसे ही प्रकाशित होते हुए भी अप्रकाशित रह गये होंगे .....जब तक कहीं चर्चा न हो तब तक तो वे समय के ग...See More
July 3 at 11:01pm · Unlike · 6

Jagdish Vyom धन्यवाद आदरणीय निर्मल शुक्ल जी तथा मनोज मधुर जी
July 4 at 10:18am · Like · 2

Bhartendu Mishra तीनो नवगीत दशको के 30 नवगीतकारो मे से आधो का नाम भी लोगो को शायद न मालूम हो।शुक्ल जी सही कह रहे हैं,गीत अपने आप में कठिन साधना है और नवगीत आधुनिक समय मे उस कठिन साधना के परिणाम स्वरूप उपजा नवनीत है।..अब आज के कवियो मे शब्द छन्द रस अर्थ बोध के स्तर त...See More
July 4 at 7:08pm · Unlike · 7
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
July 3
नवगीत: एक हाथ में हल की मुठिया
हमारा उद्देश्य है कि यहाँ अच्छे नवगीत प्रकाशित किये जायें, यदि कोई नवगीत ऐसा है जिसे आप पढ़ना चाहते हैं और वह यहाँ अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है तो कृपया हमें सूचित करें- navgeet2011@gmail.com अथवा jagdishvyom@gmail.com हम उस नवगीत को खोज कर यहाँ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे । -सम्पादक
NAVGEET.BLOGSPOT.COM
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Jagdish Vyom
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सुधीर कुमार
June 10
गीत और नवगीत का अन्तर यदि कोई समझा सके तो अनेक नये लोगों को फायदा होगा, कृपया भारी भरकम शब्दों में न समझायें बल्कि किसी एक कथ्य को गीत में और उसी कथ्य को नवगीत में ढालकर समझा दें तो ठीक रहेगा
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Bhartendu Mishra आपकी इस टिप्पणी के लिए आभार मित्रवर ।
June 24 at 7:30pm · Like · 1

Sanjiv Verma 'salil' bhartendu ji yah pustak mujhe kaise mil sakti hai. jabalpur men uplabdh naheen hai.
June 25 at 9:59am · Like · 1

Bhartendu Mishra आदरणीय सलिल जी, 09968047183 पर फोन करके प्रकाशक फतेहचन्द जी से मंगवा सकते हैं।या उनसे पता किया जा सकता है कि जबलपुर मे कैसे मिल सकती है।
June 25 at 7:13pm · Like
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 17
== हर कविता की इच्छा अन्ततः गीत बन जाना है ==
"गीत गागर" पत्रिका [सम्पादक दिनेश प्रभात] के अप्रैल-जून २०१५ अंक में नचिकेता द्वारा लिखे गए "केदारनाथ अग्रवाल के गीतों की बनावट और बुनावट" शीर्षक लम्बे लेख की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है.... नचिकेता जी ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों के बहाने गीत पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं..
अरुन कमल के कविता विषयक विचार इस लेख में देखें--
" हर कविता की इच्छा अन्ततः गीत बन जाना है। क्योंकि संगीत के सबसे पास का बिन्दु है, दो देहों के बीच बस एक स्पंदित भित्ति तक पहुँचना ही कविता का ध्येय है और श्रेय भी। जहाँ पहुँच कर भाषा बहुत हल्की भारहीन हो जाती है, शब्द अपनी पीठ से सारे माल असबाब, सारे स्थूल अर्थ को छोड़ते हुए, केवल छायाओं-प्रच्छायाओं को, आभासों को वरण करते हुए उस भाव दशा को व्यक्त करते हैं जिसमें पूरी जीवन-स्थिति अन्ततः तिरोहित या स्त्रवित होती है"
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Ramakant Yadav
June 17 at 8:30pm · Unlike · 1

Saurabh Pandey aap bhagyshaalee hain .. yah ank aapko samay se ya der saber mil gayaa..
June 17 at 10:26pm · Unlike · 1

Bhartendu Mishra मैने केदार बाबू के गीतो पर केन्द्रित जो लेख उनकी जंन्मशती के अवसर पर लिखा था (छन्दप्रसंग ब्लाग पर और प्रवक्ता डाट काम पर उपलब्ध� है) उससे नचिकेता जी का आलेख कितना भिन्न है गीतगागर को पढेै बिना नही कह सकता।जिज्ञासु चाहें तो लिंक देख कर अंतर समझ सकते हैं----http://2.bp.blogspot.com/.../s1600/Kedarnath_Agarwal.jpg
June 18 at 9:15am · Edited · Like
Jagdish Vyom
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आशुतोष नारायण त्रिपाठी
June 10
नवगीत और गीत के बीच के अंतर को कैसे दिखाया जा सकता है?
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Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 7 · Edited
दिनेश प्रभात द्वारा सम्पादित पत्रिका " गीत गागर " के नये अंक में कई अच्छे गीत-नवगीत तो हैं ही... नचिकेता जी का लेख बहुत महत्वपूर्ण है
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Jairam Jay, आशुतोष नारायण त्रिपाठी, Shailendra Sharma and 9 others like this.
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Jagdish Vyom गीत गागर पत्रिका के अप्रैल-जून २०१५ अंक की
June 8 at 9:00am · Like

Saurabh Pandey अबतक नहीं मिला है.
June 8 at 11:50am · Unlike · 1

Shailendra Sharma अंक अबतक नहीं मिला
June 8 at 8:28pm · Unlike · 1
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 8 · Edited
========= विचार आमंत्रित ==========
गीत गागर पत्रिका के अप्रैल-जून २०१५ अंक में नचिकेता द्वारा लिखे गए "केदारनाथ अग्रवाल के गीतों की बनावट और बुनावट" शीर्षक लम्बे लेख की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है.... नचिकेता जी ने केदारनाथ अग्रवाल के गीतों के बहाने गीत पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं.. यह लेख नवगीतकारों को पढ़ना चाहिए.... इस लेख में आपको अपने मन में उठने वाले तमाम प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं..... लेख का एक अंश देखें-
" आज की आधुनिक काव्य-दृष्टि के अनुसार आज की बौद्धिक क...
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Ramesh Gautam, Jairam Jay, आशुतोष नारायण त्रिपाठी and 7 others like this.

Ranjana Gupta जी बिलकुल सच कहा !जिस तरह आधुनिक पेन्टिंग को समझने के लिए एक जटिल व कृत्रिम बौद्धिकता और वाहियात समझ की जरूरत है, उसी भांति आज की बड़ी बड़ी साहित्यिक हिन्दी पत्रिकायें दुरूह और पहेली संरचना की कविताएँ छाप क्र जनता के सरोकारों से पूरी तरह विमुख है !उन्होंने तो नारी और काम पर ,कामशास्त्र को भी पानी पिला रखा है,और आलोचक पूरी तरह जुगाड़ू ,पक्षपाती , स्वजन हितैषी ,पेड न्यूज चैनल बन गए है!
June 8 at 1:02pm · Edited · Unlike · 2

Saurabh Pandey इस आलेख का पहला अंक हमने पढ़ा है. इसके बाद वाला अंक जिसकी चर्चा हुई है, अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है.
नचिकेताजी के आलेख से जो आपने उद्धरण दिया है वह अत्यंत सटीक और सार्थक है. इन तथ्यों का प्रचार आवश्यक है और समय की मांग भी. यह अवश्य है, कि पाठक के स्तर क...See More
June 8 at 11:35am · Unlike · 3

Shailendra Sharma आ.रंजना जी एवं सौरभ जी को सटीक टिप्पणी के लिये हार्दिक साधुवाद
June 8 at 8:26pm · Unlike · 4
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 3
Jagdish Vyom's photo.
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Brij Nath Srivastava, Ramesh Gautam, Jairam Jay and 9 others like this.

Jagdish Vyom इस समूह पर कृपया नवगीत पोस्ट न करें..... केवल नवगीत पर गम्भीर और लम्बी चर्चा, संवाद, परिसंवाद, नवगीत विषयक जिज्ञासा, नवगीत पर विद्वानों के अभिमत ..... आदि पोस्ट करें
June 3 at 10:21pm · Like · 1

अवनीश सिंह चौहान इस फोटो की जगह ऐसी फोटो होनी चाहिए जो नवगीत का प्रतिनिधित्व करे। या कोई कलात्मक चित्र भी लगाया जा सकता है। यह मेरा सुझाव है, फिर आपकी मर्जी।
July 21 at 11:07am · Edited · Like
Jagdish Vyom
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Bhartendu Mishra shared his post.
June 6

Bhartendu Mishra
गीतकार मित्रो से निवेदन
गीत का मतलब फिल्मीगीत/लोक गीत/उत्सव आदि के अवसर पर लिखे जाने वाले गीत/आदि से भी जोडा जा सकता है किंतु नवगीत को इन सबसे नही जोडा जा सकता।...
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Shiv Murti Tiwari, Ramakant Yadav, Saurabh Pandey and 5 others like this.

Shailendra Sharma सत्यवचन
June 6 at 10:16am · Like · 1
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 4
नवगीत को लेकर जिन सदस्यों के मन में कोई प्रश्न है तो कृपया अपना प्रश्न यहाँ लिख दें
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Shailendra Sharma, Indra Sengar and Abha Saxena like this.
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom created the group.
June 3
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Trilok Singh Thakurela, Mahima Verma, Shivji Srivastava and 6 others like this.
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Shivji Srivastava इस समूह का गठन कर निःसंदेह आपने महत्वपूर्ण कार्य किया है सम्यक चिंतन से बहुत सी धुंध छंटेगी और नवगीत के सन्दर्भ में ज्ञानवर्धक सामग्री मिलेगी।
June 4 at 9:34am · Unlike · 1

Yogendra Verma नवगीत विषयक परिचर्चा हेतु मंच प्रदान करने हेतु आपका अतिशय आभार ...!
June 4 at 9:57am · Unlike · 2

Mahima Verma बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार,, गुणीजनों के सान्निध्य और परिचर्चा में ज्ञानवर्धन का सौभाग्य मिलेगा,, हार्दिक शुभकामनायें,,
June 4 at 8:23pm · Unlike · 2
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 4 · Edited
"गीत का आज के तकाजों और सरोकारों से जुड़ा होना ही नवगीत होना है। प्रत्येक नवगीत अनिवार्यतः एक गीत पहले होता है किन्तु हर गीत को नवगीत नहीं कहा जा सकता। "
- देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
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Mahima Verma, Shailendra Arora, Kamlesh Kumar Diwan and 5 others like this.

Kamlesh Kumar Diwan sahi hai
June 4 at 5:41pm · Like
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 4
" सच तो यह है कि जनता कविता के निकट आना चाहती है, उसे अपनाना चाहती है, उसे अपने अंतरंग में बसाना भी चाहती है, बशर्ते कि कविता जनता की भाषा में हो, उसके लिए बोधगम्य हो, उसमें उसके जीवन की सच्चाइयों और अनुभूतियों की सच्ची अभिव्यक्ति हो और उसकी परम्परा से हासिल संस्कार, रुचि एवं स्वभाव से रचे बसे लय-छन्दों के सहारे लिखी गयी हो। "
-नचिकेता, "समकालीन छान्दस कविता की उपेक्षा क्यों", गीत गागर, अक्टूबर-दिसम्बर २०१३, पृ० ३६
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कल्पना रामानी, Rajendra Verma, Nirmal Shukla and 11 others like this.
Jagdish Vyom
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Jagdish Vyom
June 4 · Edited
" नवगीत नदी है, छन्द और युगीन संवेदना की लय उसके दो किनारे है। नवगीत के लिए नई भाषा, नए मुहावरे और नए छन्द विन्यास की आवश्यकता होती है "
-डा० भारतेन्दु मिश्र, शब्दायन, पृष्ठ-८८

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